भूयस्तु शृणु राजेन्द्र धर्मान्धर्मभृतांवर
bhūyastu śṛṇu rājendra dharmāndharmabhṛtāṃvara
इति श्रीमन्महाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि चतुर्दशोऽध्यायः ॥
6 श्लोक · 14 में से 274
यह भी बहुत छोटा अध्याय है। भीष्म एक प्राचीन संवाद सुनाते हैं, जिसमें इन्द्र, अग्नि, सूर्य और शची एक-एक सत्य वचन बोलते हैं और माँगते हैं कि उस सत्य से कलश का एक चौथाई भर जाए। इन्द्र कहते हैं कि अपने राज्य में वे ब्राह्मणों को काम और क्रोध से रहित देखते हैं। अग्नि कहते हैं कि जहाँ ब्राह्मण भोजन नहीं करते, वहाँ वे भी नहीं खाते। सूर्य कहते हैं कि गौ और ब्राह्मण के हित के लिए वे पूरी शक्ति से नहीं तपते। शची कहती हैं कि कर्म, मन और वाणी से वे कभी पति पुरन्दर का अपमान नहीं करतीं। चार सत्यों से कलश भर जाता है। शिक्षा है ब्राह्मणों और पतिव्रता स्त्री की महिमा।
भीष्म उवाच
भूयस्तु शृणु राजेन्द्र धर्मान्धर्मभृतांवर
bhūyastu śṛṇu rājendra dharmāndharmabhṛtāṃvara
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
इन्द्राग्न्योः सूर्यशच्योश्च तन्मे निगदतः शृणु
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam |
indrāgnyoḥ sūryaśacyośca tanme nigadataḥ śṛṇu
इन्द्र उवाच
राज्ये विप्रान्प्रपश्यामि कामक्रोधविवर्जितान् ।
एतेन सत्यवाक्येन पादः कुम्भस्य पूर्यताम्
rājye viprānprapaśyāmi kāmakrodhavivarjitān |
etena satyavākyena pādaḥ kumbhasya pūryatām
अग्निरुवाच
यथाऽहं तत्र नाश्नामि यत्र नाश्नन्ति वै द्विजाः
एतेन सत्यवाक्येन पादः कुम्भस्य पूर्यताम्
yathā'haṃ tatra nāśnāmi yatra nāśnanti vai dvijāḥ
etena satyavākyena pādaḥ kumbhasya pūryatām
सूर्य उवाच
यथा गोब्राह्मणस्यार्थे न तपामि यथाबलम् ।
एतेन सत्यवाक्येन पादः कुम्भस्य पूर्यताम्
yathā gobrāhmaṇasyārthe na tapāmi yathābalam |
etena satyavākyena pādaḥ kumbhasya pūryatām
शच्युवाच
कर्मणा मनसा वाचा नावमन्ये पुरन्दरम् ।
एतेन सत्यवाक्येन पादः कुम्भस्य पूर्यताम्
karmaṇā manasā vācā nāvamanye purandaram |
etena satyavākyena pādaḥ kumbhasya pūryatām
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