प्राग्नये॑ विश्व॒शुचे॑ धियं॒धे॑ऽसुर॒घ्ने मन्म॑ धी॒तिं भ॑रध्वम् ।
भरे॑ ह॒विर्न ब॒र्हिषि॑ प्रीणा॒नो वै॑श्वान॒राय॒ यत॑ये मती॒नाम्
prāgnaye viśvaśuce dhiyaṃdhe'suraghne manma dhītiṃ bharadhvam |
bhare havirna barhiṣi prīṇāno vaiśvānarāya yataye matīnām
ऋषि: मैत्रावरुणिर्वसिष्ठः · देवता: वैश्वानरोऽग्निः · छन्द: त्रिष्टुप्
3 श्लोक · 13 में से 104
वसिष्ठ का अग्नि वैश्वानर को एक छोटा सूक्त, जो सर्वदीप्त, बुद्धि देने वाले और असुरों के संहारक हैं। गायक उनके लिए विचार और प्रार्थना ऐसे लाते हैं जैसे कुश पर आहुति रखी जाती है। जन्म लेते ही धधकते हुए उन्होंने द्युलोक और पृथ्वी को ज्वाला से भर दिया, और अपनी महिमा से देवों को उन पर पड़े शाप से छुड़ाया। जन्मते ही उन्होंने सब लोकों को ऐसे देखा जैसे ग्वाला अपने पशुओं को देखता है, सर्वत्र घूमते हुए। ऋषि वैश्वानर से प्रार्थना के लिए मार्ग खोजने को कहते हैं, और सदा रक्षा की टेक से समाप्त करते हैं।
प्राग्नये॑ विश्व॒शुचे॑ धियं॒धे॑ऽसुर॒घ्ने मन्म॑ धी॒तिं भ॑रध्वम् ।
भरे॑ ह॒विर्न ब॒र्हिषि॑ प्रीणा॒नो वै॑श्वान॒राय॒ यत॑ये मती॒नाम्
prāgnaye viśvaśuce dhiyaṃdhe'suraghne manma dhītiṃ bharadhvam |
bhare havirna barhiṣi prīṇāno vaiśvānarāya yataye matīnām
त्वम॑ग्ने शो॒चिषा॒ शोशु॑चान॒ आ रोद॑सी अपृणा॒ जाय॑मानः ।
त्वं दे॒वाँ अ॒भिश॑स्तेरमुञ्चो॒ वैश्वा॑नर जातवेदो महि॒त्वा
tvamagne śociṣā śośucāna ā rodasī apṛṇā jāyamānaḥ |
tvaṃ devām̐ abhiśasteramuñco vaiśvānara jātavedo mahitvā
जा॒तो यद॑ग्ने॒ भुव॑ना॒ व्यख्य॑ः प॒शून्न गो॒पा इर्य॒ः परि॑ज्मा ।
वैश्वा॑नर॒ ब्रह्म॑णे विन्द गा॒तुं यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभि॒ः सदा॑ नः
jāto yadagne bhuvanā vyakhyaḥ paśūnna gopā iryaḥ parijmā |
vaiśvānara brahmaṇe vinda gātuṃ yūyaṃ pāta svastibhiḥ sadā naḥ
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