पूर्व खण्ड — आचार काण्ड

अध्याय 37: गायत्री कल्प: जप, होम और पूजन

इति श्रीगारुडे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाख्ये आचारकाण्डे गायत्त्रीकल्पनिरूपणं नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥

9 श्लोक · 37 में से 241

इस अध्याय में क्या होता है

गायत्री कल्प: जप, होम और पूजन

श्रीहरि गायत्री को परम देवी कहते हैं, जो भोग और मोक्ष देती हैं और जिनके जप से बड़े पाप भी नष्ट होते हैं। वे उनका कल्प बताते हैं। एक हजार आठ या एक सौ आठ जप करना चाहिए; तीनों सन्ध्याओं में ऐसा करने से ब्रह्मलोक मिलता है। सन्ध्या में व्याहृतियों और उनके बारह नामों से आवाहन और पूजन होता है, गायत्री और सावित्री से सहस्राक्षी तक। फिर समिधा, घी और हविष्य से होम धर्म, काम और सब कर्मों की सिद्धि के लिए होता है। चन्दन या स्वर्ण की प्रतिमा पूजकर, दूध, कन्द और फल पर रहते हुए लाख जप किया जाता है, और बीस हजार आहुतियाँ सब कामनाएँ पूरी करती हैं। अन्त में विसर्जन: उत्तर शिखर पर जन्मी, पर्वत पर वास करने वाली देवी, सुखपूर्वक जाओ।

हरिरुवाच

37.1

गायत्त्री परमा देवी भुक्तिमुक्तिप्रदा च ताम् ।
यो जपेत्तस्य पापानिविनश्यंति महांत्यपि

gāyattrī paramā devī bhuktimuktipradā ca tām |
yo japettasya pāpānivinaśyaṃti mahāṃtyapi

37.2

गायत्त्रीकल्पमाख्यास्ये भुक्तिमुक्तिप्रदं च तत् ।
अष्टोत्तरं सहस्त्रं वा अथवाष्टशतं जपेत्

gāyattrīkalpamākhyāsye bhuktimuktipradaṃ ca tat |
aṣṭottaraṃ sahastraṃ vā athavāṣṭaśataṃ japet

37.3

त्रिसन्ध्यं ब्रह्मलोकीस्याच्छतं जप्त्वा जलं पिबेत् ।
संध्यायां सर्वपापघ्नीं देवीमावाह्य पूजयेत्

trisandhyaṃ brahmalokīsyācchataṃ japtvā jalaṃ pibet |
saṃdhyāyāṃ sarvapāpaghnīṃ devīmāvāhya pūjayet

37.4

भूर्भुवः स्वः स्वमन्त्रेण युतां द्वादशनामभिः ।
गायत्र्यै नमः ॥ सावित्र्यै सरस्वत्यै नमोनमः

bhūrbhuvaḥ svaḥ svamantreṇa yutāṃ dvādaśanāmabhiḥ |
gāyatryai namaḥ || sāvitryai sarasvatyai namonamaḥ

37.5

वेदमात्रे च सांकृत्यै ब्रह्माणी कौशिकी क्रमात् ।
साध्व्यै सर्वार्थसाधिन्यै सहस्त्राक्ष्यै च भूर्भुवः

vedamātre ca sāṃkṛtyai brahmāṇī kauśikī kramāt |
sādhvyai sarvārthasādhinyai sahastrākṣyai ca bhūrbhuvaḥ

37.6

स्वरेवं जुहुया दग्नौ समिदाज्यं हविष्यकम् ।
अष्टोत्तरसहस्त्रं वाप्यथवाष्टशंत घृतम्

svarevaṃ juhuyā dagnau samidājyaṃ haviṣyakam |
aṣṭottarasahastraṃ vāpyathavāṣṭaśaṃta ghṛtam

37.7

धर्मकामादिसिद्ध्यर्थं जुहुयात्सर्वकर्मसु ।
प्रतिमां चन्दनस्वर्णनिर्मितां प्रतिपूज्य च

dharmakāmādisiddhyarthaṃ juhuyātsarvakarmasu |
pratimāṃ candanasvarṇanirmitāṃ pratipūjya ca

37.8

यथा लक्षं तु जप्तव्यं पयोमूलफलार्शनैः ।
अयुतद्वयहोमेन सर्वकामानवाप्नुयात्

yathā lakṣaṃ tu japtavyaṃ payomūlaphalārśanaiḥ |
ayutadvayahomena sarvakāmānavāpnuyāt

37.9

उत्तरे शिखरे जाता भूम्यां पर्वत वासिनी ।
ब्रह्मणा समनुज्ञाता गच्छ देवि यथासुखम्

uttare śikhare jātā bhūmyāṃ parvata vāsinī |
brahmaṇā samanujñātā gaccha devi yathāsukham

पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)