पञ्चम मण्डल

सूक्त 21: मनु की भाँति प्रज्वलित अग्नि

ऋषि: सस आत्रेयः · देवता: अग्निः · छन्द: अनुष्टुप्, ४ पङ्क्तिः

4 श्लोक · 21 में से 87

इस अध्याय में क्या होता है

मनु की भाँति प्रज्वलित अग्नि

आत्रेय सस अनुष्टुप् में, अन्त में पंक्ति के साथ, अग्निदेव की स्तुति करते हैं। गायक उन्हें मनु की भाँति स्थापित और प्रज्वलित करते हैं, और अंगिरा अग्नि से कहते हैं कि मनु की रीति से देवों का यजन करें। प्रसन्न होकर वे मनुष्यों में प्रज्वलित होते हैं, और घी से सिंचित अग्नि के पास स्रुवाएँ क्रम से आती हैं। सब देवों ने मिलकर उन्हें दूत बनाया और यज्ञ में उस कवि की स्तुति करते हैं। मर्त्य देवयज्ञ से अग्नि का पूजन करे। प्रज्वलित, दीप्त अग्नि से विनती है कि वे ऋत की योनि में, सस की योनि में, आसन ग्रहण करें।

21.1

म॒नु॒ष्वत्त्वा॒ नि धी॑महि मनु॒ष्वत्समि॑धीमहि ।
अग्ने॑ मनु॒ष्वद॑ङ्गिरो दे॒वान्दे॑वय॒ते य॑ज

manuṣvattvā ni dhīmahi manuṣvatsamidhīmahi |
agne manuṣvadaṅgiro devāndevayate yaja

21.2

त्वं हि मानु॑षे॒ जनेऽग्ने॒ सुप्री॑त इ॒ध्यसे॑ ।
स्रुच॑स्त्वा यन्त्यानु॒षक्सुजा॑त॒ सर्पि॑रासुते

tvaṃ hi mānuṣe jane'gne suprīta idhyase |
srucastvā yantyānuṣaksujāta sarpirāsute

21.3

त्वां विश्वे॑ स॒जोष॑सो दे॒वासो॑ दू॒तम॑क्रत ।
स॒प॒र्यन्त॑स्त्वा कवे य॒ज्ञेषु॑ दे॒वमी॑ळते

tvāṃ viśve sajoṣaso devāso dūtamakrata |
saparyantastvā kave yajñeṣu devamīḻate

21.4

दे॒वं वो॑ देवय॒ज्यया॒ग्निमी॑ळीत॒ मर्त्य॑ः ।
समि॑द्धः शुक्र दीदिह्यृ॒तस्य॒ योनि॒मास॑दः स॒सस्य॒ योनि॒मास॑दः

devaṃ vo devayajyayāgnimīḻīta martyaḥ |
samiddhaḥ śukra dīdihyṛtasya yonimāsadaḥ sasasya yonimāsadaḥ

पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)