दशम मण्डल

सूक्त 135: कुमार और यम का वृक्ष

ऋषि: कुमारो यामायनः · देवता: यमः · छन्द: अनुष्टुप्

7 श्लोक · 135 में से 191

इस अध्याय में क्या होता है

कुमार और यम का वृक्ष

कुमार यामायन अनुष्टुप् में यम को संबोधित करते हैं। सुंदर पत्तों वाले जिस वृक्ष में यम देवों के साथ पान करते हैं, वहाँ हमारे पिता, गृहस्वामी, पूर्वजों की कामना करते हैं। बालक ने उन्हें उस मार्ग पर जाते देखा, और पहले खिन्न होकर भी फिर उनकी चाह की। "हे कुमार, बिना पहियों का जो नया रथ तुमने मन से बनाया, उस पर तुम बिना देखे चढ़ते हो।" बालक के चलाए रथ के पीछे साम चला। बालक को किसने जन्म दिया, रथ किसने घुमाया? अंतिम मन्त्र: यह यम का आसन है, देवों का भवन कहलाता है; यहाँ उनकी बाँसुरी बजती है, यहाँ वे स्तोत्रों से सजे हैं।

135.1

यस्मि॑न्वृ॒क्षे सु॑पला॒शे दे॒वैः स॒म्पिब॑ते य॒मः ।
अत्रा॑ नो वि॒श्पति॑ः पि॒ता पु॑रा॒णाँ अनु॑ वेनति

yasminvṛkṣe supalāśe devaiḥ sampibate yamaḥ |
atrā no viśpatiḥ pitā purāṇām̐ anu venati

135.2

पु॒रा॒णाँ अ॑नु॒वेन॑न्तं॒ चर॑न्तं पा॒पया॑मु॒या ।
अ॒सू॒यन्न॒भ्य॑चाकशं॒ तस्मा॑ अस्पृहयं॒ पुन॑ः

purāṇām̐ anuvenantaṃ carantaṃ pāpayāmuyā |
asūyannabhyacākaśaṃ tasmā aspṛhayaṃ punaḥ

135.3

यं कु॑मार॒ नवं॒ रथ॑मच॒क्रं मन॒साकृ॑णोः ।
एके॑षं वि॒श्वत॒ः प्राञ्च॒मप॑श्य॒न्नधि॑ तिष्ठसि

yaṃ kumāra navaṃ rathamacakraṃ manasākṛṇoḥ |
ekeṣaṃ viśvataḥ prāñcamapaśyannadhi tiṣṭhasi

135.4

यं कु॑मार॒ प्राव॑र्तयो॒ रथं॒ विप्रे॑भ्य॒स्परि॑ ।
तं सामानु॒ प्राव॑र्तत॒ समि॒तो ना॒व्याहि॑तम्

yaṃ kumāra prāvartayo rathaṃ viprebhyaspari |
taṃ sāmānu prāvartata samito nāvyāhitam

135.5

कः कु॑मा॒रम॑जनय॒द्रथं॒ को निर॑वर्तयत् ।
कः स्वि॒त्तद॒द्य नो॑ ब्रूयादनु॒देयी॒ यथाभ॑वत्

kaḥ kumāramajanayadrathaṃ ko niravartayat |
kaḥ svittadadya no brūyādanudeyī yathābhavat

135.6

यथाभ॑वदनु॒देयी॒ ततो॒ अग्र॑मजायत ।
पु॒रस्ता॑द्बु॒ध्न आत॑तः प॒श्चान्नि॒रय॑णं कृ॒तम्

yathābhavadanudeyī tato agramajāyata |
purastādbudhna ātataḥ paścānnirayaṇaṃ kṛtam

135.7

इ॒दं य॒मस्य॒ साद॑नं देवमा॒नं यदु॒च्यते॑ ।
इ॒यम॑स्य धम्यते ना॒ळीर॒यं गी॒र्भिः परि॑ष्कृतः

idaṃ yamasya sādanaṃ devamānaṃ yaducyate |
iyamasya dhamyate nāḻīrayaṃ gīrbhiḥ pariṣkṛtaḥ

पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)