प्रथम मण्डल

सूक्त 81: इन्द्र, हर संग्राम में धन देने वाले

ऋषि: गोतमो राहूगणः · देवता: इन्द्रः · छन्द: पंक्तिः

9 श्लोक · 81 में से 191

इस अध्याय में क्या होता है

इन्द्र, हर संग्राम में धन देने वाले

गोतम राहूगण पंक्ति छन्द में इन्द्र को पुकारते हैं। सोम के आनन्द से इन्द्र का बल बढ़ता है; वे वृत्र के संहारक हैं, जिन्हें लोग बड़े और छोटे दोनों युद्धों में बुलाते हैं। वे सेना के वीर हैं, बहुत धन जीत लाने वाले, और सोम निचोड़ने वाले साधारण यजमान के भी सहायक। हरि घोड़ों को जोतकर वे पृथ्वी के विस्तार को भर देते हैं और आकाश में ज्योतियों को थामते हैं; उनके समान न कोई जन्मा, न जन्मेगा। ऋषि माँगते हैं कि वे दोनों हाथों में धन भरें, गायों के झुण्ड दें, और जो दान नहीं करता उसका धन लाकर उपासकों में बाँट दें।

81.1

इन्द्रो॒ मदा॑य वावृधे॒ शव॑से वृत्र॒हा नृभि॑ः ।
तमिन्म॒हत्स्वा॒जिषू॒तेमर्भे॑ हवामहे॒ स वाजे॑षु॒ प्र नो॑ऽविषत्

indro madāya vāvṛdhe śavase vṛtrahā nṛbhiḥ |
taminmahatsvājiṣūtemarbhe havāmahe sa vājeṣu pra no'viṣat

81.2

असि॒ हि वी॑र॒ सेन्योऽसि॒ भूरि॑ पराद॒दिः ।
असि॑ द॒भ्रस्य॑ चिद्वृ॒धो यज॑मानाय शिक्षसि सुन्व॒ते भूरि॑ ते॒ वसु॑

asi hi vīra senyo'si bhūri parādadiḥ |
asi dabhrasya cidvṛdho yajamānāya śikṣasi sunvate bhūri te vasu

81.3

यदु॒दीर॑त आ॒जयो॑ धृ॒ष्णवे॑ धीयते॒ धना॑ ।
यु॒क्ष्वा म॑द॒च्युता॒ हरी॒ कं हन॒ः कं वसौ॑ दधो॒ऽस्माँ इ॑न्द्र॒ वसौ॑ दधः

yadudīrata ājayo dhṛṣṇave dhīyate dhanā |
yukṣvā madacyutā harī kaṃ hanaḥ kaṃ vasau dadho'smām̐ indra vasau dadhaḥ

81.4

क्रत्वा॑ म॒हाँ अ॑नुष्व॒धं भी॒म आ वा॑वृधे॒ शव॑ः ।
श्रि॒य ऋ॒ष्व उ॑पा॒कयो॒र्नि शि॒प्री हरि॑वान्दधे॒ हस्त॑यो॒र्वज्र॑माय॒सम्

kratvā mahām̐ anuṣvadhaṃ bhīma ā vāvṛdhe śavaḥ |
śriya ṛṣva upākayorni śiprī harivāndadhe hastayorvajramāyasam

81.5

आ प॑प्रौ॒ पार्थि॑वं॒ रजो॑ बद्ब॒धे रो॑च॒ना दि॒वि ।
न त्वावाँ॑ इन्द्र॒ कश्च॒न न जा॒तो न ज॑निष्य॒तेऽति॒ विश्वं॑ ववक्षिथ

ā paprau pārthivaṃ rajo badbadhe rocanā divi |
na tvāvām̐ indra kaścana na jāto na janiṣyate'ti viśvaṃ vavakṣitha

81.6

यो अ॒र्यो म॑र्त॒भोज॑नं परा॒ददा॑ति दा॒शुषे॑ ।
इन्द्रो॑ अ॒स्मभ्यं॑ शिक्षतु॒ वि भ॑जा॒ भूरि॑ ते॒ वसु॑ भक्षी॒य तव॒ राध॑सः

yo aryo martabhojanaṃ parādadāti dāśuṣe |
indro asmabhyaṃ śikṣatu vi bhajā bhūri te vasu bhakṣīya tava rādhasaḥ

81.7

मदे॑मदे॒ हि नो॑ द॒दिर्यू॒था गवा॑मृजु॒क्रतु॑ः ।
सं गृ॑भाय पु॒रू श॒तोभ॑याह॒स्त्या वसु॑ शिशी॒हि रा॒य आ भ॑र

mademade hi no dadiryūthā gavāmṛjukratuḥ |
saṃ gṛbhāya purū śatobhayāhastyā vasu śiśīhi rāya ā bhara

81.8

मा॒दय॑स्व सु॒ते सचा॒ शव॑से शूर॒ राध॑से ।
वि॒द्मा हि त्वा॑ पुरू॒वसु॒मुप॒ कामा॑न्ससृ॒ज्महेऽथा॑ नोऽवि॒ता भ॑व

mādayasva sute sacā śavase śūra rādhase |
vidmā hi tvā purūvasumupa kāmānsasṛjmahe'thā no'vitā bhava

81.9

ए॒ते त॑ इन्द्र ज॒न्तवो॒ विश्वं॑ पुष्यन्ति॒ वार्य॑म् ।
अ॒न्तर्हि ख्यो जना॑नाम॒र्यो वेदो॒ अदा॑शुषां॒ तेषां॑ नो॒ वेद॒ आ भ॑र

ete ta indra jantavo viśvaṃ puṣyanti vāryam |
antarhi khyo janānāmaryo vedo adāśuṣāṃ teṣāṃ no veda ā bhara

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