त्वद्विश्वा॑ सुभग॒ सौभ॑गा॒न्यग्ने॒ वि य॑न्ति व॒निनो॒ न व॒याः ।
श्रु॒ष्टी र॒यिर्वाजो॑ वृत्र॒तूर्ये॑ दि॒वो वृ॒ष्टिरीड्यो॑ री॒तिर॒पाम्
tvadviśvā subhaga saubhagānyagne vi yanti vanino na vayāḥ |
śruṣṭī rayirvājo vṛtratūrye divo vṛṣṭirīḍyo rītirapām
ऋषि: बार्हस्पत्यो भरद्वाजः · देवता: अग्निः · छन्द: त्रिष्टुप्
6 श्लोक · 13 में से 75
बार्हस्पत्य भरद्वाज त्रिष्टुप् में अग्नि की स्तुति करते हैं। उनसे सारे सौभाग्य वृक्ष की शाखाओं की तरह फैलते हैं: धन, वृत्र से युद्ध में बल, द्युलोक की वर्षा और जलों का बहना। वे भग के समान रत्न लाते हैं और मित्र के समान महान ऋत के रक्षक हैं। सच्चे स्वामी के रूप में वे बल से वृत्र को मारते हैं और पणि से धन जीत लाते हैं। जो मनुष्य स्तुति और आहुति से उन्हें तीक्ष्ण करता है, वह हर वरणीय वस्तु पाता है और धन का स्वामी बनता है। ऋषि वीर पुत्रों सहित यश, प्रजा के लिए अन्न, पुत्र-पौत्र और सौ हेमन्त माँगते हैं।
त्वद्विश्वा॑ सुभग॒ सौभ॑गा॒न्यग्ने॒ वि य॑न्ति व॒निनो॒ न व॒याः ।
श्रु॒ष्टी र॒यिर्वाजो॑ वृत्र॒तूर्ये॑ दि॒वो वृ॒ष्टिरीड्यो॑ री॒तिर॒पाम्
tvadviśvā subhaga saubhagānyagne vi yanti vanino na vayāḥ |
śruṣṭī rayirvājo vṛtratūrye divo vṛṣṭirīḍyo rītirapām
त्वं भगो॑ न॒ आ हि रत्न॑मि॒षे परि॑ज्मेव क्षयसि द॒स्मव॑र्चाः ।
अग्ने॑ मि॒त्रो न बृ॑ह॒त ऋ॒तस्यासि॑ क्ष॒त्ता वा॒मस्य॑ देव॒ भूरे॑ः
tvaṃ bhago na ā hi ratnamiṣe parijmeva kṣayasi dasmavarcāḥ |
agne mitro na bṛhata ṛtasyāsi kṣattā vāmasya deva bhūreḥ
स सत्प॑ति॒ः शव॑सा हन्ति वृ॒त्रमग्ने॒ विप्रो॒ वि प॒णेर्भ॑र्ति॒ वाज॑म् ।
यं त्वं प्र॑चेत ऋतजात रा॒या स॒जोषा॒ नप्त्रा॒पां हि॒नोषि॑
sa satpatiḥ śavasā hanti vṛtramagne vipro vi paṇerbharti vājam |
yaṃ tvaṃ praceta ṛtajāta rāyā sajoṣā naptrāpāṃ hinoṣi
यस्ते॑ सूनो सहसो गी॒र्भिरु॒क्थैर्य॒ज्ञैर्मर्तो॒ निशि॑तिं वे॒द्यान॑ट् ।
विश्वं॒ स दे॑व॒ प्रति॒ वार॑मग्ने ध॒त्ते धा॒न्यं१॒॑ पत्य॑ते वस॒व्यै॑ः
yaste sūno sahaso gīrbhirukthairyajñairmarto niśitiṃ vedyānaṭ |
viśvaṃ sa deva prati vāramagne dhatte dhānyaṃ patyate vasavyaiḥ
ता नृभ्य॒ आ सौ॑श्रव॒सा सु॒वीराग्ने॑ सूनो सहसः पु॒ष्यसे॑ धाः ।
कृ॒णोषि॒ यच्छव॑सा॒ भूरि॑ प॒श्वो वयो॒ वृका॑या॒रये॒ जसु॑रये
tā nṛbhya ā sauśravasā suvīrāgne sūno sahasaḥ puṣyase dhāḥ |
kṛṇoṣi yacchavasā bhūri paśvo vayo vṛkāyāraye jasuraye
व॒द्मा सू॑नो सहसो नो॒ विहा॑या॒ अग्ने॑ तो॒कं तन॑यं वा॒जि नो॑ दाः ।
विश्वा॑भिर्गी॒र्भिर॒भि पू॒र्तिम॑श्यां॒ मदे॑म श॒तहि॑माः सु॒वीरा॑ः
vadmā sūno sahaso no vihāyā agne tokaṃ tanayaṃ vāji no dāḥ |
viśvābhirgīrbhirabhi pūrtimaśyāṃ madema śatahimāḥ suvīrāḥ
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