लंकाकाण्ड

अध्याय 106: विभीषण का राजतिलक और सेना को आशीर्वाद

6 श्लोक · 106 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

विभीषण का राजतिलक और सेना को आशीर्वाद

श्रीराम लक्ष्मण को सुग्रीव, अंगद, नल, नील, जाम्बवान और हनुमान के साथ विभीषण का राजतिलक करने भेजते हैं। पिता के वचन के कारण प्रभु स्वयं नगर में नहीं जाते। वे तुरन्त जाकर तिलक की तैयारी करते हैं, विभीषण को आदर से सिंहासन पर बिठाते हैं, तिलक करके उनकी स्तुति करते हैं। फिर हाथ जोड़कर, सिर नवाकर वे विभीषण सहित प्रभु के पास लौटते हैं। रघुवीर सबको बुलाकर अमृत जैसे वचनों से सुखी करते हैं: तुम्हारे बल से शत्रु मरा और विभीषण को राज्य मिला; तीनों लोकों में तुम्हारा यश नित नया रहेगा, और जो मेरे साथ तुम्हारी कीर्ति प्रेम से गाएँगे, वे बिना परिश्रम भवसागर पार कर लेंगे। प्रभु के वचन सुनकर वानर अघाते नहीं, और चरणकमल पकड़ लेते हैं।

106.1

तिलक बिभीषन पुनि सिरु नायो । कृपासिन्धु तब अनुज बोलायो ॥
तुम्ह कपीस अङ्गद नल नीला । जामवन्त मारुति नयसीला ॥

tilaka bibhīṣana puni siru nāyo | kṛpāsindhu taba anuja bolāyo ||
tumha kapīsa aṅgada nala nīlā | jāmavanta māruti nayasīlā ||

106.2

सब मिलि जाहु बिभीषन साथा । सारेहु तिलक कहेहु रघुनाथा ॥
पिता बचन मैं नगर न आवउँ । आपु सरिस कपि अनुज पठावउँ ॥

saba mili jāhu bibhīṣana sāthā | sārehu tilaka kahehu raghunāthā ||
pitā bacana maiṃ nagara na āvaum̐ | āpu sarisa kapi anuja paṭhāvaum̐ ||

106.3

तुरत चले कपि सुनि प्रभु बानी । कीन्ही जाइ तिलक के रचना ॥
सादर सिंहासन बैठारी । तिलक सारि अस्तुति अनुसारी ॥

turata cale kapi suni prabhu bānī | kīnhī jāi tilaka ke racanā ||
sādara siṃhāsana baiṭhārī | tilaka sāri astuti anusārī ||

106.4

जोरि पानि सबहीं सिर नाए । सहित बिभीषन प्रभु पहिँ आए ॥
तब रघुबीर बोलि सब लीन्हे । कहि प्रिय बचन सुखी सब कीन्हे ॥

jori pāni sabahīṃ sira nāe | sahita bibhīṣana prabhu pahim̐ āe ||
taba raghubīra boli saba līnhe | kahi priya bacana sukhī saba kīnhe ||

106.छं॰ 1छन्द

किए सुखी कहि बानी सुधा सम बल तुम्हारें रिपु हयो ।
पायो बिभीषन राज तिहुँ पुर जसु तुम्हारो नित नयो ॥
मोहि सहित सुभ कीरति तुम्हारी परम प्रीति जो गाइहैं ।
संसार सिन्धु अपार पार प्रयास बिनु नर पाइहैं ॥

kie sukhī kahi bānī sudhā sama bala tumhāreṃ ripu hayo |
pāyo bibhīṣana rāja tihum̐ pura jasu tumhāro nita nayo ||
mohi sahita subha kīrati tumhārī parama prīti jo gāihaiṃ |
saṃsāra sindhu apāra pāra prayāsa binu nara pāihaiṃ ||

दो॰ 106दोहा

प्रभु के बचन श्रवन सुनि, नहिं अघाहिं कपि-पुञ्ज ।
बार बार सिर नावहिं, गहहिँ सकल पद-कञ्ज ॥

prabhu ke bacana śravana suni, nahiṃ aghāhiṃ kapi-puñja |
bāra bāra sira nāvahiṃ, gahahim̐ sakala pada-kañja ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0