दशम मण्डल

सूक्त 25: सारे जगत् के रक्षक सोम

ऋषि: ऐन्द्रो विमदः, प्राजापत्यो वा, वासुक्रो वसुकृद्वा · देवता: सोमः · छन्द: आस्तारपङ्क्तिः

11 श्लोक · 25 में से 191

इस अध्याय में क्या होता है

सारे जगत् के रक्षक सोम

विमद ऐन्द्र, या प्राजापत्य, या वासुक्र ग्यारह आस्तारपङ्क्ति मन्त्रों में सोम की स्तुति करते हैं, टेक है वि वो मदे, विवक्षसे। आरम्भ बीसवें सूक्त वाली प्रार्थना से होता है: हमारे मन, दक्षता और संकल्प को कल्याणमय करो। सोम की मित्रता में हम चरागाह की गायों जैसे आनन्दित हों। ऋषि मानते हैं कि भोलेपन में वे सोम के व्रत तोड़ते हैं, और विनती करते हैं कि पिता पुत्र पर जैसे दया करता है वैसे दया करो। सोम हमारे पशुओं और दूर तक फैले जगत् की रक्षा करते हैं। युद्ध में वे इन्द्र के मित्र हैं। उन्होंने कक्षीवान की सहायता की और अन्धे तथा लँगड़े को पार लगाया।

25.1

भ॒द्रं नो॒ अपि॑ वातय॒ मनो॒ दक्ष॑मु॒त क्रतु॑म् ।
अधा॑ ते स॒ख्ये अन्ध॑सो॒ वि वो॒ मदे॒ रण॒न्गावो॒ न यव॑से॒ विव॑क्षसे

bhadraṃ no api vātaya mano dakṣamuta kratum |
adhā te sakhye andhaso vi vo made raṇangāvo na yavase vivakṣase

25.2

हृ॒दि॒स्पृश॑स्त आसते॒ विश्वे॑षु सोम॒ धाम॑सु ।
अधा॒ कामा॑ इ॒मे मम॒ वि वो॒ मदे॒ वि ति॑ष्ठन्ते वसू॒यवो॒ विव॑क्षसे

hṛdispṛśasta āsate viśveṣu soma dhāmasu |
adhā kāmā ime mama vi vo made vi tiṣṭhante vasūyavo vivakṣase

25.3

उ॒त व्र॒तानि॑ सोम ते॒ प्राहं मि॑नामि पा॒क्या॑ ।
अधा॑ पि॒तेव॑ सू॒नवे॒ वि वो॒ मदे॑ मृ॒ळा नो॑ अ॒भि चि॑द्व॒धाद्विव॑क्षसे

uta vratāni soma te prāhaṃ mināmi pākyā |
adhā piteva sūnave vi vo made mṛḻā no abhi cidvadhādvivakṣase

25.4

समु॒ प्र य॑न्ति धी॒तय॒ः सर्गा॑सोऽव॒ताँ इ॑व ।
क्रतुं॑ नः सोम जी॒वसे॒ वि वो॒ मदे॑ धा॒रया॑ चम॒साँ इ॑व॒ विव॑क्षसे

samu pra yanti dhītayaḥ sargāso'vatām̐ iva |
kratuṃ naḥ soma jīvase vi vo made dhārayā camasām̐ iva vivakṣase

25.5

तव॒ त्ये सो॑म॒ शक्ति॑भि॒र्निका॑मासो॒ व्यृ॑ण्विरे ।
गृत्स॑स्य॒ धीरा॑स्त॒वसो॒ वि वो॒ मदे॑ व्र॒जं गोम॑न्तम॒श्विनं॒ विव॑क्षसे

tava tye soma śaktibhirnikāmāso vyṛṇvire |
gṛtsasya dhīrāstavaso vi vo made vrajaṃ gomantamaśvinaṃ vivakṣase

25.6

प॒शुं न॑ः सोम रक्षसि पुरु॒त्रा विष्ठि॑तं॒ जग॑त् ।
स॒माकृ॑णोषि जी॒वसे॒ वि वो॒ मदे॒ विश्वा॑ स॒म्पश्य॒न्भुव॑ना॒ विव॑क्षसे

paśuṃ naḥ soma rakṣasi purutrā viṣṭhitaṃ jagat |
samākṛṇoṣi jīvase vi vo made viśvā sampaśyanbhuvanā vivakṣase

25.7

त्वं न॑ः सोम वि॒श्वतो॑ गो॒पा अदा॑भ्यो भव ।
सेध॑ राज॒न्नप॒ स्रिधो॒ वि वो॒ मदे॒ मा नो॑ दु॒ःशंस॑ ईशता॒ विव॑क्षसे

tvaṃ naḥ soma viśvato gopā adābhyo bhava |
sedha rājannapa sridho vi vo made mā no duḥśaṃsa īśatā vivakṣase

25.8

त्वं न॑ः सोम सु॒क्रतु॑र्वयो॒धेया॑य जागृहि ।
क्षे॒त्र॒वित्त॑रो॒ मनु॑षो॒ वि वो॒ मदे॑ द्रु॒हो न॑ः पा॒ह्यंह॑सो॒ विव॑क्षसे

tvaṃ naḥ soma sukraturvayodheyāya jāgṛhi |
kṣetravittaro manuṣo vi vo made druho naḥ pāhyaṃhaso vivakṣase

25.9

त्वं नो॑ वृत्रहन्त॒मेन्द्र॑स्येन्दो शि॒वः सखा॑ ।
यत्सीं॒ हव॑न्ते समि॒थे वि वो॒ मदे॒ युध्य॑मानास्तो॒कसा॑तौ॒ विव॑क्षसे

tvaṃ no vṛtrahantamendrasyendo śivaḥ sakhā |
yatsīṃ havante samithe vi vo made yudhyamānāstokasātau vivakṣase

25.10

अ॒यं घ॒ स तु॒रो मद॒ इन्द्र॑स्य वर्धत प्रि॒यः ।
अ॒यं क॒क्षीव॑तो म॒हो वि वो॒ मदे॑ म॒तिं विप्र॑स्य वर्धय॒द्विव॑क्षसे

ayaṃ gha sa turo mada indrasya vardhata priyaḥ |
ayaṃ kakṣīvato maho vi vo made matiṃ viprasya vardhayadvivakṣase

25.11

अ॒यं विप्रा॑य दा॒शुषे॒ वाजाँ॑ इयर्ति॒ गोम॑तः ।
अ॒यं स॒प्तभ्य॒ आ वरं॒ वि वो॒ मदे॒ प्रान्धं श्रो॒णं च॑ तारिष॒द्विव॑क्षसे

ayaṃ viprāya dāśuṣe vājām̐ iyarti gomataḥ |
ayaṃ saptabhya ā varaṃ vi vo made prāndhaṃ śroṇaṃ ca tāriṣadvivakṣase

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