चतुर्थ मण्डल

सूक्त 14: प्रभात में अग्नि, अश्विन और उषा

ऋषि: वामदेवो गौतमः · देवता: अग्निः (लिङ्गोक्तदेवता इति एके) · छन्द: त्रिष्टुप्

5 श्लोक · 14 में से 58

इस अध्याय में क्या होता है

प्रभात में अग्नि, अश्विन और उषा

वामदेव गौतम का त्रिष्टुप् छन्द में साथ वाला प्रभात सूक्त, अनुक्रमणी में देवता अग्नि। जातवेदा अग्नि उषाओं को देखते हैं, और नासत्यों से विस्तृत गति वाला रथ इस यज्ञ तक लाने की प्रार्थना है। सविता अपनी पताका उठाते हैं और हर लोक के लिए प्रकाश करते हैं; सूर्य अपनी किरणों से द्युलोक, पृथ्वी और अन्तरिक्ष को भर देते हैं। देवी उषा लाल गायें लिए आती हैं और सुन्दर जुते रथ पर सबको सौभाग्य के लिए जगाती हैं। अश्विनों को मधुर सोम पीकर आनन्दित होने का निमन्त्रण है। सूक्त पिछले सूक्त वाले मन्त्र पर ही समाप्त होता है, जो पूछता है कि बिना आधार के सूर्य गिरते क्यों नहीं।

14.1

प्रत्य॒ग्निरु॒षसो॑ जा॒तवे॑दा॒ अख्य॑द्दे॒वो रोच॑माना॒ महो॑भिः ।
आ ना॑सत्योरुगा॒या रथे॑ने॒मं य॒ज्ञमुप॑ नो यात॒मच्छ॑

pratyagniruṣaso jātavedā akhyaddevo rocamānā mahobhiḥ |
ā nāsatyorugāyā rathenemaṃ yajñamupa no yātamaccha

14.2

ऊ॒र्ध्वं के॒तुं स॑वि॒ता दे॒वो अ॑श्रे॒ज्ज्योति॒र्विश्व॑स्मै॒ भुव॑नाय कृ॒ण्वन् ।
आप्रा॒ द्यावा॑पृथि॒वी अ॒न्तरि॑क्षं॒ वि सूर्यो॑ र॒श्मिभि॒श्चेकि॑तानः

ūrdhvaṃ ketuṃ savitā devo aśrejjyotirviśvasmai bhuvanāya kṛṇvan |
āprā dyāvāpṛthivī antarikṣaṃ vi sūryo raśmibhiścekitānaḥ

14.3

आ॒वह॑न्त्यरु॒णीर्ज्योति॒षागा॑न्म॒ही चि॒त्रा र॒श्मिभि॒श्चेकि॑ताना ।
प्र॒बो॒धय॑न्ती सुवि॒ताय॑ दे॒व्यु१॒॑षा ई॑यते सु॒युजा॒ रथे॑न

āvahantyaruṇīrjyotiṣāgānmahī citrā raśmibhiścekitānā |
prabodhayantī suvitāya devyuṣā īyate suyujā rathena

14.4

आ वां॒ वहि॑ष्ठा इ॒ह ते व॑हन्तु॒ रथा॒ अश्वा॑स उ॒षसो॒ व्यु॑ष्टौ ।
इ॒मे हि वां॑ मधु॒पेया॑य॒ सोमा॑ अ॒स्मिन्य॒ज्ञे वृ॑षणा मादयेथाम्

ā vāṃ vahiṣṭhā iha te vahantu rathā aśvāsa uṣaso vyuṣṭau |
ime hi vāṃ madhupeyāya somā asminyajñe vṛṣaṇā mādayethām

14.5

अना॑यतो॒ अनि॑बद्धः क॒थायं न्य॑ङ्ङुत्ता॒नोऽव॑ पद्यते॒ न ।
कया॑ याति स्व॒धया॒ को द॑दर्श दि॒वः स्क॒म्भः समृ॑तः पाति॒ नाक॑म्

anāyato anibaddhaḥ kathāyaṃ nyaṅṅuttāno'va padyate na |
kayā yāti svadhayā ko dadarśa divaḥ skambhaḥ samṛtaḥ pāti nākam

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