अयोध्याकाण्ड

अध्याय 268: भरत तीन उपाय रखते हैं

5 श्लोक · 268 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

भरत तीन उपाय रखते हैं

गुरु और स्वामी का सब प्रकार स्नेह देखकर मेरा क्षोभ मिट गया, मन में संदेह नहीं रहा। अब करुणाकर, वही कीजिए जिससे दास का हित हो और प्रभु के चित्त को क्षोभ न हो। जो सेवक स्वामी को संकोच में डालकर अपना हित चाहे, उसकी बुद्धि ओछी है। नाथ, आपके लौटने में सबका स्वार्थ है, और आपकी आज्ञा मानने में करोड़ों प्रकार का भला। यह स्वार्थ परमार्थ का सार है। देव, मेरी एक विनती सुनकर फिर जैसा उचित हो वैसा कीजिए। तिलक का सारा सामान सजाकर लाया गया है, प्रभु, मन माने तो उसे सफल कीजिए। छोटे भाई सहित मुझे वन भेजिए और सबको सनाथ कीजिए। नहीं तो दोनों भाइयों को लौटा दीजिए, और नाथ, मैं आपके साथ चलूँ।

268.1

लखि सब बिधि गुर स्वामि सनेहू । मिटेउ छोभ नहिँ मन सन्देहू ॥
अब करुनाकर कीजिय सोई । जन हित प्रभु चित छोभ न होई ॥

lakhi saba bidhi gura svāmi sanehū | miṭeu chobha nahim̐ mana sandehū ||
aba karunākara kījiya soī | jana hita prabhu cita chobha na hoī ||

268.2

जो सेवक साहिबहि सँकोची । निज हित चहइ तासु मति पोची ॥
सेवक-हित साहिब सेवकाई । करइ सकल मुख लोभ बिहाई ॥

jo sevaka sāhibahi sam̐kocī | nija hita cahai tāsu mati pocī ||
sevaka-hita sāhiba sevakāī | karai sakala mukha lobha bihāī ||

268.3

स्वारथु नाथ फिरें सबही का । किये रजाइ कोटि बिधि नीका ॥
यह स्वारथ परमारथ-सारु । सकल सुकृत-फल सुगति-सिँगारू ॥

svārathu nātha phireṃ sabahī kā | kiye rajāi koṭi bidhi nīkā ||
yaha svāratha paramāratha-sāru | sakala sukṛta-phala sugati-sim̐gārū ||

268.4

देव एक बिनती सुनि मोरी । उचित होइ तस करब बहोरी ॥
तिलक समाज साजि सब आना । करिय सुफल प्रभु जौँ मन माना ॥

deva eka binatī suni morī | ucita hoi tasa karaba bahorī ||
tilaka samāja sāji saba ānā | kariya suphala prabhu jaum̐ mana mānā ||

दो॰ 268दोहा

सानुज पठइअ मोहि बन, कीजिय सबहि सनाथ ।
नतरु फेरिअहिं बन्धु दोउ, नाथ चलौं मैं साथ ॥

sānuja paṭhaia mohi bana, kījiya sabahi sanātha |
nataru pheriahiṃ bandhu dou, nātha calauṃ maiṃ sātha ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0