आ म॒न्द्रैरि॑न्द्र॒ हरि॑भिर्या॒हि म॒यूर॑रोमभिः ।
मा त्वा॒ के चि॒न्नि य॑म॒न्विं न पा॒शिनोऽति॒ धन्वे॑व॒ ताँ इ॑हि
ā mandrairindra haribhiryāhi mayūraromabhiḥ |
mā tvā ke cinni yamanviṃ na pāśino'ti dhanveva tām̐ ihi
ऋषि: गाथिनो विश्वामित्रः · देवता: इन्द्रः · छन्द: बृहती
5 श्लोक · 45 में से 62
इन्द्र के प्रति विश्वामित्र के पाँच बृहती मन्त्र। इन्द्र से मोर पंख जैसे रोम वाले आनन्दमय हरि घोड़ों के साथ आने को कहा गया है; कोई उसे वैसे न रोके जैसे बहेलिए पक्षी को रोकते हैं, वह उन्हें मरुस्थल की भाँति लाँघ जाए। वह वृत्र को खाने वाला, वल को तोड़ने वाला, पुरों को ढहाने वाला और जलों को चलाने वाला है। जैसे गहरे सागर, जैसे ग्वाला गौओं को, वैसे वह विवेक का पोषण करता है। जैसे कोई पके फल के लिए वृक्ष हिलाता है, वैसे वह धन गिराए। स्वराज, सुमति वाला और स्वयं यशस्वी इन्द्र गायकों के लिए अति कीर्तिमान बने।
आ म॒न्द्रैरि॑न्द्र॒ हरि॑भिर्या॒हि म॒यूर॑रोमभिः ।
मा त्वा॒ के चि॒न्नि य॑म॒न्विं न पा॒शिनोऽति॒ धन्वे॑व॒ ताँ इ॑हि
ā mandrairindra haribhiryāhi mayūraromabhiḥ |
mā tvā ke cinni yamanviṃ na pāśino'ti dhanveva tām̐ ihi
वृ॒त्र॒खा॒दो व॑लंरु॒जः पु॒रां द॒र्मो अ॒पाम॒जः ।
स्थाता॒ रथ॑स्य॒ हर्यो॑रभिस्व॒र इन्द्रो॑ दृ॒ळ्हा चि॑दारु॒जः
vṛtrakhādo valaṃrujaḥ purāṃ darmo apāmajaḥ |
sthātā rathasya haryorabhisvara indro dṛḻhā cidārujaḥ
ग॒म्भी॒राँ उ॑द॒धीँरि॑व॒ क्रतुं॑ पुष्यसि॒ गा इ॑व ।
प्र सु॑गो॒पा यव॑सं धे॒नवो॑ यथा ह्र॒दं कु॒ल्या इ॑वाशत
gambhīrām̐ udadhīm̐riva kratuṃ puṣyasi gā iva |
pra sugopā yavasaṃ dhenavo yathā hradaṃ kulyā ivāśata
आ न॒स्तुजं॑ र॒यिं भ॒रांशं॒ न प्र॑तिजान॒ते ।
वृ॒क्षं प॒क्वं फल॑म॒ङ्कीव॑ धूनु॒हीन्द्र॑ स॒म्पार॑णं॒ वसु॑
ā nastujaṃ rayiṃ bharāṃśaṃ na pratijānate |
vṛkṣaṃ pakvaṃ phalamaṅkīva dhūnuhīndra sampāraṇaṃ vasu
स्व॒युरि॑न्द्र स्व॒राळ॑सि॒ स्मद्दि॑ष्टि॒ः स्वय॑शस्तरः ।
स वा॑वृधा॒न ओज॑सा पुरुष्टुत॒ भवा॑ नः सु॒श्रव॑स्तमः
svayurindra svarāḻasi smaddiṣṭiḥ svayaśastaraḥ |
sa vāvṛdhāna ojasā puruṣṭuta bhavā naḥ suśravastamaḥ
पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)