नवम मण्डल

सूक्त 22: उत्तम तन्तु को फैलाते सोम

ऋषि: कश्यपोऽसितो देवलो वा · देवता: पवमानः सोमः · छन्द: गायत्री

7 श्लोक · 22 में से 114

इस अध्याय में क्या होता है

उत्तम तन्तु को फैलाते सोम

कश्यप असित अथवा देवल गायत्री में पवमान सोम को सम्बोधित करते हैं। ये वेगवान सोम रथों और वेगी अश्वों की भाँति छोड़े जाकर हिनहिनाए हैं। वे विस्तृत वायु की भाँति, पर्जन्य की वर्षा की भाँति, अग्नि की लपटों की भाँति चलते हैं। शुद्ध और दधि से मिले मेधावी सोम कवि की धीतियों में व्याप्त हो गए हैं। सँवारे गए अमर सोम बिना थके दौड़ते हैं, अन्तरिक्ष के मार्ग खोजते हुए, और द्यावापृथिवी के शिखरों तथा उत्तम लोक तक पहुँचे हैं। वे फैलते हुए उत्तम तन्तु के साथ चले। सोम की स्तुति है कि उसने पणियों से गौओं का धन लेकर धारण किया और फैले हुए तन्तु को गुँजा दिया।

22.1

ए॒ते सोमा॑स आ॒शवो॒ रथा॑ इव॒ प्र वा॒जिन॑ः ।
सर्गा॑ः सृ॒ष्टा अ॑हेषत

ete somāsa āśavo rathā iva pra vājinaḥ |
sargāḥ sṛṣṭā aheṣata

22.2

ए॒ते वाता॑ इवो॒रव॑ः प॒र्जन्य॑स्येव वृ॒ष्टय॑ः ।
अ॒ग्नेरि॑व भ्र॒मा वृथा॑

ete vātā ivoravaḥ parjanyasyeva vṛṣṭayaḥ |
agneriva bhramā vṛthā

22.3

ए॒ते पू॒ता वि॑प॒श्चित॒ः सोमा॑सो॒ दध्या॑शिरः ।
वि॒पा व्या॑नशु॒र्धिय॑ः

ete pūtā vipaścitaḥ somāso dadhyāśiraḥ |
vipā vyānaśurdhiyaḥ

22.4

ए॒ते मृ॒ष्टा अम॑र्त्याः ससृ॒वांसो॒ न श॑श्रमुः ।
इय॑क्षन्तः प॒थो रज॑ः

ete mṛṣṭā amartyāḥ sasṛvāṃso na śaśramuḥ |
iyakṣantaḥ patho rajaḥ

22.5

ए॒ते पृ॒ष्ठानि॒ रोद॑सोर्विप्र॒यन्तो॒ व्या॑नशुः ।
उ॒तेदमु॑त्त॒मं रज॑ः

ete pṛṣṭhāni rodasorviprayanto vyānaśuḥ |
utedamuttamaṃ rajaḥ

22.6

तन्तुं॑ तन्वा॒नमु॑त्त॒ममनु॑ प्र॒वत॑ आशत ।
उ॒तेदमु॑त्त॒माय्य॑म्

tantuṃ tanvānamuttamamanu pravata āśata |
utedamuttamāyyam

22.7

त्वं सो॑म प॒णिभ्य॒ आ वसु॒ गव्या॑नि धारयः ।
त॒तं तन्तु॑मचिक्रदः

tvaṃ soma paṇibhya ā vasu gavyāni dhārayaḥ |
tataṃ tantumacikradaḥ

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