पञ्चम मण्डल

सूक्त 25: नौका की भाँति पार ले जाते अग्नि

ऋषि: वसूयव आत्रेयाः · देवता: अग्निः · छन्द: अनुष्टुप्

9 श्लोक · 25 में से 87

इस अध्याय में क्या होता है

नौका की भाँति पार ले जाते अग्नि

अत्रि कुल के वसूयु, धन चाहने वाले, अनुष्टुप् में अग्निदेव की स्तुति करते हैं। सहायता के लिए अग्नि का गान करो; वे वसु हैं, ऋषियों के पुत्र देंगे। प्राचीन देवों ने भी उन्हें प्रज्वलित किया, मधुर जिह्वा वाले सच्चे होता को। अग्नि देवों में राज करते हैं और मर्त्यों में प्रविष्ट हैं; वे हवि ले जाते हैं। वे दाता को यशस्वी, विद्वान पुत्र, युद्ध में जीतने वाला सत्पति और अपराजित तेज घोड़ा देते हैं। उनकी ज्वालाएँ सोम कूटने के पत्थर की तरह, आकाश की गर्जना की तरह गूँजती हैं। अन्तिम मन्त्र माँगता है कि वे हमें नाव की तरह सब शत्रुओं के पार ले जाएँ।

25.1

अच्छा॑ वो अ॒ग्निमव॑से दे॒वं गा॑सि॒ स नो॒ वसु॑ः ।
रास॑त्पु॒त्र ऋ॑षू॒णामृ॒तावा॑ पर्षति द्वि॒षः

acchā vo agnimavase devaṃ gāsi sa no vasuḥ |
rāsatputra ṛṣūṇāmṛtāvā parṣati dviṣaḥ

25.2

स हि स॒त्यो यं पूर्वे॑ चिद्दे॒वास॑श्चि॒द्यमी॑धि॒रे ।
होता॑रं म॒न्द्रजि॑ह्व॒मित्सु॑दी॒तिभि॑र्वि॒भाव॑सुम्

sa hi satyo yaṃ pūrve ciddevāsaścidyamīdhire |
hotāraṃ mandrajihvamitsudītibhirvibhāvasum

25.3

स नो॑ धी॒ती वरि॑ष्ठया॒ श्रेष्ठ॑या च सुम॒त्या ।
अग्ने॑ रा॒यो दि॑दीहि नः सुवृ॒क्तिभि॑र्वरेण्य

sa no dhītī variṣṭhayā śreṣṭhayā ca sumatyā |
agne rāyo didīhi naḥ suvṛktibhirvareṇya

25.4

अ॒ग्निर्दे॒वेषु॑ राजत्य॒ग्निर्मर्ते॑ष्वावि॒शन् ।
अ॒ग्निर्नो॑ हव्य॒वाह॑नो॒ऽग्निं धी॒भिः स॑पर्यत

agnirdeveṣu rājatyagnirmarteṣvāviśan |
agnirno havyavāhano'gniṃ dhībhiḥ saparyata

25.5

अ॒ग्निस्तु॒विश्र॑वस्तमं तु॒विब्र॑ह्माणमुत्त॒मम् ।
अ॒तूर्तं॑ श्राव॒यत्प॑तिं पु॒त्रं द॑दाति दा॒शुषे॑

agnistuviśravastamaṃ tuvibrahmāṇamuttamam |
atūrtaṃ śrāvayatpatiṃ putraṃ dadāti dāśuṣe

25.6

अ॒ग्निर्द॑दाति॒ सत्प॑तिं सा॒साह॒ यो यु॒धा नृभि॑ः ।
अ॒ग्निरत्यं॑ रघु॒ष्यदं॒ जेता॑र॒मप॑राजितम्

agnirdadāti satpatiṃ sāsāha yo yudhā nṛbhiḥ |
agniratyaṃ raghuṣyadaṃ jetāramaparājitam

25.7

यद्वाहि॑ष्ठं॒ तद॒ग्नये॑ बृ॒हद॑र्च विभावसो ।
महि॑षीव॒ त्वद्र॒यिस्त्वद्वाजा॒ उदी॑रते

yadvāhiṣṭhaṃ tadagnaye bṛhadarca vibhāvaso |
mahiṣīva tvadrayistvadvājā udīrate

25.8

तव॑ द्यु॒मन्तो॑ अ॒र्चयो॒ ग्रावे॑वोच्यते बृ॒हत् ।
उ॒तो ते॑ तन्य॒तुर्य॑था स्वा॒नो अ॑र्त॒ त्मना॑ दि॒वः

tava dyumanto arcayo grāvevocyate bṛhat |
uto te tanyaturyathā svāno arta tmanā divaḥ

25.9

ए॒वाँ अ॒ग्निं व॑सू॒यव॑ः सहसा॒नं व॑वन्दिम ।
स नो॒ विश्वा॒ अति॒ द्विष॒ः पर्ष॑न्ना॒वेव॑ सु॒क्रतु॑ः

evām̐ agniṃ vasūyavaḥ sahasānaṃ vavandima |
sa no viśvā ati dviṣaḥ parṣannāveva sukratuḥ

पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)