जु॒षस्व॑ स॒प्रथ॑स्तमं॒ वचो॑ दे॒वप्स॑रस्तमम् ।
ह॒व्या जुह्वा॑न आ॒सनि॑
juṣasva saprathastamaṃ vaco devapsarastamam |
havyā juhvāna āsani
ऋषि: गोतमो राहूगणः · देवता: अग्निः · छन्द: गायत्री
5 श्लोक · 75 में से 191
हे अग्नि, अपने मुख में हवि लेते हुए यह विस्तृत वाणी स्वीकार करो। गायत्री छन्द के पाँच मन्त्रों में गोतम राहूगण पूछते हैं: मनुष्यों में तुम्हारा बन्धु कौन है, कौन तुम्हारा ठीक यजन करता है, तुम कौन हो, किसमें स्थित हो? और स्वयं उत्तर देते हैं: तुम मनुष्यों के बन्धु हो, प्रिय मित्र, सखाओं द्वारा स्तुति योग्य सखा। वे अग्नि से मित्र और वरुण का, देवों का, महान ऋत का और अपने घर का यजन करने को कहते हैं।
जु॒षस्व॑ स॒प्रथ॑स्तमं॒ वचो॑ दे॒वप्स॑रस्तमम् ।
ह॒व्या जुह्वा॑न आ॒सनि॑
juṣasva saprathastamaṃ vaco devapsarastamam |
havyā juhvāna āsani
अथा॑ ते अङ्गिरस्त॒माग्ने॑ वेधस्तम प्रि॒यम् ।
वो॒चेम॒ ब्रह्म॑ सान॒सि
athā te aṅgirastamāgne vedhastama priyam |
vocema brahma sānasi
कस्ते॑ जा॒मिर्जना॑ना॒मग्ने॒ को दा॒श्व॑ध्वरः ।
को ह॒ कस्मि॑न्नसि श्रि॒तः
kaste jāmirjanānāmagne ko dāśvadhvaraḥ |
ko ha kasminnasi śritaḥ
त्वं जा॒मिर्जना॑ना॒मग्ने॑ मि॒त्रो अ॑सि प्रि॒यः ।
सखा॒ सखि॑भ्य॒ ईड्य॑ः
tvaṃ jāmirjanānāmagne mitro asi priyaḥ |
sakhā sakhibhya īḍyaḥ
यजा॑ नो मि॒त्रावरु॑णा॒ यजा॑ दे॒वाँ ऋ॒तं बृ॒हत् ।
अग्ने॒ यक्षि॒ स्वं दम॑म्
yajā no mitrāvaruṇā yajā devām̐ ṛtaṃ bṛhat |
agne yakṣi svaṃ damam
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