पूर्व खण्ड — आचार काण्ड

अध्याय 25: आसन और उसकी शक्तियों का पूजन

इति श्रीगारुडे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाख्ये आचारकाण्डे आसनपूजानिरूपणं नाम पंचविंशोऽध्यायः ॥

5 श्लोक · 25 में से 241

इस अध्याय में क्या होता है

आसन और उसकी शक्तियों का पूजन

पाँच श्लोकों का यह प्रसंग लगभग पूरा मन्त्रों से बना है, जिनसे उस आसन का नीचे से ऊपर तक पूजन होता है जिस पर देवता पूजे जाते हैं। प्रत्येक पंक्ति "पादुकां पूजयामि नमः" पर समाप्त होती है। आरम्भ ऐं क्रीं श्रीं स्फें क्षौं बीजों सहित अनन्तशक्ति की पादुका से होता है, फिर आधारशक्ति, फिर कालाग्निरुद्र, हाटकेश्वर और लोकों को धारण करने वाले शेष भट्टारक। उसके बाद पृथ्वी, उसके भुवन, द्वीप, समुद्र और दिशाओं से बना अनन्त नामक पद्मासन आता है। अन्तिम और सबसे लम्बा मन्त्र पूरे कमलासन का वर्णन करता है: निवृत्ति आदि कलाएँ, पृथ्वी आदि तत्त्व, अनन्त आदि भुवन, ओंकार आदि वर्ण, सद्योजात आदि मन्त्र और अंगमन्त्र, ज्येष्ठा और रुद्रशक्तियों से बनी कर्णिका, तथा मूल में शिव और नौ शक्तियाँ।

सूत उवाच

25.1

ऐं क्रीं श्रीं स्फें क्षौं अनन्तशक्तिपादुकां पूजयामि नमः

aiṃ krīṃ śrīṃ spheṃ kṣauṃ anantaśaktipādukāṃ pūjayāmi namaḥ

25.2

ऐं श्रीं फ्रौं क्षौं आधारशक्तिपादुकां पूजयामि नमः ।
ॐ ह्रं कालाग्निरुद्रपादुकां पूजयामि नमः

aiṃ śrīṃ phrauṃ kṣauṃ ādhāraśaktipādukāṃ pūjayāmi namaḥ |
oṃ hraṃ kālāgnirudrapādukāṃ pūjayāmi namaḥ

25.3

ॐ ह्रीं हुं हाटकेश्वरदेवपादुकां पूजयामि नमः ।
ॐ ह्रीं शेषभट्टारकपादुकां पूजयामि नमः

oṃ hrīṃ huṃ hāṭakeśvaradevapādukāṃ pūjayāmi namaḥ |
oṃ hrīṃ śeṣabhaṭṭārakapādukāṃ pūjayāmi namaḥ

25.4

ॐ ह्रीं श्रीं पूथिवीतत्सवर्णभुवनद्वीपसमुद्रदिशामनन्ताख्यमासनं पद्मासनं पूजयामि नमः

oṃ hrīṃ śrīṃ pūthivītatsavarṇabhuvanadvīpasamudradiśāmanantākhyamāsanaṃ padmāsanaṃ pūjayāmi namaḥ

25.5

ह्रीं श्रीं निवृत्त्यादि कला पृथिव्यादितत्त्व मनन्तादिभुवनमोङ्कारादिवर्णम् ।
हकारादिनवात्मकपदः सद्योदातादिमन्त्रः ह्रां हृदयाद्यङ्गः ।
एवं मन्त्रमहेश्वर सिद्धविद्यात्मकः परामृतार्णवः सर्वभूतो दिक्समस्तषडंगः सदाशिवार्णवपयः पूर्णोदधिपक्षश्रीमानास्पदात्मकः विद्योमापूर्णज्ञत्वकर्त्तृत्वलक्षणज्येष्ठाचक्ररुद्रशक्त्यात्मककर्णिकः ।
नवशक्तिशिवादिभिर्मूलमण्डलत्रयकुजात्मकोत्पन्नापद्मासनपादुकां पूजयामि नमः

hrīṃ śrīṃ nivṛttyādi kalā pṛthivyāditattva manantādibhuvanamoṅkārādivarṇam |
hakārādinavātmakapadaḥ sadyodātādimantraḥ hrāṃ hṛdayādyaṅgaḥ |
evaṃ mantramaheśvara siddhavidyātmakaḥ parāmṛtārṇavaḥ sarvabhūto diksamastaṣaḍaṃgaḥ sadāśivārṇavapayaḥ pūrṇodadhipakṣaśrīmānāspadātmakaḥ vidyomāpūrṇajñatvakarttṛtvalakṣaṇajyeṣṭhācakrarudraśaktyātmakakarṇikaḥ |
navaśaktiśivādibhirmūlamaṇḍalatrayakujātmakotpannāpadmāsanapādukāṃ pūjayāmi namaḥ

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