दशम मण्डल

सूक्त 139: सविता का उदय और विश्वावसु की वाणी

ऋषि: देवगन्धर्वो विश्वावसुः · देवता: सविता, ४-६ आत्मा · छन्द: त्रिष्टुप्

6 श्लोक · 139 में से 191

इस अध्याय में क्या होता है

सविता का उदय और विश्वावसु की वाणी

ऋषि दिव्य गन्धर्व विश्वावसु हैं, छन्द त्रिष्टुप्; देवता सविता, और चौथे से छठे मन्त्र में आत्मा। सूर्य की किरणों वाले, स्वर्णिम केशों वाले सविता पूर्व में अपनी अविनाशी ज्योति उठाते हैं, और सब भुवनों के रक्षक पूषा उनकी प्रेरणा में चलते हैं। आकाश के मध्य बैठे वे द्युलोक, पृथ्वी और अन्तरिक्ष को भरते हैं और सत्यधर्मा होकर सब रूपों को देखते हैं। जलों ने गन्धर्व विश्वावसु को देखा और ऋत से अलग हो गए; इन्द्र पीछे गए और सूर्य की परिधियों को देखा। लोकों को मापने वाले विश्वावसु से प्रार्थना है कि जो सत्य है और जो हम नहीं जानते, वह हमें बताएँ और हमारी बुद्धि की रक्षा करें।

139.1

सूर्य॑रश्मि॒र्हरि॑केशः पु॒रस्ता॑त्सवि॒ता ज्योति॒रुद॑याँ॒ अज॑स्रम् ।
तस्य॑ पू॒षा प्र॑स॒वे या॑ति वि॒द्वान्स॒म्पश्य॒न्विश्वा॒ भुव॑नानि गो॒पाः

sūryaraśmirharikeśaḥ purastātsavitā jyotirudayām̐ ajasram |
tasya pūṣā prasave yāti vidvānsampaśyanviśvā bhuvanāni gopāḥ

139.2

नृ॒चक्षा॑ ए॒ष दि॒वो मध्य॑ आस्त आपप्रि॒वान्रोद॑सी अ॒न्तरि॑क्षम् ।
स वि॒श्वाची॑र॒भि च॑ष्टे घृ॒ताची॑रन्त॒रा पूर्व॒मप॑रं च के॒तुम्

nṛcakṣā eṣa divo madhya āsta āpaprivānrodasī antarikṣam |
sa viśvācīrabhi caṣṭe ghṛtācīrantarā pūrvamaparaṃ ca ketum

139.3

रा॒यो बु॒ध्नः सं॒गम॑नो॒ वसू॑नां॒ विश्वा॑ रू॒पाभि च॑ष्टे॒ शची॑भिः ।
दे॒व इ॑व सवि॒ता स॒त्यध॒र्मेन्द्रो॒ न त॑स्थौ सम॒रे धना॑नाम्

rāyo budhnaḥ saṃgamano vasūnāṃ viśvā rūpābhi caṣṭe śacībhiḥ |
deva iva savitā satyadharmendro na tasthau samare dhanānām

139.4

वि॒श्वाव॑सुं सोम गन्ध॒र्वमापो॑ ददृ॒शुषी॒स्तदृ॒तेना॒ व्या॑यन् ।
तद॒न्ववै॒दिन्द्रो॑ रारहा॒ण आ॑सां॒ परि॒ सूर्य॑स्य परि॒धीँर॑पश्यत्

viśvāvasuṃ soma gandharvamāpo dadṛśuṣīstadṛtenā vyāyan |
tadanvavaidindro rārahāṇa āsāṃ pari sūryasya paridhīm̐rapaśyat

139.5

वि॒श्वाव॑सुर॒भि तन्नो॑ गृणातु दि॒व्यो ग॑न्ध॒र्वो रज॑सो वि॒मान॑ः ।
यद्वा॑ घा स॒त्यमु॒त यन्न वि॒द्म धियो॑ हिन्वा॒नो धिय॒ इन्नो॑ अव्याः

viśvāvasurabhi tanno gṛṇātu divyo gandharvo rajaso vimānaḥ |
yadvā ghā satyamuta yanna vidma dhiyo hinvāno dhiya inno avyāḥ

139.6

सस्नि॑मविन्द॒च्चर॑णे न॒दीना॒मपा॑वृणो॒द्दुरो॒ अश्म॑व्रजानाम् ।
प्रासां॑ गन्ध॒र्वो अ॒मृता॑नि वोच॒दिन्द्रो॒ दक्षं॒ परि॑ जानाद॒हीना॑म्

sasnimavindaccaraṇe nadīnāmapāvṛṇodduro aśmavrajānām |
prāsāṃ gandharvo amṛtāni vocadindro dakṣaṃ pari jānādahīnām

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