पूर्व खण्ड — आचार काण्ड

अध्याय 21: शिव के पाँच मुखों और कलाओं का पूजन

इति श्रीगारुडे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाख्ये आचारकाण्डं पञ्चवक्क्रपूजनं नामैकविंशोऽध्यायः ॥

7 श्लोक · 21 में से 241

इस अध्याय में क्या होता है

शिव के पाँच मुखों और कलाओं का पूजन

सूत शिव के पाँच मुखों का पूजन बताते हैं, जो भोग और मोक्ष दोनों देता है। आरम्भ आदिभूत और सर्वाधार विष्णु को आहुति से होता है। पहले ॐ हां से सद्योजात का आवाहन होता है और उनकी आठ कलाएँ गिनाई जाती हैं: सिद्धि, ऋद्धि, धृति, लक्ष्मी, मेधा, कान्ति, स्वधा और स्थिति। ॐ हीं से वामदेव की तेरह कलाएँ हैं, रजा और रक्षा से क्रिया, बुद्धि और मोहिनी तक। अघोर की आठ कलाएँ भयंकर हैं: मनोन्मनी, अघोरा, मोहा, क्षुधा, निद्रा, मृत्यु, माया आदि। ॐ हैं से तत्पुरुष की कलाएँ निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या और शान्ति हैं। ॐ हौं से ईशान के साथ निश्चला, निरंजना, शशिनी, अंगना, मरीचि और ज्वालिनी पूजी जाती हैं। सात श्लोकों की यह छोटी सूची प्रत्येक मुख के साथ पूजी जाने वाली शक्तियों के नाम देती है।

सूत उवाच

21.1

पंचवक्त्रार्च्चनं वक्ष्ये पृथग्यद्भुक्तिमुक्तिदम् ।
ॐ भूर्विष्णवे आदिभूताय सर्वाधाराय मूर्त्तये स्वाहा

paṃcavaktrārccanaṃ vakṣye pṛthagyadbhuktimuktidam |
oṃ bhūrviṣṇave ādibhūtāya sarvādhārāya mūrttaye svāhā

21.2

सद्योजातस्य चाह्वानमनेन प्रथमं चरेत् ।
ॐ हां सद्योजातायैव कला ह्यष्टौ प्रकीर्त्तिताः

sadyojātasya cāhvānamanena prathamaṃ caret |
oṃ hāṃ sadyojātāyaiva kalā hyaṣṭau prakīrttitāḥ

21.3

सिद्धिर्ऋद्धिर्धृतिर्लक्ष्मीर्मेधा कान्तिः स्वधा स्थितिः ।
ॐ हीं वामदेवायैव कलास्तस्य त्रयोदश

siddhirṛddhirdhṛtirlakṣmīrmedhā kāntiḥ svadhā sthitiḥ |
oṃ hīṃ vāmadevāyaiva kalāstasya trayodaśa

21.4

रजा रक्षा रतिः पाल्या कान्ति स्तृष्णा मतिः क्रिया ।
कामा बुद्धिश्च रात्रिश्च त्रासनी मोहिनी तथ

rajā rakṣā ratiḥ pālyā kānti stṛṣṇā matiḥ kriyā |
kāmā buddhiśca rātriśca trāsanī mohinī tatha

21.5

मनोन्मनी अघोरा च तथा मोहा क्षुधा कलाः ।
निद्रा मृत्युश्च माया च अष्टसंख्या भयंकरा

manonmanī aghorā ca tathā mohā kṣudhā kalāḥ |
nidrā mṛtyuśca māyā ca aṣṭasaṃkhyā bhayaṃkarā

21.6

ॐ हैं तत्पुरुषायैव
निवृत्तिश्च प्रतिष्ठा च विद्या शान्तिर्न केवला

oṃ haiṃ tatpuruṣāyaiva
nivṛttiśca pratiṣṭhā ca vidyā śāntirna kevalā

21.7

ॐ हौं ईशानाय नमो निश्चला च निरञ्जना ।
शशिनी चांगना चैव मरीचिर्ज्वालिनी तथा

oṃ hauṃ īśānāya namo niścalā ca nirañjanā |
śaśinī cāṃganā caiva marīcirjvālinī tathā

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