लंकाकाण्ड

अध्याय 80: धर्ममय रथ, जिससे हर विजय मिलती है

9 श्लोक · 80 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

धर्ममय रथ, जिससे हर विजय मिलती है

रावण को रथ पर और रघुवीर को पैदल देखकर विभीषण अधीर होकर पूछते हैं: नाथ, न रथ है, न कवच, न पैरों में जूते; इतने बलवान वीर को कैसे जीतेंगे? कृपानिधान कहते हैं: सखा, जिससे विजय होती है वह रथ दूसरा है। शौर्य और धैर्य उसके पहिए हैं, सत्य और शील ध्वजा-पताका हैं। बल, विवेक, इन्द्रिय-संयम और परोपकार घोड़े हैं, जो क्षमा, कृपा और समता की रस्सी से जुड़े हैं। ईश्वर का भजन चतुर सारथी है, वैराग्य ढाल, सन्तोष तलवार, बुद्धि प्रचण्ड शक्ति और श्रेष्ठ विज्ञान कठोर धनुष है। निर्मल, अचल मन तरकश है, शम, यम और नियम बाण हैं, ब्राह्मणों और गुरु की पूजा अभेद्य कवच है। जिसके पास ऐसा रथ हो, वह संसार रूपी महान शत्रु को भी जीत लेता है। विभीषण हर्षित होकर चरण पकड़ लेते हैं।

80.1

रावनु रथी बिरथ रघुबीरा । देखि बिभीषन भयउ अधीरा ॥
अधिक प्रीति मन भा सन्देहा । बन्दि चरन कह सहित सनेहा ॥

rāvanu rathī biratha raghubīrā | dekhi bibhīṣana bhayau adhīrā ||
adhika prīti mana bhā sandehā | bandi carana kaha sahita sanehā ||

80.2

नाथ न रथ नहिँ तनु पद त्राना । केहि बिधि जितब बीर बलवाना ॥
सुनहु सखा कह कृपानिधाना । जेहिं जय होइ सो स्यन्दन आना ॥

nātha na ratha nahim̐ tanu pada trānā | kehi bidhi jitaba bīra balavānā ||
sunahu sakhā kaha kṛpānidhānā | jehiṃ jaya hoi so syandana ānā ||

80.3

सौरज धीरज तेहि रथ चाका । सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका ॥
बल-बिबेक-दम-परहित घोरे । छमा-कृपा-समता रजु जोरे ॥

sauraja dhīraja tehi ratha cākā | satya sīla dṛr̤ha dhvajā patākā ||
bala-bibeka-dama-parahita ghore | chamā-kṛpā-samatā raju jore ||

80.4

ईस भजन सारथी-सुजाना । बिरति धर्म सन्तोष-कृपाना ॥
दान-परसु बुधि-सक्ति प्रचंडा । पर-बिग्यान-कठिन-कोदंडा ॥

īsa bhajana sārathī-sujānā | birati dharma santoṣa-kṛpānā ||
dāna-parasu budhi-sakti pracaṃḍā | para-bigyāna-kaṭhina-kodaṃḍā ||

80.5

अमल अचल मन त्रोन-समाना । सम-जम-नियम सिलीमुख नाना ॥
कवच अभेद बिप्र-गुरु-पूजा । एहि सम विजय उपाय न दूजा ॥

amala acala mana trona-samānā | sama-jama-niyama silīmukha nānā ||
kavaca abheda bipra-guru-pūjā | ehi sama vijaya upāya na dūjā ||

80.6

सखा धरम-मय अस रथ जाकें । जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें ॥

sakhā dharama-maya asa ratha jākeṃ | jītana kaham̐ na katahum̐ ripu tākeṃ ||

दो॰ 80 (क)दोहा

महा अजय संसार-रिपु, जीति सकइ सो बीर ।
जाकें अस रथ होइ दृढ़, सुनहु सखा मतिधीर ॥

mahā ajaya saṃsāra-ripu, jīti sakai so bīra |
jākeṃ asa ratha hoi dṛr̤ha, sunahu sakhā matidhīra ||

दो॰ 80 (ख)दोहा

सुनि प्रभु बचन विभीषन, हरषि गहे पद-काज ।
एहि मिस मोहि उपदेसेहु, राम कृपा-सुख-पुञ्ज ॥

suni prabhu bacana vibhīṣana, haraṣi gahe pada-kāja |
ehi misa mohi upadesehu, rāma kṛpā-sukha-puñja ||

दो॰ 80 (ग)दोहा

उत पचार दसकन्धर, इत अङ्गद हनुमान ।
लरत निसाचर भालु कपि, करि निज निज प्रभु आन ॥

uta pacāra dasakandhara, ita aṅgada hanumāna |
larata nisācara bhālu kapi, kari nija nija prabhu āna ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0