बालकाण्ड

अध्याय 2: ब्राह्मण, सन्त और चलता फिरता प्रयाग

8 श्लोक · 2 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

ब्राह्मण, सन्त और चलता फिरता प्रयाग

गुरु की चरणरज को विवेक के नेत्रों का अंजन बनाकर तुलसीदास रामचरित आरम्भ करते हैं। पहले वे मोह से उपजे संशय हरने वाले ब्राह्मणों की वन्दना करते हैं, फिर सज्जन समाज की। सन्त का चरित कपास जैसा है: नीरस, उजला और गुण रूपी धागों से भरा, जो स्वयं दुःख सहकर दूसरों के छिद्र ढँकता है। सन्त समाज धरती पर चलता फिरता प्रयाग है। उसमें रामभक्ति गंगा है, ब्रह्मविचार सरस्वती, विधि और निषेध की कर्मकथा यमुना, हरि और हर की कथा त्रिवेणी, और अटल विश्वास अक्षयवट। यह तीर्थ सबको, हर दिन, हर देश में सुलभ है। दोहा कहता है कि जो प्रेम से इसमें स्नान करते हैं, वे इसी शरीर में चारों फल पा लेते हैं।

2.1

गुरु-पद-रज मृदु मञ्जुल अञ्जन । नयन-अमिय दृग दोष बिभञ्जन ॥
तेहिं करि बिमल बिबेक बिलोचन । बरनउँ राम चरित भव-मोचन ॥

guru-pada-raja mṛdu mañjula añjana | nayana-amiya dṛga doṣa bibhañjana ||
tehiṃ kari bimala bibeka bilocana | baranaum̐ rāma carita bhava-mocana ||

2.2

बन्दउँ प्रथम महीसुर चरना । मोह जनित संसय सब हरना ॥
सुजन-समाज सकल-गुन-खानी । करउँ प्रनाम सप्रेम सुबानी ॥

bandaum̐ prathama mahīsura caranā | moha janita saṃsaya saba haranā ||
sujana-samāja sakala-guna-khānī | karaum̐ pranāma saprema subānī ||

2.3

साधु चरित सुभ सरिस कपासू । निरस बिसद गुन-मय फल जासू ॥
जो सहि दुख पर-छिद्र दुरावा । वन्दनीय जेहिं जग जस पावा ॥

sādhu carita subha sarisa kapāsū | nirasa bisada guna-maya phala jāsū ||
jo sahi dukha para-chidra durāvā | vandanīya jehiṃ jaga jasa pāvā ||

2.4

मुद-मङ्गल-मय सन्त-समाजू । जो जग जङ्गम तीरथराजू ॥
रामभगति जहँ सुरसरि धारा । सरसइ ब्रह्म-विचार-प्रचारा ॥

muda-maṅgala-maya santa-samājū | jo jaga jaṅgama tīratharājū ||
rāmabhagati jaham̐ surasari dhārā | sarasai brahma-vicāra-pracārā ||

2.5

विधि-निषेध-मय कलिमल-हरनी । करम कथा रबिनंदनि बरनी ॥
हरि-हर-कथा बिराजति बेनी । सुनत सकल-मुद-मङ्गल देनी ॥

vidhi-niṣedha-maya kalimala-haranī | karama kathā rabinaṃdani baranī ||
hari-hara-kathā birājati benī | sunata sakala-muda-maṅgala denī ||

2.6

बट बिस्वास अचल निज-धरमा । तीरथराज-समाज सुकरमा ॥
सबहिँ सुलभ सब दिन सब देसा । सेवत सादर समन कलेसा ॥

baṭa bisvāsa acala nija-dharamā | tīratharāja-samāja sukaramā ||
sabahim̐ sulabha saba dina saba desā | sevata sādara samana kalesā ||

2.7

अकथ अलौकिक तीरथराऊ । देइ सद्य फल प्रगट प्रभाऊ ॥

akatha alaukika tīratharāū | dei sadya phala pragaṭa prabhāū ||

दो॰ 2दोहा

सुनि समुझहिँ जन मुदित मन, मज्जहिँ अति अनुराग ।
लहहिं चारि-फल अछत-तनु, साधु-समाज प्रयाग ॥

suni samujhahim̐ jana mudita mana, majjahim̐ ati anurāga |
lahahiṃ cāri-phala achata-tanu, sādhu-samāja prayāga ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0