सप्तम मण्डल

सूक्त 17: प्रज्वलित अग्नि को द्विपदा मन्त्र

ऋषि: मैत्रावरुणिर्वसिष्ठः · देवता: अग्निः · छन्द: द्विपदा त्रिष्टुप्

7 श्लोक · 17 में से 104

इस अध्याय में क्या होता है

प्रज्वलित अग्नि को द्विपदा मन्त्र

वसिष्ठ के द्विपदा त्रिष्टुप् में सात मन्त्र, हर एक दो पंक्तियों का। वे यज्ञ के क्रम पर चलते हैं: अग्नि भलीभाँति प्रज्वलित हों, कुश दूर तक बिछे, उत्सुक द्वार खुल जाएँ, और वे उत्सुक देवों को ले आएँ। जातवेदा से कहा जाता है कि यज्ञों को सुसम्पन्न करें, अमरों की पूजा करें और उन्हें तृप्त करें। 'हे ज्ञानी, सब उत्तम वस्तुएँ जीतो; आज हमारी प्रार्थनाएँ सच हों।' देवों ने बल के पुत्र को हव्यवाहक बनाया। ऋषि माँगते हैं कि उनके लोग सदा देव के दाता बने रहें, और अग्नि माँगे जाने पर बड़े धन बाँटें।

17.1

अग्ने॒ भव॑ सुष॒मिधा॒ समि॑द्ध उ॒त ब॒र्हिरु॑र्वि॒या वि स्तृ॑णीताम्

agne bhava suṣamidhā samiddha uta barhirurviyā vi stṛṇītām

17.2

उ॒त द्वार॑ उश॒तीर्वि श्र॑यन्तामु॒त दे॒वाँ उ॑श॒त आ व॑हे॒ह

uta dvāra uśatīrvi śrayantāmuta devām̐ uśata ā vaheha

17.3

अग्ने॑ वी॒हि ह॒विषा॒ यक्षि॑ दे॒वान्स्व॑ध्व॒रा कृ॑णुहि जातवेदः

agne vīhi haviṣā yakṣi devānsvadhvarā kṛṇuhi jātavedaḥ

17.4

स्व॒ध्व॒रा क॑रति जा॒तवे॑दा॒ यक्ष॑द्दे॒वाँ अ॒मृता॑न्पि॒प्रय॑च्च

svadhvarā karati jātavedā yakṣaddevām̐ amṛtānpiprayacca

17.5

वंस्व॒ विश्वा॒ वार्या॑णि प्रचेतः स॒त्या भ॑वन्त्वा॒शिषो॑ नो अ॒द्य

vaṃsva viśvā vāryāṇi pracetaḥ satyā bhavantvāśiṣo no adya

17.6

त्वामु॒ ते द॑धिरे हव्य॒वाहं॑ दे॒वासो॑ अग्न ऊ॒र्ज आ नपा॑तम्

tvāmu te dadhire havyavāhaṃ devāso agna ūrja ā napātam

17.7

ते ते॑ दे॒वाय॒ दाश॑तः स्याम म॒हो नो॒ रत्ना॒ वि द॑ध इया॒नः

te te devāya dāśataḥ syāma maho no ratnā vi dadha iyānaḥ

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