इस अध्याय में क्या होता है मरुभूमि में प्याऊ जैसे अग्नि त्रित आप्त्य यह सूक्त सात त्रिष्टुप् मन्त्रों में अग्नि को अर्पित करते हैं। यज्ञ करना चाहने वाले के लिए अग्नि मरुभूमि में प्याऊ जैसे हैं। लोग उनके पास वैसे आते हैं जैसे गायें गरम बाड़े में जाती हैं। वे देवों और मनुष्यों के बीच दूत हैं। माता उन्हें शिशु की तरह धारण करती है। छूटे पशु की तरह वे भूमि पर दौड़ते हैं, जीभ से वन को खाते हैं, धुआँ उनकी धूसर पताका है। ऋषि मानते हैं कि हम मूढ़ हैं, अग्नि अपनी महिमा जानते हैं। वे रथ की तरह जुती नई स्तुति अर्पित करते हैं और सन्तान व शरीर की निरन्तर रक्षा माँगते हैं।
4.1 प्र ते॑ यक्षि॒ प्र त॑ इयर्मि॒ मन्म॒ भुवो॒ यथा॒ वन्द्यो॑ नो॒ हवे॑षु । धन्व॑न्निव प्र॒पा अ॑सि॒ त्वम॑ग्न इय॒क्षवे॑ पू॒रवे॑ प्रत्न राजन्
pra te yakṣi pra ta iyarmi manma bhuvo yathā vandyo no haveṣu | dhanvanniva prapā asi tvamagna iyakṣave pūrave pratna rājan
4.2 यं त्वा॒ जना॑सो अ॒भि सं॒चर॑न्ति॒ गाव॑ उ॒ष्णमि॑व व्र॒जं य॑विष्ठ । दू॒तो दे॒वाना॑मसि॒ मर्त्या॑नाम॒न्तर्म॒हाँश्च॑रसि रोच॒नेन॑
yaṃ tvā janāso abhi saṃcaranti gāva uṣṇamiva vrajaṃ yaviṣṭha | dūto devānāmasi martyānāmantarmahām̐ścarasi rocanena
4.3 शिशुं॒ न त्वा॒ जेन्यं॑ व॒र्धय॑न्ती मा॒ता बि॑भर्ति सचन॒स्यमा॑ना । धनो॒रधि॑ प्र॒वता॑ यासि॒ हर्य॒ञ्जिगी॑षसे प॒शुरि॒वाव॑सृष्टः
śiśuṃ na tvā jenyaṃ vardhayantī mātā bibharti sacanasyamānā | dhanoradhi pravatā yāsi haryañjigīṣase paśurivāvasṛṣṭaḥ
4.4 मू॒रा अ॑मूर॒ न व॒यं चि॑कित्वो महि॒त्वम॑ग्ने॒ त्वम॒ङ्ग वि॑त्से । शये॑ व॒व्रिश्चर॑ति जि॒ह्वया॒दन्रे॑रि॒ह्यते॑ युव॒तिं वि॒श्पति॒ः सन्
mūrā amūra na vayaṃ cikitvo mahitvamagne tvamaṅga vitse | śaye vavriścarati jihvayādanrerihyate yuvatiṃ viśpatiḥ san
4.5 कूचि॑ज्जायते॒ सन॑यासु॒ नव्यो॒ वने॑ तस्थौ पलि॒तो धू॒मके॑तुः । अ॒स्ना॒तापो॑ वृष॒भो न प्र वे॑ति॒ सचे॑तसो॒ यं प्र॒णय॑न्त॒ मर्ता॑ः
kūcijjāyate sanayāsu navyo vane tasthau palito dhūmaketuḥ | asnātāpo vṛṣabho na pra veti sacetaso yaṃ praṇayanta martāḥ
4.6 त॒नू॒त्यजे॑व॒ तस्क॑रा वन॒र्गू र॑श॒नाभि॑र्द॒शभि॑र॒भ्य॑धीताम् । इ॒यं ते॑ अग्ने॒ नव्य॑सी मनी॒षा यु॒क्ष्वा रथं॒ न शु॒चय॑द्भि॒रङ्गै॑ः
tanūtyajeva taskarā vanargū raśanābhirdaśabhirabhyadhītām | iyaṃ te agne navyasī manīṣā yukṣvā rathaṃ na śucayadbhiraṅgaiḥ
4.7 ब्रह्म॑ च ते जातवेदो॒ नम॑श्चे॒यं च॒ गीः सद॒मिद्वर्ध॑नी भूत् । रक्षा॑ णो अग्ने॒ तन॑यानि तो॒का रक्षो॒त न॑स्त॒न्वो॒३॒॑ अप्र॑युच्छन्
brahma ca te jātavedo namaśceyaṃ ca gīḥ sadamidvardhanī bhūt | rakṣā ṇo agne tanayāni tokā rakṣota nastanvo aprayucchan
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