प्र क॒विर्दे॒ववी॑त॒येऽव्यो॒ वारे॑भिरर्षति ।
सा॒ह्वान्विश्वा॑ अ॒भि स्पृध॑ः
pra kavirdevavītaye'vyo vārebhirarṣati |
sāhvānviśvā abhi spṛdhaḥ
ऋषि: कश्यपोऽसितो देवलो वा · देवता: पवमानः सोमः · छन्द: गायत्री
7 श्लोक · 20 में से 114
कश्यप असित अथवा देवल गायत्री में पवमान सोम का गान करते हैं। कवि सोम देवों के लिए भेड़ की ऊन से बहता है और सब प्रतिद्वन्द्वियों को जीतता है। वह स्तोताओं को गौओं से युक्त सहस्रों का बल भेजता है। उससे हमारे लिए यश पाने की प्रार्थना है। दानशील यजमानों के लिए महान कीर्ति और स्थिर धन, और स्तोताओं के लिए अन्न माँगा जाता है। सुव्रत राजा की भाँति वह स्तुतियों में प्रविष्ट हुआ है। जलों में अजेय वह वाहक हाथों में मला जाकर चमुओं में बैठता है। क्रीड़ाशील और दानी वह छलनी तक आता है और स्तोता को वीर्य देता है।
प्र क॒विर्दे॒ववी॑त॒येऽव्यो॒ वारे॑भिरर्षति ।
सा॒ह्वान्विश्वा॑ अ॒भि स्पृध॑ः
pra kavirdevavītaye'vyo vārebhirarṣati |
sāhvānviśvā abhi spṛdhaḥ
स हि ष्मा॑ जरि॒तृभ्य॒ आ वाजं॒ गोम॑न्त॒मिन्व॑ति ।
पव॑मानः सह॒स्रिण॑म्
sa hi ṣmā jaritṛbhya ā vājaṃ gomantaminvati |
pavamānaḥ sahasriṇam
परि॒ विश्वा॑नि॒ चेत॑सा मृ॒शसे॒ पव॑से म॒ती ।
स न॑ः सोम॒ श्रवो॑ विदः
pari viśvāni cetasā mṛśase pavase matī |
sa naḥ soma śravo vidaḥ
अ॒भ्य॑र्ष बृ॒हद्यशो॑ म॒घव॑द्भ्यो ध्रु॒वं र॒यिम् ।
इषं॑ स्तो॒तृभ्य॒ आ भ॑र
abhyarṣa bṛhadyaśo maghavadbhyo dhruvaṃ rayim |
iṣaṃ stotṛbhya ā bhara
त्वं राजे॑व सुव्र॒तो गिर॑ः सो॒मा वि॑वेशिथ ।
पु॒ना॒नो व॑ह्ने अद्भुत
tvaṃ rājeva suvrato giraḥ somā viveśitha |
punāno vahne adbhuta
स वह्नि॑र॒प्सु दु॒ष्टरो॑ मृ॒ज्यमा॑नो॒ गभ॑स्त्योः ।
सोम॑श्च॒मूषु॑ सीदति
sa vahnirapsu duṣṭaro mṛjyamāno gabhastyoḥ |
somaścamūṣu sīdati
क्री॒ळुर्म॒खो न मं॑ह॒युः प॒वित्रं॑ सोम गच्छसि ।
दध॑त्स्तो॒त्रे सु॒वीर्य॑म्
krīḻurmakho na maṃhayuḥ pavitraṃ soma gacchasi |
dadhatstotre suvīryam
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