इस अध्याय में क्या होता है अमृत की नाभि अग्नि विश्वामित्र के पुत्र कत पाँच त्रिष्टुप् मन्त्रों में अग्नि की स्तुति करते हैं। प्रथम धर्मों के अनुसार प्रज्वलित अग्नि अंजनों से अभिषिक्त होता है, ज्वाला के केशों वाला, घी का वस्त्र पहने, पवित्र करने वाला। जैसे उसने पृथ्वी और द्युलोक के लिए यज्ञ किया, वैसे ही इस हवि से मनु की भाँति यज्ञ करे। अग्नि की तीन आयु हैं और उषा के तीन जन्म। देवों ने उसे अपना दूत, हव्यवाहन और अमृत की नाभि बनाया। ऋषि उससे कहते हैं कि वह अपने से पहले के होता के धर्म का पालन करे और यज्ञ को देवों के बीच स्थापित करे।
17.1 स॒मि॒ध्यमा॑नः प्रथ॒मानु॒ धर्मा॒ सम॒क्तुभि॑रज्यते वि॒श्ववा॑रः । शो॒चिष्के॑शो घृ॒तनि॑र्णिक्पाव॒कः सु॑य॒ज्ञो अ॒ग्निर्य॒जथा॑य दे॒वान्
samidhyamānaḥ prathamānu dharmā samaktubhirajyate viśvavāraḥ | śociṣkeśo ghṛtanirṇikpāvakaḥ suyajño agniryajathāya devān
17.2 यथाय॑जो हो॒त्रम॑ग्ने पृथि॒व्या यथा॑ दि॒वो जा॑तवेदश्चिकि॒त्वान् । ए॒वानेन॑ ह॒विषा॑ यक्षि दे॒वान्म॑नु॒ष्वद्य॒ज्ञं प्र ति॑रे॒मम॒द्य
yathāyajo hotramagne pṛthivyā yathā divo jātavedaścikitvān | evānena haviṣā yakṣi devānmanuṣvadyajñaṃ pra tiremamadya
17.3 त्रीण्यायूं॑षि॒ तव॑ जातवेदस्ति॒स्र आ॒जानी॑रु॒षस॑स्ते अग्ने । ताभि॑र्दे॒वाना॒मवो॑ यक्षि वि॒द्वानथा॑ भव॒ यज॑मानाय॒ शं योः
trīṇyāyūṃṣi tava jātavedastisra ājānīruṣasaste agne | tābhirdevānāmavo yakṣi vidvānathā bhava yajamānāya śaṃ yoḥ
17.4 अ॒ग्निं सु॑दी॒तिं सु॒दृशं॑ गृ॒णन्तो॑ नम॒स्याम॒स्त्वेड्यं॑ जातवेदः । त्वां दू॒तम॑र॒तिं ह॑व्य॒वाहं॑ दे॒वा अ॑कृण्वन्न॒मृत॑स्य॒ नाभि॑म्
agniṃ sudītiṃ sudṛśaṃ gṛṇanto namasyāmastveḍyaṃ jātavedaḥ | tvāṃ dūtamaratiṃ havyavāhaṃ devā akṛṇvannamṛtasya nābhim
17.5 यस्त्वद्धोता॒ पूर्वो॑ अग्ने॒ यजी॑यान्द्वि॒ता च॒ सत्ता॑ स्व॒धया॑ च श॒म्भुः । तस्यानु॒ धर्म॒ प्र य॑जा चिकि॒त्वोऽथ॑ नो धा अध्व॒रं दे॒ववी॑तौ
yastvaddhotā pūrvo agne yajīyāndvitā ca sattā svadhayā ca śambhuḥ | tasyānu dharma pra yajā cikitvo'tha no dhā adhvaraṃ devavītau
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