समि॑द्धश्चि॒त्समि॑ध्यसे दे॒वेभ्यो॑ हव्यवाहन ।
आ॒दि॒त्यै रु॒द्रैर्वसु॑भिर्न॒ आ ग॑हि मृळी॒काय॑ न॒ आ ग॑हि
samiddhaścitsamidhyase devebhyo havyavāhana |
ādityai rudrairvasubhirna ā gahi mṛḻīkāya na ā gahi
ऋषि: मृडीको वासिष्ठः · देवता: अग्निः · छन्द: बृहती, ४-५ उपरिष्टाज्ज्योतिः, ४ जगती वा
5 श्लोक · 150 में से 191
मृडीक वासिष्ठ बृहती आदि छन्दों में अग्नि की स्तुति करते हैं, और हर मन्त्र मृडीक, अर्थात् कृपा, पर टिका है। हे देवों के लिए हवि ले जाने वाले, प्रज्वलित होकर आदित्यों, रुद्रों और वसुओं के साथ आओ; हमारी कृपा के लिए आओ। इस यज्ञ और इस वाणी को स्वीकार करो; हम मनुष्य तुम्हें जलाते हुए पुकारते हैं। मैं सबके चाहे जातवेद की स्तुति करता हूँ; व्रतों से प्रेम करने वाले देवों को लाओ। अग्नि देवों के पुरोहित बने; मनुष्यों और ऋषियों ने उन्हें प्रज्वलित किया। अग्नि ने युद्ध में अत्रि, भरद्वाज, गविष्ठिर, कण्व और त्रसदस्यु की रक्षा की, और पुरोहित वसिष्ठ कृपा के लिए उन्हें पुकारते हैं।
समि॑द्धश्चि॒त्समि॑ध्यसे दे॒वेभ्यो॑ हव्यवाहन ।
आ॒दि॒त्यै रु॒द्रैर्वसु॑भिर्न॒ आ ग॑हि मृळी॒काय॑ न॒ आ ग॑हि
samiddhaścitsamidhyase devebhyo havyavāhana |
ādityai rudrairvasubhirna ā gahi mṛḻīkāya na ā gahi
इ॒मं य॒ज्ञमि॒दं वचो॑ जुजुषा॒ण उ॒पाग॑हि ।
मर्ता॑सस्त्वा समिधान हवामहे मृळी॒काय॑ हवामहे
imaṃ yajñamidaṃ vaco jujuṣāṇa upāgahi |
martāsastvā samidhāna havāmahe mṛḻīkāya havāmahe
त्वामु॑ जा॒तवे॑दसं वि॒श्ववा॑रं गृणे धि॒या ।
अग्ने॑ दे॒वाँ आ व॑ह नः प्रि॒यव्र॑तान्मृळी॒काय॑ प्रि॒यव्र॑तान्
tvāmu jātavedasaṃ viśvavāraṃ gṛṇe dhiyā |
agne devām̐ ā vaha naḥ priyavratānmṛḻīkāya priyavratān
अ॒ग्निर्दे॒वो दे॒वाना॑मभवत्पु॒रोहि॑तो॒ऽग्निं म॑नु॒ष्या॒३॒॑ ऋष॑य॒ः समी॑धिरे ।
अ॒ग्निं म॒हो धन॑साताव॒हं हु॑वे मृळी॒कं धन॑सातये
agnirdevo devānāmabhavatpurohito'gniṃ manuṣyā ṛṣayaḥ samīdhire |
agniṃ maho dhanasātāvahaṃ huve mṛḻīkaṃ dhanasātaye
अ॒ग्निरत्रिं॑ भ॒रद्वा॑जं॒ गवि॑ष्ठिरं॒ प्राव॑न्न॒ः कण्वं॑ त्र॒सद॑स्युमाह॒वे ।
अ॒ग्निं वसि॑ष्ठो हवते पु॒रोहि॑तो मृळी॒काय॑ पु॒रोहि॑तः
agniratriṃ bharadvājaṃ gaviṣṭhiraṃ prāvannaḥ kaṇvaṃ trasadasyumāhave |
agniṃ vasiṣṭho havate purohito mṛḻīkāya purohitaḥ
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