शु॒क्रः शु॑शु॒क्वाँ उ॒षो न जा॒रः प॒प्रा स॑मी॒ची दि॒वो न ज्योति॑ः
śukraḥ śuśukvām̐ uṣo na jāraḥ paprā samīcī divo na jyotiḥ
ऋषि: पराशरः शाक्त्यः · देवता: अग्निः · छन्द: द्विपदा विराट्
10 श्लोक · 69 में से 191
उज्ज्वल अग्नि उषा के प्रियतम की तरह चमकते हुए द्युलोक की ज्योति की तरह द्यावापृथिवी को भर चुके हैं। द्विपदा विराट् छन्द में पराशर शाक्त्य गाते हैं कि जन्म लेकर उन्होंने अपनी शक्ति से सब कुछ घेर लिया: पुत्र होकर भी वे देवों के पिता बने। वे गौओं के थन की तरह, अन्न की तरह मधुर हैं। लोगों में मित्र जैसे प्रिय, वे घर के बीच बैठते हैं, नवजात पुत्र जैसे आनन्ददायक। उनके व्रतों को कोई नहीं तोड़ता। अपने आप द्वार खोलकर सब लोग उनके दर्शन से आनन्दित होते हैं।
शु॒क्रः शु॑शु॒क्वाँ उ॒षो न जा॒रः प॒प्रा स॑मी॒ची दि॒वो न ज्योति॑ः
śukraḥ śuśukvām̐ uṣo na jāraḥ paprā samīcī divo na jyotiḥ
परि॒ प्रजा॑त॒ः क्रत्वा॑ बभूथ॒ भुवो॑ दे॒वानां॑ पि॒ता पु॒त्रः सन्
pari prajātaḥ kratvā babhūtha bhuvo devānāṃ pitā putraḥ san
वे॒धा अदृ॑प्तो अ॒ग्निर्वि॑जा॒नन्नूध॒र्न गोनां॒ स्वाद्मा॑ पितू॒नाम्
vedhā adṛpto agnirvijānannūdharna gonāṃ svādmā pitūnām
जने॒ न शेव॑ आ॒हूर्य॒ः सन्मध्ये॒ निष॑त्तो र॒ण्वो दु॑रो॒णे
jane na śeva āhūryaḥ sanmadhye niṣatto raṇvo duroṇe
पु॒त्रो न जा॒तो र॒ण्वो दु॑रो॒णे वा॒जी न प्री॒तो विशो॒ वि ता॑रीत्
putro na jāto raṇvo duroṇe vājī na prīto viśo vi tārīt
विशो॒ यदह्वे॒ नृभि॒ः सनी॑ळा अ॒ग्निर्दे॑व॒त्वा विश्वा॑न्यश्याः
viśo yadahve nṛbhiḥ sanīḻā agnirdevatvā viśvānyaśyāḥ
नकि॑ष्ट ए॒ता व्र॒ता मि॑नन्ति॒ नृभ्यो॒ यदे॒भ्यः श्रु॒ष्टिं च॒कर्थ॑
nakiṣṭa etā vratā minanti nṛbhyo yadebhyaḥ śruṣṭiṃ cakartha
तत्तु ते॒ दंसो॒ यदह॑न्समा॒नैर्नृभि॒र्यद्यु॒क्तो वि॒वे रपां॑सि
tattu te daṃso yadahansamānairnṛbhiryadyukto vive rapāṃsi
उ॒षो न जा॒रो वि॒भावो॒स्रः संज्ञा॑तरूप॒श्चिके॑तदस्मै
uṣo na jāro vibhāvosraḥ saṃjñātarūpaściketadasmai
त्मना॒ वह॑न्तो॒ दुरो॒ व्यृ॑ण्व॒न्नव॑न्त॒ विश्वे॒ स्व१॒॑र्दृशी॑के
tmanā vahanto duro vyṛṇvannavanta viśve svardṛśīke
पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)