प्रथम मण्डल

सूक्त 74: वृत्रहन्ता अग्नि, निःशब्द दूत

ऋषि: गोतमो राहूगणः · देवता: अग्निः · छन्द: गायत्री

9 श्लोक · 74 में से 191

इस अध्याय में क्या होता है

वृत्रहन्ता अग्नि, निःशब्द दूत

यज्ञ की ओर जाते हुए हम अग्नि के लिए मन्त्र बोलें, जो दूर और पास से सुनते हैं। गोतम राहूगण गायत्री छन्द में ऐसे आरम्भ करते हैं। जब जनसमूह भिड़े, अग्नि ने दाता के घर की रक्षा की। लोग कहें: वृत्रहन्ता अग्नि जन्मे हैं, हर युद्ध में धन जीतने वाले। जिसके घर वे दूत हैं, उसका यज्ञ अद्भुत बना देते हैं। उन्हें अंगिरा और बल का पुत्र कहा जाता है। जब वे देवों के पास दूत बनकर जाते हैं, तो न अश्व का शब्द सुनाई देता है न रथ का। उनसे रक्षित दाता आगे खड़ा होता है, और अग्नि देवों से उसके लिए तेजस्वी बल माँगते हैं।

74.1

उ॒प॒प्र॒यन्तो॑ अध्व॒रं मन्त्रं॑ वोचेमा॒ग्नये॑ ।
आ॒रे अ॒स्मे च॑ शृण्व॒ते

upaprayanto adhvaraṃ mantraṃ vocemāgnaye |
āre asme ca śṛṇvate

74.2

यः स्नीहि॑तीषु पू॒र्व्यः सं॑जग्मा॒नासु॑ कृ॒ष्टिषु॑ ।
अर॑क्षद्दा॒शुषे॒ गय॑म्

yaḥ snīhitīṣu pūrvyaḥ saṃjagmānāsu kṛṣṭiṣu |
arakṣaddāśuṣe gayam

74.3

उ॒त ब्रु॑वन्तु ज॒न्तव॒ उद॒ग्निर्वृ॑त्र॒हाज॑नि ।
ध॒नं॒ज॒यो रणे॑रणे

uta bruvantu jantava udagnirvṛtrahājani |
dhanaṃjayo raṇeraṇe

74.4

यस्य॑ दू॒तो असि॒ क्षये॒ वेषि॑ ह॒व्यानि॑ वी॒तये॑ ।
द॒स्मत्कृ॒णोष्य॑ध्व॒रम्

yasya dūto asi kṣaye veṣi havyāni vītaye |
dasmatkṛṇoṣyadhvaram

74.5

तमित्सु॑ह॒व्यम॑ङ्गिरः सुदे॒वं स॑हसो यहो ।
जना॑ आहुः सुब॒र्हिष॑म्

tamitsuhavyamaṅgiraḥ sudevaṃ sahaso yaho |
janā āhuḥ subarhiṣam

74.6

आ च॒ वहा॑सि॒ ताँ इ॒ह दे॒वाँ उप॒ प्रश॑स्तये ।
ह॒व्या सु॑श्चन्द्र वी॒तये॑

ā ca vahāsi tām̐ iha devām̐ upa praśastaye |
havyā suścandra vītaye

74.7

न योरु॑प॒ब्दिरश्व्य॑ः शृ॒ण्वे रथ॑स्य॒ कच्च॒न ।
यद॑ग्ने॒ यासि॑ दू॒त्य॑म्

na yorupabdiraśvyaḥ śṛṇve rathasya kaccana |
yadagne yāsi dūtyam

74.8

त्वोतो॑ वा॒ज्यह्र॑यो॒ऽभि पूर्व॑स्मा॒दप॑रः ।
प्र दा॒श्वाँ अ॑ग्ने अस्थात्

tvoto vājyahrayo'bhi pūrvasmādaparaḥ |
pra dāśvām̐ agne asthāt

74.9

उ॒त द्यु॒मत्सु॒वीर्यं॑ बृ॒हद॑ग्ने विवाससि ।
दे॒वेभ्यो॑ देव दा॒शुषे॑

uta dyumatsuvīryaṃ bṛhadagne vivāsasi |
devebhyo deva dāśuṣe

पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)