ए॒ष दे॒वो अम॑र्त्यः पर्ण॒वीरि॑व दीयति ।
अ॒भि द्रोणा॑न्या॒सद॑म्
eṣa devo amartyaḥ parṇavīriva dīyati |
abhi droṇānyāsadam
ऋषि: आजीगर्तिः शुनःशेपः, कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः · देवता: पवमानः सोमः · छन्द: गायत्री
10 श्लोक · 3 में से 114
शुनःशेप आजीगर्ति, जो विश्वामित्र कुल में देवरात कहलाए, इन गायत्री मन्त्रों के ऋषि हैं। पवमान सोम की लगभग हर पंक्ति 'एष', अर्थात 'यह', से आरम्भ होती है। यह अमर देव पक्षी की भाँति उड़कर काष्ठ के द्रोणों में बैठता है। कवियों द्वारा सँवारा गया वह सब टेढ़े स्थानों को लाँघता है और अदम्य है। योद्धाओं के साथ शूर की भाँति वह सब वरणीय धन जीतने निकलता है। वह रथ चाहता है, जलों में उतरता है और गरजता हुआ लोकों को पार कर द्युलोक तक दौड़ता है। पुरातन जन्म से देवों के लिए अभिषुत होकर वह छलनी में बहता है और अन्न उत्पन्न करता है।
ए॒ष दे॒वो अम॑र्त्यः पर्ण॒वीरि॑व दीयति ।
अ॒भि द्रोणा॑न्या॒सद॑म्
eṣa devo amartyaḥ parṇavīriva dīyati |
abhi droṇānyāsadam
ए॒ष दे॒वो वि॒पा कृ॒तोऽति॒ ह्वरां॑सि धावति ।
पव॑मानो॒ अदा॑भ्यः
eṣa devo vipā kṛto'ti hvarāṃsi dhāvati |
pavamāno adābhyaḥ
ए॒ष दे॒वो वि॑प॒न्युभि॒ः पव॑मान ऋता॒युभि॑ः ।
हरि॒र्वाजा॑य मृज्यते
eṣa devo vipanyubhiḥ pavamāna ṛtāyubhiḥ |
harirvājāya mṛjyate
ए॒ष विश्वा॑नि॒ वार्या॒ शूरो॒ यन्नि॑व॒ सत्व॑भिः ।
पव॑मानः सिषासति
eṣa viśvāni vāryā śūro yanniva satvabhiḥ |
pavamānaḥ siṣāsati
ए॒ष दे॒वो र॑थर्यति॒ पव॑मानो दशस्यति ।
आ॒विष्कृ॑णोति वग्व॒नुम्
eṣa devo ratharyati pavamāno daśasyati |
āviṣkṛṇoti vagvanum
ए॒ष विप्रै॑र॒भिष्टु॑तो॒ऽपो दे॒वो वि गा॑हते ।
दध॒द्रत्ना॑नि दा॒शुषे॑
eṣa viprairabhiṣṭuto'po devo vi gāhate |
dadhadratnāni dāśuṣe
ए॒ष दिवं॒ वि धा॑वति ति॒रो रजां॑सि॒ धार॑या ।
पव॑मान॒ः कनि॑क्रदत्
eṣa divaṃ vi dhāvati tiro rajāṃsi dhārayā |
pavamānaḥ kanikradat
ए॒ष दिवं॒ व्यास॑रत्ति॒रो रजां॒स्यस्पृ॑तः ।
पव॑मानः स्वध्व॒रः
eṣa divaṃ vyāsarattiro rajāṃsyaspṛtaḥ |
pavamānaḥ svadhvaraḥ
ए॒ष प्र॒त्नेन॒ जन्म॑ना दे॒वो दे॒वेभ्य॑ः सु॒तः ।
हरि॑ः प॒वित्रे॑ अर्षति
eṣa pratnena janmanā devo devebhyaḥ sutaḥ |
hariḥ pavitre arṣati
ए॒ष उ॒ स्य पु॑रुव्र॒तो ज॑ज्ञा॒नो ज॒नय॒न्निष॑ः ।
धार॑या पवते सु॒तः
eṣa u sya puruvrato jajñāno janayanniṣaḥ |
dhārayā pavate sutaḥ
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