गुरु और स्वामी का सब प्रकार स्नेह देखकर मेरा क्षोभ मिट गया, मन में संदेह नहीं रहा। अब करुणाकर, वही कीजिए जिससे दास का हित हो और प्रभु के चित्त को क्षोभ न हो। जो सेवक स्वामी को संकोच में डालकर अपना हित चाहे, उसकी बुद्धि ओछी है। नाथ, आपके लौटने में सबका स्वार्थ है, और आपकी आज्ञा मानने में करोड़ों प्रकार का भला। यह स्वार्थ परमार्थ का सार है। देव, मेरी एक विनती सुनकर फिर जैसा उचित हो वैसा कीजिए। तिलक का सारा सामान सजाकर लाया गया है, प्रभु, मन माने तो उसे सफल कीजिए। छोटे भाई सहित मुझे वन भेजिए और सबको सनाथ कीजिए। नहीं तो दोनों भाइयों को लौटा दीजिए, और नाथ, मैं आपके साथ चलूँ।