बृहदारण्यकोपनिषद्

अध्याय 6: मुख्य प्राण, पंचाग्नि और गृहस्थ के संस्कार

इति वाजसनेयके बृहदारण्यकोपनिषत्समाप्ता ॥

74 श्लोक · 6 में से 6

इस अध्याय में क्या होता है

मुख्य प्राण, पंचाग्नि और गृहस्थ के संस्कार

इन्द्रियाँ विवाद करती हैं कि श्रेष्ठ कौन है। हर एक एक वर्ष के लिए शरीर छोड़ती है और शरीर जीता रहता है; जब प्राण निकलने लगता है तब सब उससे रुकने की विनती करती हैं। श्वेतकेतु पांचालों की सभा में जाते हैं, पर राजा प्रवाहण जैवलि के पाँच प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाते; उनके पिता गौतम शिष्य बनकर राजा से पंचाग्नि विद्या सीखते हैं, द्युलोक, मेघ, पृथ्वी, पुरुष और स्त्री, और मृत्यु के बाद के दो मार्ग, अर्चि और धूम। फिर ओषधियों का मन्थ कर्म है। आगे दाम्पत्य जीवन और योग्य पुत्र की प्राप्ति के गृहस्थ संस्कार मन्त्रों सहित सीधे कहे गए हैं, और नवजात शिशु के स्वागत के कर्म। उपनिषद् ब्रह्म तक जाती पूरी गुरु-परम्परा से समाप्त होता है।

6.1.1

प्रथमोऽध्यायः
द्वितीयोऽध्यायः
तृतीयोऽध्यायः
चतुर्थोऽध्यायः
पञ्चमोऽध्यायः
षष्ठोऽध्यायः
अथ षष्ठोऽध्यायः ।
प्रथमं ब्राह्मणम्
यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च स्वानां भवति ।
प्राणो वै ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च ।
ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च स्वानां भवति ।
अपि च येषां बुभूषति ।
य एवं वेद

prathamo'dhyāyaḥ
dvitīyo'dhyāyaḥ
tṛtīyo'dhyāyaḥ
caturtho'dhyāyaḥ
pañcamo'dhyāyaḥ
ṣaṣṭho'dhyāyaḥ
atha ṣaṣṭho'dhyāyaḥ |
prathamaṃ brāhmaṇam
yo ha vai jyeṣṭhaṃ ca śreṣṭhaṃ ca veda jyeṣṭhaśca śreṣṭhaśca svānāṃ bhavati |
prāṇo vai jyeṣṭhaśca śreṣṭhaśca |
jyeṣṭhaśca śreṣṭhaśca svānāṃ bhavati |
api ca yeṣāṃ bubhūṣati |
ya evaṃ veda

जो सबसे ज्येष्ठ और सबसे श्रेष्ठ को जानता है, वह अपने लोगों में ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हो जाता है। प्राण ही ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है। जो ऐसा जानता है, वह अपनों में और जिनके बीच वह बड़ा होना चाहता है उनमें भी ज्येष्ठ और श्रेष्ठ बनता है।

6.1.2

यो ह वै वसिष्ठां वेद वसिष्ठः स्वानां भवति ।
वाग्वै वसिष्ठा ।
वसिष्ठः स्वानां भवति ।
अपि च येषां बुभूषति ।
य एवं वेद

yo ha vai vasiṣṭhāṃ veda vasiṣṭhaḥ svānāṃ bhavati |
vāgvai vasiṣṭhā |
vasiṣṭhaḥ svānāṃ bhavati |
api ca yeṣāṃ bubhūṣati |
ya evaṃ veda

जो वसिष्ठा, अर्थात् सबसे उत्तम बसाने वाली को जानता है, वह अपनों में सबसे उत्तम हो जाता है। वाणी ही वसिष्ठा है। जो ऐसा जानता है, वह अपनों में और जिनके बीच वह बड़ा होना चाहता है उनमें भी श्रेष्ठ बनता है।

6.1.3

यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रतितिष्ठति समे ।
प्रतितिष्ठति दुर्गे ।
चक्षुर्वै प्रतिष्ठा ।
चक्षुषा हि समे च दुर्गे च प्रतितिष्ठति ।
प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे ।
य एवं वेद

yo ha vai pratiṣṭhāṃ veda pratitiṣṭhati same |
pratitiṣṭhati durge |
cakṣurvai pratiṣṭhā |
cakṣuṣā hi same ca durge ca pratitiṣṭhati |
pratitiṣṭhati same pratitiṣṭhati durge |
ya evaṃ veda

जो प्रतिष्ठा, अर्थात् दृढ़ आधार को जानता है, वह समतल भूमि पर भी टिकता है और विषम भूमि पर भी। नेत्र ही प्रतिष्ठा है, क्योंकि आँख से ही मनुष्य सम और विषम दोनों स्थानों पर पैर जमाता है। जो ऐसा जानता है, वह सम और विषम में स्थिर रहता है।

6.1.4

यो ह वै संपदं वेद सं हास्मै पद्यते यं कामं कामयते ।
श्रोत्रं वै संपत् ।
श्रोत्रे हीमे सर्वे वेदा अभिसंपन्नाः ।
सं हास्मै पद्यते यं कामं कामयते ।
य एवं वेद

yo ha vai saṃpadaṃ veda saṃ hāsmai padyate yaṃ kāmaṃ kāmayate |
śrotraṃ vai saṃpat |
śrotre hīme sarve vedā abhisaṃpannāḥ |
saṃ hāsmai padyate yaṃ kāmaṃ kāmayate |
ya evaṃ veda

जो सम्पत् को जानता है, उसे वह हर कामना प्राप्त हो जाती है जिसकी वह इच्छा करता है। श्रोत्र ही सम्पत् है, क्योंकि ये सारे वेद कान में ही आकर प्राप्त होते हैं। जो ऐसा जानता है, उसकी हर कामना पूरी होती है।

6.1.5

यो ह वा आयतनं वेदायतनं स्वानां भवत्यायतनं जनानाम् ।
मनो वा आयतनम् ।
आयतनं स्वानां भवत्यायतनं जनानाम् ।
य एवं वेद

yo ha vā āyatanaṃ vedāyatanaṃ svānāṃ bhavatyāyatanaṃ janānām |
mano vā āyatanam |
āyatanaṃ svānāṃ bhavatyāyatanaṃ janānām |
ya evaṃ veda

जो आयतन, अर्थात् आश्रय को जानता है, वह अपनों का और सब लोगों का आश्रय बन जाता है। मन ही आयतन है। जो ऐसा जानता है, वह अपनों का और जन-जन का आश्रय बनता है।

6.1.6

यो ह वै प्रजातिं वेद प्रजायते ह प्रजया पशुभिः ।
रेतो वै प्रजातिः ।
प्रजायते ह प्रजया पशुभिः ।
य एवं वेद

yo ha vai prajātiṃ veda prajāyate ha prajayā paśubhiḥ |
reto vai prajātiḥ |
prajāyate ha prajayā paśubhiḥ |
ya evaṃ veda

जो प्रजाति, अर्थात् सन्तति के मूल को जानता है, वह सन्तान और पशुधन से सम्पन्न होता है। वीर्य ही प्रजाति है। जो ऐसा जानता है, वह सन्तान और पशुओं से बढ़ता है।

6.1.7

ते हेमे प्राणा अहंश्रेयसे विवदमाना ब्रह्म जग्मुः ।
तद्धोचुः को नो वसिष्ठ इति ।
तद्धोवाच यस्मिन् व उत्क्रान्त इदं शरीरं पापियो मन्यते स वो वसिष्ठ इति

te heme prāṇā ahaṃśreyase vivadamānā brahma jagmuḥ |
taddhocuḥ ko no vasiṣṭha iti |
taddhovāca yasmin va utkrānta idaṃ śarīraṃ pāpiyo manyate sa vo vasiṣṭha iti

ये प्राण, अर्थात् इन्द्रियाँ, 'मैं श्रेष्ठ हूँ' कहकर आपस में विवाद करते हुए ब्रह्मा के पास गए और पूछा, 'हममें सबसे श्रेष्ठ कौन है?' उन्होंने कहा, 'जिसके निकल जाने पर यह शरीर सबसे अधिक हीन माना जाए, वही तुममें श्रेष्ठ है।'

6.1.8

वाग्घोच्चक्राम ।
सा संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ।
ते होचुः यथाकला अवदन्तो वाचा प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वांसो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति ।
प्रविवेश ह वाक्

vāgghoccakrāma |
sā saṃvatsaraṃ proṣyāgatyovāca kathamaśakata madṛte jīvitumiti |
te hocuḥ yathākalā avadanto vācā prāṇantaḥ prāṇena paśyantaścakṣuṣā śṛṇvantaḥ śrotreṇa vidvāṃso manasā prajāyamānā retasaivamajīviṣmeti |
praviveśa ha vāk

वाणी शरीर से निकल गई। एक वर्ष बाहर रहकर लौटी और बोली, 'मेरे बिना तुम कैसे जी सके?' वे बोले, 'जैसे गूँगे जीते हैं, वाणी से न बोलते हुए, पर प्राण से साँस लेते, आँख से देखते, कान से सुनते, मन से जानते और वीर्य से सन्तान उत्पन्न करते हुए, वैसे ही हम जिए।' वाणी फिर भीतर आ गई।

6.1.9

चक्षुर्होच्चक्राम ।
तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ।
ते होचुः यथान्धा अपश्यन्तश्चक्षुषा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वांसो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति ।
प्रविवेश ह चक्षुः

cakṣurhoccakrāma |
tatsaṃvatsaraṃ proṣyāgatyovāca kathamaśakata madṛte jīvitumiti |
te hocuḥ yathāndhā apaśyantaścakṣuṣā prāṇantaḥ prāṇena vadanto vācā śṛṇvantaḥ śrotreṇa vidvāṃso manasā prajāyamānā retasaivamajīviṣmeti |
praviveśa ha cakṣuḥ

नेत्र निकल गया। एक वर्ष बाहर रहकर लौटा और बोला, 'मेरे बिना तुम कैसे जी सके?' वे बोले, 'जैसे अन्धे जीते हैं, आँख से न देखते हुए, पर प्राण से साँस लेते, वाणी से बोलते, कान से सुनते, मन से जानते और वीर्य से सन्तान उत्पन्न करते हुए, वैसे ही हम जिए।' नेत्र फिर भीतर आ गया।

6.1.10

श्रोत्रं होच्चक्राम ।
तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ।
ते होचुः यथा बधिरा अशृण्वन्तः श्रोत्रेण प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा विद्वांसो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति ।
प्रविवेश ह श्रोत्रम्

śrotraṃ hoccakrāma |
tatsaṃvatsaraṃ proṣyāgatyovāca kathamaśakata madṛte jīvitumiti |
te hocuḥ yathā badhirā aśṛṇvantaḥ śrotreṇa prāṇantaḥ prāṇena vadanto vācā paśyantaścakṣuṣā vidvāṃso manasā prajāyamānā retasaivamajīviṣmeti |
praviveśa ha śrotram

श्रोत्र निकल गया। एक वर्ष बाहर रहकर लौटा और बोला, 'मेरे बिना तुम कैसे जी सके?' वे बोले, 'जैसे बहरे जीते हैं, कान से न सुनते हुए, पर प्राण से साँस लेते, वाणी से बोलते, आँख से देखते, मन से जानते और वीर्य से सन्तान उत्पन्न करते हुए, वैसे ही हम जिए।' श्रोत्र फिर भीतर आ गया।

6.1.11

मनो होच्चक्राम ।
तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ।
ते होचुः यथा मुग्धा अविद्वांसो मनसा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति ।
प्रविवेश ह मनः

mano hoccakrāma |
tatsaṃvatsaraṃ proṣyāgatyovāca kathamaśakata madṛte jīvitumiti |
te hocuḥ yathā mugdhā avidvāṃso manasā prāṇantaḥ prāṇena vadanto vācā paśyantaścakṣuṣā śṛṇvantaḥ śrotreṇa prajāyamānā retasaivamajīviṣmeti |
praviveśa ha manaḥ

मन निकल गया। एक वर्ष बाहर रहकर लौटा और बोला, 'मेरे बिना तुम कैसे जी सके?' वे बोले, 'जैसे मूढ़ लोग जीते हैं, मन से न जानते हुए, पर प्राण से साँस लेते, वाणी से बोलते, आँख से देखते, कान से सुनते और वीर्य से सन्तान उत्पन्न करते हुए, वैसे ही हम जिए।' मन फिर भीतर आ गया।

6.1.12

रेतो होच्चक्राम ।
तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ।
ते होचुः यथा क्लीबा अप्रजायमाना रेतासा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वांसो मनसैवमजीविष्मेति ।
प्रविवेश ह रेतः

reto hoccakrāma |
tatsaṃvatsaraṃ proṣyāgatyovāca kathamaśakata madṛte jīvitumiti |
te hocuḥ yathā klībā aprajāyamānā retāsā prāṇantaḥ prāṇena vadanto vācā paśyantaścakṣuṣā śṛṇvantaḥ śrotreṇa vidvāṃso manasaivamajīviṣmeti |
praviveśa ha retaḥ

वीर्य निकल गया। एक वर्ष बाहर रहकर लौटा और बोला, 'मेरे बिना तुम कैसे जी सके?' वे बोले, 'जैसे सन्तान उत्पन्न करने में असमर्थ लोग जीते हैं, पर प्राण से साँस लेते, वाणी से बोलते, आँख से देखते, कान से सुनते और मन से जानते हुए, वैसे ही हम जिए।' वीर्य फिर भीतर आ गया।

6.1.13

अथ ह प्राण उत्क्रमिष्यन् यथा महासुहयः सैन्धवः पड्वीशशङ्खून्त्संवृहेदेवं हैवेमान् प्राणान्त्संववर्ह ।
ते होचुः मा भगव उत्क्रमीः ।
न वै शक्ष्यामस्त्वदृते जीवितुमिति ।
तस्यो मे बलिं कुरुतेति ।
तथेति

atha ha prāṇa utkramiṣyan yathā mahāsuhayaḥ saindhavaḥ paḍvīśaśaṅkhūntsaṃvṛhedevaṃ haivemān prāṇāntsaṃvavarha |
te hocuḥ mā bhagava utkramīḥ |
na vai śakṣyāmastvadṛte jīvitumiti |
tasyo me baliṃ kuruteti |
tatheti

फिर जब प्राण निकलने को हुआ, तो उसने इन सब इन्द्रियों को उनके स्थान से उखाड़ दिया, जैसे सिन्धु देश का बड़ा बलवान घोड़ा अपने पैर बाँधने वाले खूँटों को उखाड़ फेंकता है। वे बोले, 'भगवन्, मत निकलिए, आपके बिना हम जी नहीं सकते।' प्राण ने कहा, 'तो मुझे भेंट दो।' वे बोले, 'ऐसा ही हो।'

6.1.14

सा ह वागुवाच यद्वा अहं वसिष्ठास्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसीति ।
यद्वा अहं प्रतिष्ठास्मि त्वं तत्प्रतिष्ठोऽसीति चक्षुः ।
यद्वा अहं संपदस्मि त्वं तत्संपदसीति श्रोत्रम् ।
यद्वा अहमायतनमस्मि त्वं तदायतनमसीति मनः ।
यद्वा अहं प्रजातिरस्मि त्वं तत्प्रजातिरसीति रेतः ।
तस्यो मे किमन्नं किं वास इति ।
यदिदं किञ्चा श्वभ्य आ कृमिभ्य आ कीटपतङ्गेभ्यस्तत्तेऽन्नम् ।
आपो वास इति ।
न ह वा अस्यानन्नं जग्धं भवति नानन्नं प्रतिगृहीतं य एवमेतदनस्यान्नं वेद ।
तद्विद्वांसः श्रोत्रिया अशिष्यन्त आचामन्त्यशित्वाचामन्ति ।
एतमेव तदन्नमनग्नं कुर्वन्तो मन्यन्ते

sā ha vāguvāca yadvā ahaṃ vasiṣṭhāsmi tvaṃ tadvasiṣṭho'sīti |
yadvā ahaṃ pratiṣṭhāsmi tvaṃ tatpratiṣṭho'sīti cakṣuḥ |
yadvā ahaṃ saṃpadasmi tvaṃ tatsaṃpadasīti śrotram |
yadvā ahamāyatanamasmi tvaṃ tadāyatanamasīti manaḥ |
yadvā ahaṃ prajātirasmi tvaṃ tatprajātirasīti retaḥ |
tasyo me kimannaṃ kiṃ vāsa iti |
yadidaṃ kiñcā śvabhya ā kṛmibhya ā kīṭapataṅgebhyastatte'nnam |
āpo vāsa iti |
na ha vā asyānannaṃ jagdhaṃ bhavati nānannaṃ pratigṛhītaṃ ya evametadanasyānnaṃ veda |
tadvidvāṃsaḥ śrotriyā aśiṣyanta ācāmantyaśitvācāmanti |
etameva tadannamanagnaṃ kurvanto manyante

वाणी ने कहा, 'जो वसिष्ठता मेरी है, वह तुम्हारी ही है।' नेत्र बोला, 'जो प्रतिष्ठा मेरी है, वह तुम्हारी है।' श्रोत्र ने सम्पत्, मन ने आयतन और वीर्य ने प्रजाति प्राण को अर्पित की। प्राण ने पूछा, 'तो मेरा अन्न क्या है, मेरा वस्त्र क्या है?' उन्होंने कहा, 'कुत्तों, कृमियों और कीट-पतंगों तक जो कुछ है, वह तुम्हारा अन्न है; जल तुम्हारा वस्त्र है।' जो प्राण के इस अन्न को जानता है, उसके लिए कुछ भी अभक्ष्य नहीं रहता। इसीलिए विद्वान श्रोत्रिय भोजन से पहले और बाद आचमन करते हैं, मानो प्राण को वस्त्र पहना रहे हों।

6.2.1

द्वितीयं ब्राह्मण् (पञ्चाग्निविद्याब्राह्मणं वा श्वेतकेतुब्राह्मणम्)
श्वेतकेतुर्वा आरुणेयः पन्चालानां परिषदमाजगाम ।
स आजगाम जैवलिं प्रवाहणं परिचारयमाणम् ।
तमुदीक्ष्याभ्युवाद कुमारा३ इति ।
स भो३ इति प्रतिशुश्राव ।
अनुशिष्टो न्वसि पित्रेति ।
ओमिति होवाच

dvitīyaṃ brāhmaṇ (pañcāgnividyābrāhmaṇaṃ vā śvetaketubrāhmaṇam)
śvetaketurvā āruṇeyaḥ pancālānāṃ pariṣadamājagāma |
sa ājagāma jaivaliṃ pravāhaṇaṃ paricārayamāṇam |
tamudīkṣyābhyuvāda kumārā3 iti |
sa bho3 iti pratiśuśrāva |
anuśiṣṭo nvasi pitreti |
omiti hovāca

आरुणि के पुत्र श्वेतकेतु पांचालों की सभा में आए। वे सेवकों से घिरे प्रवाहण जैवलि के पास पहुँचे। उन्हें देखकर राजा ने पुकारा, 'कुमार!' उन्होंने उत्तर दिया, 'जी!' राजा ने पूछा, 'क्या तुम्हारे पिता ने तुम्हें शिक्षा दी है?' उन्होंने कहा, 'हाँ।'

6.2.2

वेत्थ यथेमाः प्रजाः प्रयत्यो विप्रतिपद्यन्ता३ इति ।
नेति होवाच ।
वेत्थो यथेमं लोकं पुनरापद्यन्ता३ इति ।
नेति हैवोवाच ।
वेत्थो यथासौ लोक एवं बहुभिः पुनः पुनः प्रयद्भिर्न संपूर्यता३ इति ।
नेति हैवोवाच ।
वेत्थो यतिथ्यामाहुत्यां हुतायामापः पुरुषवाचो भूत्वा समुत्थाय वदन्ती३ इति ।
नेति हैवोवाच ।
वेत्थो देवयानस्य वा पथः प्रतिपदं पितृयाणस्य वा ।
यत्कृत्वा देवयानं वा पन्थानं प्रतिपद्यन्ते पितृयाणं वा ।
अपि हि न ऋषेर्वचः श्रुतं
द्वे सृती अशृणवं पितॄणामहं देवानामुत मर्त्यानाम् ।
ताभ्यामिदं विश्वमेजत्समेति यदन्तरा पितरं मातरं चेति ।
नाहमत एकं चन वेदेति होवाच

vettha yathemāḥ prajāḥ prayatyo vipratipadyantā3 iti |
neti hovāca |
vettho yathemaṃ lokaṃ punarāpadyantā3 iti |
neti haivovāca |
vettho yathāsau loka evaṃ bahubhiḥ punaḥ punaḥ prayadbhirna saṃpūryatā3 iti |
neti haivovāca |
vettho yatithyāmāhutyāṃ hutāyāmāpaḥ puruṣavāco bhūtvā samutthāya vadantī3 iti |
neti haivovāca |
vettho devayānasya vā pathaḥ pratipadaṃ pitṛyāṇasya vā |
yatkṛtvā devayānaṃ vā panthānaṃ pratipadyante pitṛyāṇaṃ vā |
api hi na ṛṣervacaḥ śrutaṃ
dve sṛtī aśṛṇavaṃ pitṝṇāmahaṃ devānāmuta martyānām |
tābhyāmidaṃ viśvamejatsameti yadantarā pitaraṃ mātaraṃ ceti |
nāhamata ekaṃ cana vedeti hovāca

'क्या तुम जानते हो कि मरकर प्राणी किस प्रकार अलग-अलग मार्गों पर जाते हैं?' 'नहीं।' 'क्या जानते हो कि वे इस लोक में फिर कैसे लौटते हैं?' 'नहीं।' 'क्या जानते हो कि इतने लोग बार-बार जाते हैं, फिर भी वह लोक भरता क्यों नहीं?' 'नहीं।' 'क्या जानते हो कि किस आहुति के बाद जल पुरुष की वाणी पाकर उठता और बोलता है?' 'नहीं।' 'क्या देवयान और पितृयान मार्ग का आरम्भ जानते हो? ऋषि का वचन है, मैंने मनुष्यों के दो मार्ग सुने हैं, पितरों का और देवों का; पिता और माता के बीच जो कुछ चलता है, सब इन्हीं से जाता है।' उन्होंने कहा, 'मैं इनमें से एक भी नहीं जानता।'

6.2.3

अथैनं वसत्योपमन्त्रयां चक्रे ।
अनादृत्य वसतिं कुमारः प्रदुद्राव ।
स आजगाम पितरम् ।
तं होवाच इति वाव किल नो भवान् पुरानुशिष्टानवोच इति ।
कथं सुमेध इति ।
पञ्च मा प्रश्नान् राजन्यबन्धुरप्राक्षीत् ।
ततो नैकं चन वेदेति ।
कतमे त इति ।
इम इति ह प्रतीकान्युदाजहार

athainaṃ vasatyopamantrayāṃ cakre |
anādṛtya vasatiṃ kumāraḥ pradudrāva |
sa ājagāma pitaram |
taṃ hovāca iti vāva kila no bhavān purānuśiṣṭānavoca iti |
kathaṃ sumedha iti |
pañca mā praśnān rājanyabandhuraprākṣīt |
tato naikaṃ cana vedeti |
katame ta iti |
ima iti ha pratīkānyudājahāra

तब राजा ने उन्हें ठहरने का निमन्त्रण दिया। पर उसे अनसुना कर कुमार दौड़कर पिता के पास आए और बोले, 'आपने तो कहा था कि मुझे पूरी शिक्षा मिल चुकी है!' पिता ने पूछा, 'कैसे, बुद्धिमान पुत्र?' 'एक क्षत्रिय बन्धु ने मुझसे पाँच प्रश्न पूछे, और मैं एक का भी उत्तर नहीं जानता था।' 'वे कौन से हैं?' तब उन्होंने प्रश्नों के आरम्भिक शब्द सुनाए।

6.2.4

स होवाच तथा नस्त्वं तत जानीथा यथा यदहं किंच वेद सर्वमहं तत्तुभमवोचम् ।
प्रेहि तु तत्र ।
प्रतीत्य ब्रह्मचर्यं वत्स्याव इति ।
भवानेव गच्छत्विति ।
स आजगाम गौतमो यत्र प्रवाहणस्य जैवलेरास ।
तस्मा आसनमाहृत्योदकमाहारयां चकार ।
अथ हास्मा अर्घ्यं चकार ।
तं होवाच वरं भगवते गौतमाय दद्म इति

sa hovāca tathā nastvaṃ tata jānīthā yathā yadahaṃ kiṃca veda sarvamahaṃ tattubhamavocam |
prehi tu tatra |
pratītya brahmacaryaṃ vatsyāva iti |
bhavāneva gacchatviti |
sa ājagāma gautamo yatra pravāhaṇasya jaivalerāsa |
tasmā āsanamāhṛtyodakamāhārayāṃ cakāra |
atha hāsmā arghyaṃ cakāra |
taṃ hovāca varaṃ bhagavate gautamāya dadma iti

पिता ने कहा, 'वत्स, तुम मुझे जानते हो, जो कुछ मैं जानता था, वह सब मैंने तुम्हें बता दिया। चलो, वहाँ चलकर ब्रह्मचारी बनकर रहें।' पुत्र बोला, 'आप ही जाइए।' तब गौतम वहाँ आए जहाँ प्रवाहण जैवलि थे। राजा ने उन्हें आसन दिलवाया, जल मँगवाया और अर्घ्य दिया। फिर कहा, 'हम पूज्य गौतम को वर देते हैं।'

6.2.5

स होवाच प्रतिज्ञतो म एष वरः ।
यां तु कुमारस्यान्ते वाचमभाषथास्तां मे ब्रूहीति

sa hovāca pratijñato ma eṣa varaḥ |
yāṃ tu kumārasyānte vācamabhāṣathāstāṃ me brūhīti

गौतम ने कहा, 'आपने मुझे यह वर देने का वचन दिया है। तो कुमार के सामने आपने जो बात कही थी, वह मुझे बताइए।'

6.2.6

स होवाच दैवेषु वै गौतम तद्वरेषु ।
मानुषाणां ब्रूहीति

sa hovāca daiveṣu vai gautama tadvareṣu |
mānuṣāṇāṃ brūhīti

राजा ने कहा, 'गौतम, वह तो दैवी वरों में आता है। कोई मानुषी वर माँगिए।'

6.2.7

स होवाच विज्ञायते हास्तिहिरण्यस्यापात्तं गोअश्वानां दासीनां प्रवाराणां परिधानस्य ।
मा नो भवान् बहोरनन्तस्यापर्यन्तस्याभ्यवदान्यो भूदिति ।
स वै गौतम तीर्थेनेच्छसा इति ।
उपैम्यहं भवन्तमिति ।
वाचा ह स्मैव पूर्व उपयन्ति ।
स होपायनकीर्त्योवास

sa hovāca vijñāyate hāstihiraṇyasyāpāttaṃ goaśvānāṃ dāsīnāṃ pravārāṇāṃ paridhānasya |
mā no bhavān bahoranantasyāparyantasyābhyavadānyo bhūditi |
sa vai gautama tīrthenecchasā iti |
upaimyahaṃ bhavantamiti |
vācā ha smaiva pūrva upayanti |
sa hopāyanakīrtyovāsa

गौतम बोले, 'सब जानते हैं कि मेरे पास सोना, गाएँ, घोड़े, दासियाँ, सेवक और वस्त्र प्रचुर हैं। जो महान, अनन्त और असीम है, उसमें आप मेरे प्रति कृपण न हों।' राजा ने कहा, 'गौतम, तो आप उसे विधिपूर्वक, शिष्य बनकर चाहिए।' गौतम बोले, 'मैं आपके पास शिष्य बनकर आता हूँ।' प्राचीन काल में लोग केवल वाणी से ही गुरु के समीप जाते थे। इस प्रकार शिष्यता की घोषणा करके वे वहाँ रहे।

6.2.8

स होवाच तथा नस्त्वं गौतम मापराधास्तव च पितामहाः ।
यथेयं विद्येतः पूर्वं न कस्मिंश्चन ब्राह्मन उवास ।
तां त्वहं तुभ्यं वक्ष्यामि ।
को हि त्वैवं ब्रुवन्तमर्हति प्रत्याख्यातुमिति

sa hovāca tathā nastvaṃ gautama māparādhāstava ca pitāmahāḥ |
yatheyaṃ vidyetaḥ pūrvaṃ na kasmiṃścana brāhmana uvāsa |
tāṃ tvahaṃ tubhyaṃ vakṣyāmi |
ko hi tvaivaṃ bruvantamarhati pratyākhyātumiti

राजा ने कहा, 'गौतम, जैसे आपके पितामहों ने हमें दोष नहीं दिया, वैसे आप भी न दें। इससे पहले यह विद्या किसी ब्राह्मण के पास नहीं रही। पर मैं इसे आपको बताऊँगा, क्योंकि जो आप जैसा विनय से बोले, उसे कौन मना कर सकता है?'

6.2.9

असौ वै लोकोऽग्निर्गौतम ।
तस्यादित्य एव समित् ।
रश्मयो धूमः ।
अहरर्चिः ।
दिशोऽङ्गाराः ।
अवान्तरदिशो विष्फुलिङ्गाः ।
तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति ।
तस्या आहुत्यै सोमो राजा संभवति

asau vai loko'gnirgautama |
tasyāditya eva samit |
raśmayo dhūmaḥ |
ahararciḥ |
diśo'ṅgārāḥ |
avāntaradiśo viṣphuliṅgāḥ |
tasminnetasminnagnau devāḥ śraddhāṃ juhvati |
tasyā āhutyai somo rājā saṃbhavati

'गौतम, वह द्युलोक अग्नि है। सूर्य उसकी समिधा है, किरणें धुआँ, दिन ज्वाला, दिशाएँ अंगारे और उपदिशाएँ चिनगारियाँ। इस अग्नि में देवता श्रद्धा की आहुति देते हैं। उस आहुति से राजा सोम, अर्थात् चन्द्रमा, उत्पन्न होता है।'

6.2.10

पर्जन्यो वा अग्निर्गौतम ।
तस्य संवत्सर एव समित् ।
अभ्राणि धूमः ।
विद्युदर्चिः ।
अशनिरङ्गाराः ।
ह्रादुनयो विष्फुलिङ्गाः ।
तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः सोमं राजानं जुह्वति ।
तस्या आहुत्यै वृष्टिः संभवति

parjanyo vā agnirgautama |
tasya saṃvatsara eva samit |
abhrāṇi dhūmaḥ |
vidyudarciḥ |
aśaniraṅgārāḥ |
hrādunayo viṣphuliṅgāḥ |
tasminnetasminnagnau devāḥ somaṃ rājānaṃ juhvati |
tasyā āhutyai vṛṣṭiḥ saṃbhavati

'गौतम, पर्जन्य, अर्थात् वर्षा का देवता, अग्नि है। संवत्सर उसकी समिधा है, बादल धुआँ, बिजली ज्वाला, वज्र अंगारे और गर्जनाएँ चिनगारियाँ। इस अग्नि में देवता राजा सोम की आहुति देते हैं। उस आहुति से वर्षा होती है।'

6.2.11

अयं वै लोकोऽग्निर्गौतम ।
तस्य पृथिव्येव समित् ।
अग्निर्धूमः ।
रात्रिरर्चिः ।
चन्द्रमा अङ्गाराः ।
नक्षत्राणि विष्फुलिङ्गाः ।
तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा वृष्टिं जुह्वति ।
तस्या आहुत्या अन्नं संभवति

ayaṃ vai loko'gnirgautama |
tasya pṛthivyeva samit |
agnirdhūmaḥ |
rātrirarciḥ |
candramā aṅgārāḥ |
nakṣatrāṇi viṣphuliṅgāḥ |
tasminnetasminnagnau devā vṛṣṭiṃ juhvati |
tasyā āhutyā annaṃ saṃbhavati

'गौतम, यह लोक अग्नि है। पृथ्वी उसकी समिधा है, अग्नि धुआँ, रात्रि ज्वाला, चन्द्रमा अंगारे और नक्षत्र चिनगारियाँ। इस अग्नि में देवता वर्षा की आहुति देते हैं। उस आहुति से अन्न उत्पन्न होता है।'

6.2.12

पुरुषो वा अग्निर्गौतम ।
तस्य व्यात्तमेव समित् ।
प्राणो धूमः ।
वागर्चिः ।
चक्षुरङ्गाराः ।
श्रोत्रं विष्फुलिङ्गाः ।
तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति ।
तस्या आहुत्यै रेतः संभवति

puruṣo vā agnirgautama |
tasya vyāttameva samit |
prāṇo dhūmaḥ |
vāgarciḥ |
cakṣuraṅgārāḥ |
śrotraṃ viṣphuliṅgāḥ |
tasminnetasminnagnau devā annaṃ juhvati |
tasyā āhutyai retaḥ saṃbhavati

'गौतम, पुरुष अग्नि है। खुला मुख उसकी समिधा है, प्राण धुआँ, वाणी ज्वाला, नेत्र अंगारे और कान चिनगारियाँ। इस अग्नि में देवता अन्न की आहुति देते हैं। उस आहुति से वीर्य उत्पन्न होता है।'

6.2.13

योषा वा अग्निर्गौतम ।
तस्या उपस्थ एव समित् ।
लोमानि धूमः ।
योनिरर्चिः ।
यदन्तः करोति तेऽङ्गाराः ।
अभिनन्दा विष्फुलिङ्गाः ।
तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति ।
तस्या आहुत्यै पुरुषः संभवति ।
स जीवति यावज्जीवति ।
अथ यदा म्रियते

yoṣā vā agnirgautama |
tasyā upastha eva samit |
lomāni dhūmaḥ |
yonirarciḥ |
yadantaḥ karoti te'ṅgārāḥ |
abhinandā viṣphuliṅgāḥ |
tasminnetasminnagnau devā reto juhvati |
tasyā āhutyai puruṣaḥ saṃbhavati |
sa jīvati yāvajjīvati |
atha yadā mriyate

'गौतम, स्त्री अग्नि है।' दाम्पत्य मिलन में उसके अंगों की तुलना क्रम से यज्ञाग्नि की समिधा, धुएँ, ज्वाला, अंगारों और चिनगारियों से की गई है। 'इस अग्नि में देवता वीर्य की आहुति देते हैं। उस आहुति से पुरुष, अर्थात् मनुष्य, जन्म लेता है। वह जितने दिन जीता है, जीता है, फिर उसकी मृत्यु होती है।'

6.2.14

अथैनमग्नये हरन्ति ।
तस्याग्निरेवाग्निर्भवति ।
समित्समित् ।
धूमो धूमः ।
अर्चिरर्चिः ।
अङ्गारा अङ्गाराः ।
विष्फुलिङ्गा विष्फुलिङ्गाः ।
तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः पुरुषं जुह्वति ।
तस्या आहुत्यै पुरुषो भास्वरवर्णः संभवति

athainamagnaye haranti |
tasyāgnirevāgnirbhavati |
samitsamit |
dhūmo dhūmaḥ |
arcirarciḥ |
aṅgārā aṅgārāḥ |
viṣphuliṅgā viṣphuliṅgāḥ |
tasminnetasminnagnau devāḥ puruṣaṃ juhvati |
tasyā āhutyai puruṣo bhāsvaravarṇaḥ saṃbhavati

'फिर उसे अग्नि के पास ले जाते हैं। यहाँ अग्नि ही उसकी अग्नि है, समिधा ही समिधा, धुआँ ही धुआँ, ज्वाला ही ज्वाला, अंगारे ही अंगारे और चिनगारियाँ ही चिनगारियाँ। इस अग्नि में देवता पुरुष की आहुति देते हैं। उस आहुति से पुरुष तेजस्वी वर्ण वाला होकर उत्पन्न होता है।'

6.2.15

ते य एवमेतद्विदुर्ये चामी अरण्ये श्रद्धां सत्यमुपासते तेऽर्चिरभिसंभवन्ति ।
अर्चिषोऽहः ।
अह्न आपूर्यमाणपक्षम् ।
आपूर्यमाणपक्षाद्यान् षण्मासानुदङ्ङादित्य एति ।
मासेभ्यो देवलोकम् ।
देवलोकादादित्यम् ।
आदित्याद्वैद्युतम् ।
तान् वैद्युतान् पुरुषो मानस एत्य ब्रह्मलोकान् गमयति ।
ते तेषु ब्रह्मलोकेषु पराः परावतो वसन्ति ।
तेषां न पुनरावृत्तिः

te ya evametadvidurye cāmī araṇye śraddhāṃ satyamupāsate te'rcirabhisaṃbhavanti |
arciṣo'haḥ |
ahna āpūryamāṇapakṣam |
āpūryamāṇapakṣādyān ṣaṇmāsānudaṅṅāditya eti |
māsebhyo devalokam |
devalokādādityam |
ādityādvaidyutam |
tān vaidyutān puruṣo mānasa etya brahmalokān gamayati |
te teṣu brahmalokeṣu parāḥ parāvato vasanti |
teṣāṃ na punarāvṛttiḥ

'जो यह जानते हैं, और जो वन में श्रद्धा को सत्य मानकर उपासना करते हैं, वे अर्चि, अर्थात् ज्योति को प्राप्त होते हैं; ज्योति से दिन को, दिन से शुक्ल पक्ष को, शुक्ल पक्ष से उन छह महीनों को जब सूर्य उत्तर की ओर चलता है, महीनों से देवलोक को, देवलोक से सूर्य को और सूर्य से विद्युत् लोक को। वहाँ एक मानस पुरुष आकर उन्हें ब्रह्मलोकों में ले जाता है। वे उन ब्रह्मलोकों में अनन्त काल तक रहते हैं। उनका पुनरागमन नहीं होता।'

6.2.16

अथ ये यज्ञेन दानेन तपसा लोकाञ्जयन्ति ते धूममभिसंभवन्ति ।
धूमाद्रात्रिम् ।
रात्रेरपक्षीयमाणपक्षम् ।
अपक्षीयमाणपक्षाद्यान् षण्मासान् दक्षिणादित्य एति ।
मासेभ्यः पितृलोकम् ।
पितृलोकाच्चन्द्रम् ।
ते चन्द्रं प्राप्यान्नं भवन्ति ।
तांस्तत्र देवा यथा सोमं राजानमाप्यायस्वापक्षीयस्वेत्येवमेनांस्तत्र भक्षयन्ति ।
तेषां यदा तत्पर्यवैत्यथेममेवाकाशमभिनिष्पद्यन्ते ।
आकाशाद्वायुम् ।
वायोर्वृष्टिम् ।
वृष्टेः पृथिवीम् ।
ते पृथिवीं प्राप्यान्नं भवन्ति ।
ते पुनः पुरुषाग्नौ हूयन्ते ततो योषाग्नौ जायन्ते ।
लोकान् प्रत्युथायिनस्त एवमेवानुपरिवर्तन्ते ।
अथ य एतौ पन्थानौ न विदुस्ते कीटाः पतङ्गा यदिदं दन्दशूकम्

atha ye yajñena dānena tapasā lokāñjayanti te dhūmamabhisaṃbhavanti |
dhūmādrātrim |
rātrerapakṣīyamāṇapakṣam |
apakṣīyamāṇapakṣādyān ṣaṇmāsān dakṣiṇāditya eti |
māsebhyaḥ pitṛlokam |
pitṛlokāccandram |
te candraṃ prāpyānnaṃ bhavanti |
tāṃstatra devā yathā somaṃ rājānamāpyāyasvāpakṣīyasvetyevamenāṃstatra bhakṣayanti |
teṣāṃ yadā tatparyavaityathemamevākāśamabhiniṣpadyante |
ākāśādvāyum |
vāyorvṛṣṭim |
vṛṣṭeḥ pṛthivīm |
te pṛthivīṃ prāpyānnaṃ bhavanti |
te punaḥ puruṣāgnau hūyante tato yoṣāgnau jāyante |
lokān pratyuthāyinasta evamevānuparivartante |
atha ya etau panthānau na viduste kīṭāḥ pataṅgā yadidaṃ dandaśūkam

'पर जो यज्ञ, दान और तप से लोकों को जीतते हैं, वे धुएँ को प्राप्त होते हैं; धुएँ से रात्रि को, रात्रि से कृष्ण पक्ष को, उससे उन छह महीनों को जब सूर्य दक्षिण की ओर चलता है, महीनों से पितृलोक को और पितृलोक से चन्द्रमा को। चन्द्रमा पर पहुँचकर वे अन्न बनते हैं, और देवता वहाँ उनका भोग करते हैं जैसे राजा सोम का, कहते हुए, बढ़ो, घटो। जब वह पुण्य चुक जाता है, तब वे आकाश में, आकाश से वायु में, वायु से वर्षा में और वर्षा से पृथ्वी पर आते हैं। पृथ्वी पर वे अन्न बनते हैं, फिर पुरुष-अग्नि में हवन होकर स्त्री-अग्नि से जन्म लेते हैं। लोकों की ओर उठते हुए वे इसी प्रकार घूमते रहते हैं। जो इन दोनों मार्गों को नहीं जानते, वे कीड़े, पतंगे और डँसने वाले जीव बनते हैं।'

6.3.1

तृतीयं ब्राह्मणम् (ज्येष्ठब्राह्मणं वा प्राणविद्याब्राह्मणम्)
स यः कामयेत महत्प्राप्नुयामित्युदगयन आपूर्यमाणपक्षस्य पुण्याहे द्वादशाहमुपसद्व्रती भूत्वौदुम्बरे कंसे चमसे वा सर्वौषधं फलानीति संभृत्य परिसमुह्य परिलिप्याग्निमुपसमाधाय परिस्तीर्यावृताज्यं संस्कृत्य पुंसा नक्षत्रेण मन्थं संनीय जुहोति
यावन्तो देवास्त्वयि जातवेदस्तिर्यञ्चो घ्नन्ति पुरुषस्य कामान् ।
तेभ्योऽहं भागधेयं जुहोमि ते मा तृप्ताः सर्वैः कामैस्तर्पयन्तु स्वाहा ।
या तिरश्ची निपद्यसेऽहं विधरणी इति ।
तां त्वा घृतस्य धारया यजे संराधनीमहं स्वाहा

tṛtīyaṃ brāhmaṇam (jyeṣṭhabrāhmaṇaṃ vā prāṇavidyābrāhmaṇam)
sa yaḥ kāmayeta mahatprāpnuyāmityudagayana āpūryamāṇapakṣasya puṇyāhe dvādaśāhamupasadvratī bhūtvaudumbare kaṃse camase vā sarvauṣadhaṃ phalānīti saṃbhṛtya parisamuhya parilipyāgnimupasamādhāya paristīryāvṛtājyaṃ saṃskṛtya puṃsā nakṣatreṇa manthaṃ saṃnīya juhoti
yāvanto devāstvayi jātavedastiryañco ghnanti puruṣasya kāmān |
tebhyo'haṃ bhāgadheyaṃ juhomi te mā tṛptāḥ sarvaiḥ kāmaistarpayantu svāhā |
yā tiraścī nipadyase'haṃ vidharaṇī iti |
tāṃ tvā ghṛtasya dhārayā yaje saṃrādhanīmahaṃ svāhā

जो महानता पाना चाहे, वह उत्तरायण में, शुक्ल पक्ष के किसी पुण्य दिन, बारह दिन उपसद् व्रत रखे। फिर गूलर की लकड़ी के कटोरे या चमस में सब ओषधियाँ और फल इकट्ठे करे, भूमि बुहारकर लीपे, अग्नि स्थापित करे, उसके चारों ओर कुश बिछाए, विधि से घी संस्कारित करे और पुरुषवाची नक्षत्र में मन्थ तैयार करके आहुति दे: 'हे जातवेद, तुममें जो देवता टेढ़े होकर मनुष्य की कामनाओं को नष्ट करते हैं, उन्हें मैं उनका भाग अर्पित करता हूँ; वे तृप्त होकर मुझे सब कामनाओं से तृप्त करें, स्वाहा। जो तुम यह मानकर टेढ़ी पड़ी हो कि मैं ही सबको धारण करने वाली हूँ, उस तुम सिद्धि देने वाली को मैं घी की धारा से पूजता हूँ, स्वाहा।'

6.3.2

ज्येष्ठाय स्वाहा श्रेष्ठाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।
प्राणाय स्वाहा वसिष्ठायै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।
वाचे स्वाहा प्रतिष्ठायै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।
चक्षुषे स्वाहा संपदे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।
श्रोत्राय स्वाहायतनाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।
मनसे स्वाहा प्रजात्यै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।
रेतसे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति

jyeṣṭhāya svāhā śreṣṭhāya svāhetyagnau hutvā manthe saṃsravamavanayati |
prāṇāya svāhā vasiṣṭhāyai svāhetyagnau hutvā manthe saṃsravamavanayati |
vāce svāhā pratiṣṭhāyai svāhetyagnau hutvā manthe saṃsravamavanayati |
cakṣuṣe svāhā saṃpade svāhetyagnau hutvā manthe saṃsravamavanayati |
śrotrāya svāhāyatanāya svāhetyagnau hutvā manthe saṃsravamavanayati |
manase svāhā prajātyai svāhetyagnau hutvā manthe saṃsravamavanayati |
retase svāhetyagnau hutvā manthe saṃsravamavanayati

'ज्येष्ठाय स्वाहा, श्रेष्ठाय स्वाहा' कहकर अग्नि में आहुति देता है और बचा हुआ घी मन्थ में डालता है। इसी प्रकार 'प्राणाय स्वाहा, वसिष्ठायै स्वाहा', 'वाचे स्वाहा, प्रतिष्ठायै स्वाहा', 'चक्षुषे स्वाहा, सम्पदे स्वाहा', 'श्रोत्राय स्वाहा, आयतनाय स्वाहा', 'मनसे स्वाहा, प्रजात्यै स्वाहा' और 'रेतसे स्वाहा' कहकर आहुति देता है और हर बार शेष मन्थ में डालता है।

6.3.3

अग्नये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।
सोमाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।
भूः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।
भुवः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।
स्वः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।
भूर्भुवः स्वः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।
ब्रह्मणे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।
क्षत्राय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।
भूताय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।
भविष्यते स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।
विश्वाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।
सर्वाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।
प्रजापतये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति

agnaye svāhetyagnau hutvā manthe saṃsravamavanayati |
somāya svāhetyagnau hutvā manthe saṃsravamavanayati |
bhūḥ svāhetyagnau hutvā manthe saṃsravamavanayati |
bhuvaḥ svāhetyagnau hutvā manthe saṃsravamavanayati |
svaḥ svāhetyagnau hutvā manthe saṃsravamavanayati |
bhūrbhuvaḥ svaḥ svāhetyagnau hutvā manthe saṃsravamavanayati |
brahmaṇe svāhetyagnau hutvā manthe saṃsravamavanayati |
kṣatrāya svāhetyagnau hutvā manthe saṃsravamavanayati |
bhūtāya svāhetyagnau hutvā manthe saṃsravamavanayati |
bhaviṣyate svāhetyagnau hutvā manthe saṃsravamavanayati |
viśvāya svāhetyagnau hutvā manthe saṃsravamavanayati |
sarvāya svāhetyagnau hutvā manthe saṃsravamavanayati |
prajāpataye svāhetyagnau hutvā manthe saṃsravamavanayati

वह इन मन्त्रों से अग्नि में आहुति देता है और हर बार शेष मन्थ में डालता है: 'अग्नये स्वाहा', 'सोमाय स्वाहा', 'भूः स्वाहा', 'भुवः स्वाहा', 'स्वः स्वाहा', 'भूर्भुवः स्वः स्वाहा', 'ब्रह्मणे स्वाहा', अर्थात् ब्राह्मण-शक्ति को, 'क्षत्राय स्वाहा', अर्थात् क्षात्र-शक्ति को, 'भूताय स्वाहा', 'भविष्यते स्वाहा', 'विश्वाय स्वाहा', 'सर्वाय स्वाहा' और 'प्रजापतये स्वाहा'।

6.3.4

अथैनमभिमृशति भ्रमदसि ।
ज्वलदसि ।
पूर्णमसि ।
प्रस्तब्धमसि ।
एकसभमसि ।
हिङ्कृतमसि ।
हिङ्क्रियमानमसि ।
उद्गीथमसि ।
उद्गीयमानमसि ।
श्रावितमसि ।
प्रत्याश्रावितमसि ।
आर्द्रे संदीप्तमसि ।
विभूरसि ।
प्रभूरसि ।
अन्नमसि ।
ज्योतिरसि ।
निधनमसि ।
संवर्गोऽसीति

athainamabhimṛśati bhramadasi |
jvaladasi |
pūrṇamasi |
prastabdhamasi |
ekasabhamasi |
hiṅkṛtamasi |
hiṅkriyamānamasi |
udgīthamasi |
udgīyamānamasi |
śrāvitamasi |
pratyāśrāvitamasi |
ārdre saṃdīptamasi |
vibhūrasi |
prabhūrasi |
annamasi |
jyotirasi |
nidhanamasi |
saṃvargo'sīti

फिर वह मन्थ को छूकर कहता है: 'तुम गतिमान हो, तुम प्रज्वलित हो, तुम पूर्ण हो, तुम अचल हो, तुम सबके एक सभा-स्थान हो। तुम गाया गया और गाया जा रहा हिंकार हो, तुम गाया गया और गाया जा रहा उद्गीथ हो। तुम सुनाया गया और प्रत्युत्तर में सुनाया गया हो। तुम आर्द्र मेघ में चमकने वाले हो। तुम व्यापक हो, तुम समर्थ हो। तुम अन्न हो, तुम ज्योति हो। तुम निधन, अर्थात् अन्त हो, तुम संवर्ग, अर्थात् सबको अपने में समेटने वाले हो।'

6.3.5

अथैनमुद्यच्छत्यामंस्यामं हि ते महि ।
स हि राजेशानोऽधिपतिः ।
स मां राजेशनोऽधिपतिं करोत्विति

athainamudyacchatyāmaṃsyāmaṃ hi te mahi |
sa hi rājeśāno'dhipatiḥ |
sa māṃ rājeśano'dhipatiṃ karotviti

फिर वह मन्थ को उठाकर कहता है: 'तुम सब जानते हो, और हम तुम्हारी महिमा जानते हैं। वह राजा है, ईशान है, अधिपति है। वह मुझे राजा, ईशान और अधिपति बनाए।'

6.3.6

अथैनमाचामति
तत्सवितुर्वरेण्यम् ।
मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः ।
माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः ।
भूः स्वाहा ।
भर्गो देवस्य धीमहि
मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवं रजः ।
मधु द्यौरस्तु नः पिता ।
भुवः स्वाहा ।
धियो यो नः प्रचोदयात् ।
मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमां अस्तु सूर्यः ।
माध्वीर्गवो भवन्तु नः ।
स्वः स्वाहा ।
सर्वां च सावित्रीमन्वाह ।
सर्वाश्च मधुमतीरहमेवेदं सर्वं भूयासं भूर्भुवः स्वः स्वाहेति अन्तत आचम्य पाणी प्रक्षाल्य जघनेनाग्निं प्राक्शिराः संविशति ।
प्रातरादित्यमुपतिष्ठते ।
दिशामेकपुण्डरीकमसि ।
अहं मनुष्याणामेकपुण्डरीकं भूयासमिति ।
यथेतमेत्य जघनेनाग्निमासीनो वंशं जपति

athainamācāmati
tatsaviturvareṇyam |
madhu vātā ṛtāyate madhu kṣaranti sindhavaḥ |
mādhvīrnaḥ santvoṣadhīḥ |
bhūḥ svāhā |
bhargo devasya dhīmahi
madhu naktamutoṣaso madhumatpārthivaṃ rajaḥ |
madhu dyaurastu naḥ pitā |
bhuvaḥ svāhā |
dhiyo yo naḥ pracodayāt |
madhumānno vanaspatirmadhumāṃ astu sūryaḥ |
mādhvīrgavo bhavantu naḥ |
svaḥ svāhā |
sarvāṃ ca sāvitrīmanvāha |
sarvāśca madhumatīrahamevedaṃ sarvaṃ bhūyāsaṃ bhūrbhuvaḥ svaḥ svāheti antata ācamya pāṇī prakṣālya jaghanenāgniṃ prākśirāḥ saṃviśati |
prātarādityamupatiṣṭhate |
diśāmekapuṇḍarīkamasi |
ahaṃ manuṣyāṇāmekapuṇḍarīkaṃ bhūyāsamiti |
yathetametya jaghanenāgnimāsīno vaṃśaṃ japati

फिर वह सावित्री मन्त्र को मधुमती ऋचाओं के साथ जोड़कर मन्थ का आचमन करता है: 'सविता के उस वरणीय तेज का; सत्यनिष्ठ के लिए वायु मधु बहाएँ, नदियाँ मधु बहाएँ, ओषधियाँ हमारे लिए मधुर हों, भूः स्वाहा। देव के भर्ग का हम ध्यान करते हैं; रात और उषाएँ मधुर हों, पृथ्वी की धूल मधुर हो, पिता द्युलोक मधुर हो, भुवः स्वाहा। जो हमारी बुद्धि को प्रेरित करे; वनस्पति मधुर हो, सूर्य मधुर हो, गौएँ मधुर हों, स्वः स्वाहा।' फिर पूरी सावित्री और सब मधुमती ऋचाएँ कहकर, 'मैं ही यह सब हो जाऊँ, भूर्भुवः स्वः स्वाहा' कहकर अन्तिम आचमन करता है, हाथ धोकर अग्नि के पीछे पूर्व की ओर सिर करके लेटता है। प्रातः सूर्य की उपासना करता है: 'तुम दिशाओं के एकमात्र कमल हो, मैं मनुष्यों में एकमात्र कमल बनूँ।' फिर लौटकर अग्नि के पीछे बैठकर गुरु-वंश का जप करता है।

6.3.7

तं हैतमुद्दालक आरुणिर्वाजसनेयाय याज्ञवल्क्यायान्तेवासिन उक्त्वोवाच अपि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति

taṃ haitamuddālaka āruṇirvājasaneyāya yājñavalkyāyāntevāsina uktvovāca api ya enaṃ śuṣke sthāṇau niṣiñcejjāyerañchākhāḥ praroheyuḥ palāśānīti

उद्दालक आरुणि ने यह विद्या अपने शिष्य वाजसनेय याज्ञवल्क्य को बताकर कहा: 'यदि कोई इसे सूखे ठूँठ पर भी छिड़क दे, तो उसमें शाखाएँ निकल आएँ और पत्ते फूट पड़ें।'

6.3.8

एतमु हैव वाजसनेयो याज्नवल्क्यो मधुकाय पैङ्ग्यायान्तेवासिन उक्त्वोवाच अपि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति

etamu haiva vājasaneyo yājnavalkyo madhukāya paiṅgyāyāntevāsina uktvovāca api ya enaṃ śuṣke sthāṇau niṣiñcejjāyerañchākhāḥ praroheyuḥ palāśānīti

वाजसनेय याज्ञवल्क्य ने यह विद्या अपने शिष्य मधुक पैंग्य को बताकर कहा: 'यदि कोई इसे सूखे ठूँठ पर भी छिड़क दे, तो उसमें शाखाएँ निकल आएँ और पत्ते फूट पड़ें।'

6.3.9

एतमु हैव मधुकः पैङ्ग्यश्चूलाय भागवित्तयेऽन्तेवासिन उक्त्वोवाच अपि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति

etamu haiva madhukaḥ paiṅgyaścūlāya bhāgavittaye'ntevāsina uktvovāca api ya enaṃ śuṣke sthāṇau niṣiñcejjāyerañchākhāḥ praroheyuḥ palāśānīti

मधुक पैंग्य ने यह विद्या अपने शिष्य चूल भागवित्ति को बताकर कहा: 'यदि कोई इसे सूखे ठूँठ पर भी छिड़क दे, तो उसमें शाखाएँ निकल आएँ और पत्ते फूट पड़ें।'

6.3.10

एतमु हैव चूलो भागवित्तिर्जानकय आयःस्थूणायान्तेवासिन उक्त्वोवाच अपि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति

etamu haiva cūlo bhāgavittirjānakaya āyaḥsthūṇāyāntevāsina uktvovāca api ya enaṃ śuṣke sthāṇau niṣiñcejjāyerañchākhāḥ praroheyuḥ palāśānīti

चूल भागवित्ति ने यह विद्या अपने शिष्य जानकि आयस्थूण को बताकर कहा: 'यदि कोई इसे सूखे ठूँठ पर भी छिड़क दे, तो उसमें शाखाएँ निकल आएँ और पत्ते फूट पड़ें।'

6.3.11

एतमु हैव जानकिरायस्थूणः सत्यकामाय जाबालायान्तेवासिन उक्त्वोवाच अपि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति

etamu haiva jānakirāyasthūṇaḥ satyakāmāya jābālāyāntevāsina uktvovāca api ya enaṃ śuṣke sthāṇau niṣiñcejjāyerañchākhāḥ praroheyuḥ palāśānīti

जानकि आयस्थूण ने यह विद्या अपने शिष्य सत्यकाम जाबाल को बताकर कहा: 'यदि कोई इसे सूखे ठूँठ पर भी छिड़क दे, तो उसमें शाखाएँ निकल आएँ और पत्ते फूट पड़ें।'

6.3.12

एतमु हैव सत्यकामो जाबालोऽन्तेवासिभ्य उक्त्वोव अचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ।
तमेतं नापुत्राय वानन्तेवासिने वा ब्रूयात्

etamu haiva satyakāmo jābālo'ntevāsibhya uktvova acāpi ya enaṃ śuṣke sthāṇau niṣiñcejjāyerañchākhāḥ praroheyuḥ palāśānīti |
tametaṃ nāputrāya vānantevāsine vā brūyāt

सत्यकाम जाबाल ने यह विद्या अपने शिष्यों को बताकर कहा: 'यदि कोई इसे सूखे ठूँठ पर भी छिड़क दे, तो उसमें शाखाएँ निकल आएँ और पत्ते फूट पड़ें।' इसे अपने पुत्र या शिष्य के अतिरिक्त किसी को नहीं बताना चाहिए।

6.3.13

चतुरौदुम्बरो भवति ।
औदुम्बरः स्रुव औदुम्बरश्चमस औदुम्बर इध्म औदुम्बर्या उपमन्थन्यौ ।
दश ग्राम्याणि धान्यानि भवन्ति ।
व्रीहियवास्तिलमाषा अणुप्रियंगवो गोधूमाश्च मसूराश्च खल्वाश्च खलकुलाश्च ।
तान् पिष्टान् दधनि मधुनि घृत उपसिञ्चति ।
आज्यस्य जुहोति

caturaudumbaro bhavati |
audumbaraḥ sruva audumbaraścamasa audumbara idhma audumbaryā upamanthanyau |
daśa grāmyāṇi dhānyāni bhavanti |
vrīhiyavāstilamāṣā aṇupriyaṃgavo godhūmāśca masūrāśca khalvāśca khalakulāśca |
tān piṣṭān dadhani madhuni ghṛta upasiñcati |
ājyasya juhoti

चार वस्तुएँ गूलर की होती हैं: स्रुवा, चमस, समिधा और दो मन्थन-दण्ड। दस ग्राम्य धान्य होते हैं: धान और जौ, तिल और उड़द, अणु और प्रियंगु, गेहूँ, मसूर, खल्व और खलकुल। इन्हें पीसकर दही, मधु और घी में भिगोया जाता है, और घी की आहुति दी जाती है।

6.4.1

चतुर्थं ब्राह्मणम् (पुत्रमन्थकर्मब्राह्मणम्)
एषां वै भूतानां पृथिवी रसः ।
पृथिव्या आपः ।
अपामोषधयः ।
ओषधीनां पुष्पाणि ।
पुष्पाणां फलानि ।
फलानां पुरुषः ।
पुरुषस्य रेतः

caturthaṃ brāhmaṇam (putramanthakarmabrāhmaṇam)
eṣāṃ vai bhūtānāṃ pṛthivī rasaḥ |
pṛthivyā āpaḥ |
apāmoṣadhayaḥ |
oṣadhīnāṃ puṣpāṇi |
puṣpāṇāṃ phalāni |
phalānāṃ puruṣaḥ |
puruṣasya retaḥ

इन सब प्राणियों का रस पृथ्वी है; पृथ्वी का रस जल; जल का रस ओषधियाँ; ओषधियों का रस फूल; फूलों का रस फल; फलों का रस पुरुष; और पुरुष का रस वीर्य है।

6.4.2

स ह प्रजापतिरीक्षां चक्रे हन्तास्मै प्रतिष्ठां कल्पयानीति स स्त्रियं ससृजे ।
तां सृष्ट्वाध उपास्त ।
तस्मात्स्त्रियमध उपासीत ।
स एतं प्राञ्चं ग्रावाणमात्मन एव समुदपारयत् ।
तेनैनामभ्यसृजत

sa ha prajāpatirīkṣāṃ cakre hantāsmai pratiṣṭhāṃ kalpayānīti sa striyaṃ sasṛje |
tāṃ sṛṣṭvādha upāsta |
tasmātstriyamadha upāsīta |
sa etaṃ prāñcaṃ grāvāṇamātmana eva samudapārayat |
tenaināmabhyasṛjata

प्रजापति ने विचार किया, 'इस वीर्य के लिए एक प्रतिष्ठा, अर्थात् आधार, रचूँ।' तब उन्होंने स्त्री की सृष्टि की। उसे रचकर उन्होंने उसका आदर किया; इसलिए पुरुष को अपनी पत्नी का आदर करना चाहिए। प्रजापति ने अपने ही भीतर से सृजन की शक्ति प्रकट की और उसके द्वारा उससे संयुक्त हुए।

6.4.3

तस्या वेदिरुपस्थः ।
लोमानि बर्हिश् ।
चर्माधिषवणे ।
समिद्धो मध्यतस्तौ मुष्कौ ।
स यावान् ह वै वाजपेयेन यजमनस्य लोको भवति तावानस्य लोको भवति ।
य एवं विद्वानधोपहासं चरत्यासां स्त्रीणां सुकृतं वृङ्क्ते ।
अथ य इदमविद्वानधोपहासं चरत्यास्य स्त्रियः सुकृतं वृञ्जते

tasyā vedirupasthaḥ |
lomāni barhiś |
carmādhiṣavaṇe |
samiddho madhyatastau muṣkau |
sa yāvān ha vai vājapeyena yajamanasya loko bhavati tāvānasya loko bhavati |
ya evaṃ vidvānadhopahāsaṃ caratyāsāṃ strīṇāṃ sukṛtaṃ vṛṅkte |
atha ya idamavidvānadhopahāsaṃ caratyāsya striyaḥ sukṛtaṃ vṛñjate

दाम्पत्य मिलन की तुलना अंग-अंग करके सोमयज्ञ की वेदी, कुश, अभिषवण-चर्म और प्रज्वलित अग्नि से की गई है। वाजपेय यज्ञ करने वाले को जो लोक मिलता है, वही लोक उसे मिलता है जो यह जानकर इसी भाव से पत्नी के समीप जाता है; उसका गृहस्थ जीवन पुण्य देने वाला होता है। पर जो यह ज्ञान न रखकर ऐसा करता है, उसका पुण्य नष्ट होता है।

6.4.4

एतद्ध स्म वै तद्विद्वानुद्दालक आरुणिराह ।
एतद्ध स्म वै तद्विद्वान्नाको मौद्गल्य आह ।
एतद्ध स्म वै तद्विद्वान् कुमारहारित आह बहवो मर्या ब्राह्मनायना निरिन्द्रिया विसुकृतोऽस्माल्लोकात्प्रयन्ति य इदमविद्वांसोऽधोपहासं चरन्तीति ।
बहु वा इदं सुप्तस्य वा जाग्रतो वा रेतः स्कन्दति

etaddha sma vai tadvidvānuddālaka āruṇirāha |
etaddha sma vai tadvidvānnāko maudgalya āha |
etaddha sma vai tadvidvān kumārahārita āha bahavo maryā brāhmanāyanā nirindriyā visukṛto'smāllokātprayanti ya idamavidvāṃso'dhopahāsaṃ carantīti |
bahu vā idaṃ suptasya vā jāgrato vā retaḥ skandati

यह जानकर उद्दालक आरुणि ने कहा, नाक मौद्गल्य ने कहा और कुमारहारित ने कहा: 'बहुत से मनुष्य, जो केवल नाम के ब्राह्मण हैं, इस ज्ञान के बिना दाम्पत्य जीवन बिताकर बलहीन और पुण्यहीन होकर इस लोक से जाते हैं।' यदि सोते या जागते वीर्य स्खलित हो जाए, तो आगे कहा उपाय करना चाहिए।

6.4.5

तदभिमृशेदनु वा मन्त्रयेत यन्मेऽद्य रेतः पृथिवीमस्कान्त्सीद्यदोषधीरप्यसरद्यदपः ।
इदमहं तद्रेत आददे ।
पुनर्मामैतु इन्द्रियं पुनस्तेजः पुनर्भगः ।
पुनरग्निर्धिष्ण्या यथास्थानं कल्पन्ताम् ।
इत्यनामिकाङ्गुष्ठाभ्यामादायान्तरेण स्तनौ वा भ्रुवौ वा निमृज्यात्

tadabhimṛśedanu vā mantrayeta yanme'dya retaḥ pṛthivīmaskāntsīdyadoṣadhīrapyasaradyadapaḥ |
idamahaṃ tadreta ādade |
punarmāmaitu indriyaṃ punastejaḥ punarbhagaḥ |
punaragnirdhiṣṇyā yathāsthānaṃ kalpantām |
ityanāmikāṅguṣṭhābhyāmādāyāntareṇa stanau vā bhruvau vā nimṛjyāt

वह उसे छूए या इस मन्त्र से अभिमन्त्रित करे: 'आज मेरा जो वीर्य पृथ्वी पर, ओषधियों में या जल में गिरा, उसे मैं वापस लेता हूँ। मुझमें फिर से बल, तेज और सौभाग्य लौटे। अग्नियाँ अपने-अपने स्थान पर फिर स्थित हों।' फिर अनामिका और अंगूठे से लेकर उसे वक्ष के बीच या भौहों के बीच लगाए।

6.4.6

अथ यद्युदक आत्मानं पश्येत्तदभिमन्त्रयेत मयि तेज इन्द्रियं यशो द्रविणं सुकृतमिति ।
श्रीर्ह वा एषा स्त्रीणां यन्मलोद्वासाः ।
तस्मान्मलोद्वाससं यशस्विनीमभिक्रम्योपमन्त्रयेत

atha yadyudaka ātmānaṃ paśyettadabhimantrayeta mayi teja indriyaṃ yaśo draviṇaṃ sukṛtamiti |
śrīrha vā eṣā strīṇāṃ yanmalodvāsāḥ |
tasmānmalodvāsasaṃ yaśasvinīmabhikramyopamantrayeta

यदि वह जल में अपना प्रतिबिम्ब देखे, तो कहे: 'मुझमें तेज, बल, यश, धन और पुण्य रहें।' जो पत्नी ऋतुकाल पूरा करके मलिन वस्त्र त्याग चुकी हो, वह स्त्रियों में श्री, अर्थात् लक्ष्मी स्वरूप है। उन दिनों के बाद स्नान कर चुकी उस यशस्विनी पत्नी के पास जाकर उससे बात करे।

6.4.7

सा चेदस्मै न दद्यात्काममेनामवक्रिणीयात् ।
सा चेदस्मै नैव दद्यात्काममेनां यष्ट्या वा पाणिना वोपहत्यातिक्रामेत् ।
इन्द्रियेन ते यशसा यश आदद इति ।
अयशा एव भवति

sā cedasmai na dadyātkāmamenāmavakriṇīyāt |
sā cedasmai naiva dadyātkāmamenāṃ yaṣṭyā vā pāṇinā vopahatyātikrāmet |
indriyena te yaśasā yaśa ādada iti |
ayaśā eva bhavati

यदि वह सहमत न हो, तो उपहार देकर उसे प्रसन्न करे। यदि फिर भी सहमत न हो, तो वह दण्ड या हाथ के प्रतीकात्मक स्पर्श के साथ यह कहकर उसे छोड़ दे, 'अपने बल और यश से मैं तुम्हारा यश लेता हूँ।' तब वह यशहीन हो जाती है।

6.4.8

सा चेदस्मै दद्यादिन्द्रियेण ते यशसा यश आदधामीति ।
यशस्विनावेव भवतः

sā cedasmai dadyādindriyeṇa te yaśasā yaśa ādadhāmīti |
yaśasvināveva bhavataḥ

यदि वह सहमत हो, तो वह कहे: 'अपने बल और यश से मैं तुम्हें यश देता हूँ।' तब दोनों यशस्वी होते हैं।

6.4.9

स यामिच्छेत् कामयेत मेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं संधायोपस्थमस्या अभिमृश्य जपेत्
अङ्गादङ्गात्संभवसि हृदयादधिजायसे ।
स त्वमङ्गकषायोऽसि दिग्धविद्धामिव मादयेमाममूं मयीति

sa yāmicchet kāmayeta meti tasyāmarthaṃ niṣṭhāya mukhena mukhaṃ saṃdhāyopasthamasyā abhimṛśya japet
aṅgādaṅgātsaṃbhavasi hṛdayādadhijāyase |
sa tvamaṅgakaṣāyo'si digdhaviddhāmiva mādayemāmamūṃ mayīti

यदि वह चाहे कि पत्नी उससे प्रेम करे, तो दाम्पत्य की निकटता में वह यह मन्त्र जपे: 'तुम अंग-अंग से उत्पन्न होते हो, हृदय से प्रकट होते हो। तुम अंगों के सार हो। इसे मुझमें वैसे ही अनुरक्त कर दो जैसे अभिमन्त्रित बाण से बिंधा हुआ।'

6.4.10

अथ यामिच्छेन्न गर्भं दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं संधायाभिप्राण्यापान्यात् ।
इन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदद इति ।
अरेता एव भवति

atha yāmicchenna garbhaṃ dadhīteti tasyāmarthaṃ niṣṭhāya mukhena mukhaṃ saṃdhāyābhiprāṇyāpānyāt |
indriyeṇa te retasā reta ādada iti |
aretā eva bhavati

यदि वह चाहे कि पत्नी गर्भ धारण न करे, तो मिलन में वह श्वास छोड़कर फिर खींचे और कहे: 'अपने बल और वीर्य से मैं तुमसे वीर्य वापस लेता हूँ।' तब वह गर्भवती नहीं होती।

6.4.11

अथ यामिच्छेद्दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं संधायापान्याभिप्राण्यात् ।
इन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदधामीति ।
गर्भिण्येव भवति

atha yāmiccheddadhīteti tasyāmarthaṃ niṣṭhāya mukhena mukhaṃ saṃdhāyāpānyābhiprāṇyāt |
indriyeṇa te retasā reta ādadhāmīti |
garbhiṇyeva bhavati

यदि वह चाहे कि पत्नी गर्भ धारण करे, तो मिलन में वह श्वास खींचकर फिर छोड़े और कहे: 'अपने बल और वीर्य से मैं तुममें वीर्य स्थापित करता हूँ।' तब वह गर्भवती होती है।

6.4.12

अथ यस्य जायायै जारः स्यात्तं चेद्द्विष्यादामपात्रेऽग्निमुपसमाधाय प्रतिलोमं शरबर्हिः स्तीर्त्वा तस्मिन्नेताः शरभृष्टीः प्रतिलोमाः सर्पिषाक्ता जुहुयात् ।
मम समिद्धेऽहौषीः ।
प्राणापानौ त आददेऽसाविति ।
मम समिद्धेऽहौषीः ।
पुत्रपशूंस्त आददेऽसाविति ।
मम समिद्धेऽहौषीः ।
इष्टासुकृते त आददेऽसाविति ।
मम समिद्धेऽहौषीः ।
अशापराकाशौ त आददेऽसाविति ।
स वा एष निरिन्द्रियो विसुकृतोऽस्माल्लोकाद्प्रैति यमेवंविद्ब्राह्मणः शपति ।
तस्मादेवंवित्श्रोत्रियस्य दारेण नोपहासमिच्छेत् ।
उत ह्येवंवित्परो भवति

atha yasya jāyāyai jāraḥ syāttaṃ ceddviṣyādāmapātre'gnimupasamādhāya pratilomaṃ śarabarhiḥ stīrtvā tasminnetāḥ śarabhṛṣṭīḥ pratilomāḥ sarpiṣāktā juhuyāt |
mama samiddhe'hauṣīḥ |
prāṇāpānau ta ādade'sāviti |
mama samiddhe'hauṣīḥ |
putrapaśūṃsta ādade'sāviti |
mama samiddhe'hauṣīḥ |
iṣṭāsukṛte ta ādade'sāviti |
mama samiddhe'hauṣīḥ |
aśāparākāśau ta ādade'sāviti |
sa vā eṣa nirindriyo visukṛto'smāllokādpraiti yamevaṃvidbrāhmaṇaḥ śapati |
tasmādevaṃvitśrotriyasya dāreṇa nopahāsamicchet |
uta hyevaṃvitparo bhavati

यदि किसी की पत्नी का कोई जार हो और पति उसका अनिष्ट चाहे, तो कच्चे पात्र में अग्नि रखकर, सरकण्डे उलटे क्रम में बिछाकर, घी लगे सरकण्डे के बाण उलटे हवन करे और चार बार कहे, 'तुमने मेरी प्रज्वलित अग्नि में हवन किया', फिर उसका नाम लेकर, 'मैं तुम्हारे प्राण और अपान लेता हूँ', 'पुत्र और पशु', 'यज्ञ और पुण्य', 'आशा और प्रतीक्षा लेता हूँ'। ऐसा जानने वाला ब्राह्मण जिसे शाप देता है, वह बलहीन और पुण्यहीन होकर इस लोक से जाता है। इसलिए ऐसे ज्ञानी श्रोत्रिय की पत्नी का अपमान कभी न चाहे, क्योंकि वह भारी शत्रु बन जाता है।

6.4.13

अथ यस्य जायामार्तवं विन्देत्त्र्यहं कंसे न पिबेत् ।
अहतवासाः ।
नैनां वृषलो न वृषल्यपहन्यात् ।
त्रिरात्रान्त आप्लुत्य व्रीहीनवघातयेत्

atha yasya jāyāmārtavaṃ vindettryahaṃ kaṃse na pibet |
ahatavāsāḥ |
naināṃ vṛṣalo na vṛṣalyapahanyāt |
trirātrānta āplutya vrīhīnavaghātayet

जब पत्नी रजस्वला हो, तो तीन दिन वह काँसे के पात्र में न पिए और नया वस्त्र पहने। कोई आचारहीन पुरुष या स्त्री उसे न छुए। तीन रातें बीतने पर वह स्नान करे और फिर उससे धान कुटवाया जाए।

6.4.14

स य इच्छेत् पुत्रो मे शुक्लो जायेत वेदमनुब्रुवीत सर्वमायुरियादिति क्षीरौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयाताम् ।
ईश्वरौ जनयितवै

sa ya icchet putro me śuklo jāyeta vedamanubruvīta sarvamāyuriyāditi kṣīraudanaṃ pācayitvā sarpiṣmantamaśnīyātām |
īśvarau janayitavai

यदि कोई चाहे कि 'मेरा पुत्र गौर वर्ण का हो, एक वेद का अध्ययन करे और पूरी आयु जिए', तो पति-पत्नी दूध में भात पकवाकर, उसमें घी मिलाकर खाएँ। तब वे ऐसे पुत्र को जन्म देने में समर्थ होते हैं।

6.4.15

अथ य इच्छेत् पुत्रो मे कपिलः पिङ्गलो जायेत द्वौ वेदावनुब्रुवीत सर्वमायुरियादिति दध्योदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयाताम् ।
ईश्वरौ जनयितवै

atha ya icchet putro me kapilaḥ piṅgalo jāyeta dvau vedāvanubruvīta sarvamāyuriyāditi dadhyodanaṃ pācayitvā sarpiṣmantamaśnīyātām |
īśvarau janayitavai

यदि कोई चाहे कि 'मेरा पुत्र कपिल या पिंगल, अर्थात् भूरे वर्ण का हो, दो वेदों का अध्ययन करे और पूरी आयु जिए', तो पति-पत्नी दही में भात पकवाकर, घी मिलाकर खाएँ। तब वे ऐसे पुत्र को जन्म देने में समर्थ होते हैं।

6.4.16

अथ य इच्छेत् पुत्रो मे श्यामो लोहिताक्षो जायेत त्रीन् वेदाननुब्रुवीत सर्वमायुरियादिति उदौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयाताम् ।
ईश्वरौ जनयितवै

atha ya icchet putro me śyāmo lohitākṣo jāyeta trīn vedānanubruvīta sarvamāyuriyāditi udaudanaṃ pācayitvā sarpiṣmantamaśnīyātām |
īśvarau janayitavai

यदि कोई चाहे कि 'मेरा पुत्र श्याम वर्ण और लाल नेत्रों वाला हो, तीन वेदों का अध्ययन करे और पूरी आयु जिए', तो पति-पत्नी जल में भात पकवाकर, घी मिलाकर खाएँ। तब वे ऐसे पुत्र को जन्म देने में समर्थ होते हैं।

6.4.17

अथ य इच्छेद् दुहिता मे पण्डिता जायेत सर्वमायुरियादिति तिलौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयाताम् ।
ईश्वरौ जनयितवै

atha ya icched duhitā me paṇḍitā jāyeta sarvamāyuriyāditi tilaudanaṃ pācayitvā sarpiṣmantamaśnīyātām |
īśvarau janayitavai

यदि कोई चाहे कि 'मेरी पुत्री पण्डिता, अर्थात् विदुषी हो और पूरी आयु जिए', तो पति-पत्नी तिल के साथ भात पकवाकर, घी मिलाकर खाएँ। तब वे ऐसी पुत्री को जन्म देने में समर्थ होते हैं।

6.4.18

अथ य इच्छेत् पुत्रो मे पण्डितो विगीतः समितिंगमः शुश्रूषितां वाचं भाषिता जायेत सर्वान् वेदाननुब्रुवीत सर्वमायुरियादिति मांसौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयाताम् ।
ईश्वरौ जनयितवाइ ।
औक्षेण वार्षभेण वा

atha ya icchet putro me paṇḍito vigītaḥ samitiṃgamaḥ śuśrūṣitāṃ vācaṃ bhāṣitā jāyeta sarvān vedānanubruvīta sarvamāyuriyāditi māṃsaudanaṃ pācayitvā sarpiṣmantamaśnīyātām |
īśvarau janayitavāi |
aukṣeṇa vārṣabheṇa vā

यदि कोई चाहे कि 'मेरा पुत्र पण्डित, प्रसिद्ध, सभाओं में जाने वाला और ऐसी वाणी बोलने वाला हो जिसे लोग सुनना चाहें, सब वेदों का अध्ययन करे और पूरी आयु जिए', तो पति-पत्नी मांस के साथ भात पकवाकर, घी मिलाकर खाएँ। तब वे ऐसे पुत्र को जन्म देने में समर्थ होते हैं। पाठ में उक्ष या ऋषभ का नाम आता है, जिसका अर्थ टीकाकार अलग-अलग करते हैं।

6.4.19

अथाभिप्रातरेव स्थालीपाकावृताज्यं चेष्टित्वा स्थालीपाकस्योपघातं जुहोत्यग्नये स्वाहानुमतये स्वाहा देवाय सवित्रे सत्यप्रसवाय स्वाहेति ।
हुत्वोद्धृत्य प्राश्नाति ।
प्राश्येतरस्याः प्रयच्छति ।
प्रक्षाल्य पाणी उदपात्रं पूरयित्वा तेनैनां त्रिरभ्युक्षति
उत्तिष्ठातो विश्वावसोऽन्यामिच्छ प्रपूर्व्याम् ।
सं जायां पत्या सहेति

athābhiprātareva sthālīpākāvṛtājyaṃ ceṣṭitvā sthālīpākasyopaghātaṃ juhotyagnaye svāhānumataye svāhā devāya savitre satyaprasavāya svāheti |
hutvoddhṛtya prāśnāti |
prāśyetarasyāḥ prayacchati |
prakṣālya pāṇī udapātraṃ pūrayitvā tenaināṃ trirabhyukṣati
uttiṣṭhāto viśvāvaso'nyāmiccha prapūrvyām |
saṃ jāyāṃ patyā saheti

फिर प्रातःकाल के समीप स्थालीपाक की विधि से घी तैयार करके, उसमें से थोड़ा-थोड़ा लेकर आहुति देता है: 'अग्नये स्वाहा, अनुमतये स्वाहा, सत्यप्रसव देव सविता को स्वाहा।' आहुति देकर शेष निकालकर स्वयं खाता है और बचा हुआ पत्नी को देता है। हाथ धोकर जल-पात्र भरता है और उससे उसे तीन बार छिड़ककर कहता है: 'हे विश्वावसु, यहाँ से उठो, किसी अन्य युवती को खोजो। यह पत्नी अपने पति के साथ है।'

6.4.20

अथैनामभिपद्यते अमोऽहमस्मि सा त्वम् ।
सा त्वमस्यमोऽहम् ।
सामाहमस्मि ऋक्त्वम् ।
द्यौरहं पृथिवी त्वम् ।
तावेहि संरभावहै सह रेतो दधावहै ।
पुंसे पुत्राय वित्तय इति

athaināmabhipadyate amo'hamasmi sā tvam |
sā tvamasyamo'ham |
sāmāhamasmi ṛktvam |
dyaurahaṃ pṛthivī tvam |
tāvehi saṃrabhāvahai saha reto dadhāvahai |
puṃse putrāya vittaya iti

फिर वह उसके पास जाकर कहता है: 'मैं अम हूँ, तुम सा हो; तुम सा हो, मैं अम हूँ। मैं साम हूँ, तुम ऋक् हो। मैं द्युलोक हूँ, तुम पृथ्वी हो। आओ, हम साथ मिलकर प्रयत्न करें और साथ वीर्य धारण करें, पुत्र के लिए, सम्पत्ति के लिए।'

6.4.21

अथास्या ऊरू विहापयति विजिहीथां द्यावापृथिवी इति ।
तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं संधाय त्रिरेनामनुलोमामनुमार्ष्टि
विष्णुर्योनिं कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिंशतु ।
आ सिञ्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु ते ।
गर्भं धेहि सिनीवालि गर्भं धेहि पृथुष्टुके ।
गर्भं ते अश्विनौ देवावाधत्तां पुष्करस्रजौ

athāsyā ūrū vihāpayati vijihīthāṃ dyāvāpṛthivī iti |
tasyāmarthaṃ niṣṭhāya mukhena mukhaṃ saṃdhāya trirenāmanulomāmanumārṣṭi
viṣṇuryoniṃ kalpayatu tvaṣṭā rūpāṇi piṃśatu |
ā siñcatu prajāpatirdhātā garbhaṃ dadhātu te |
garbhaṃ dhehi sinīvāli garbhaṃ dhehi pṛthuṣṭuke |
garbhaṃ te aśvinau devāvādhattāṃ puṣkarasrajau

'हे द्युलोक और पृथ्वी, अलग हो जाओ' कहकर वह पत्नी से संयुक्त होता है और तीन बार इन वैदिक मन्त्रों से उसे आशीर्वाद देता है: 'विष्णु गर्भाशय को तैयार करें, त्वष्टा रूपों को गढ़ें, प्रजापति सिंचन करें, धाता तुममें गर्भ स्थापित करें। हे सिनीवाली, गर्भ धारण कराओ; हे पृथुष्टुका, गर्भ धारण कराओ। कमल की माला पहने दोनों देव अश्विनीकुमार तुममें गर्भ स्थापित करें।'

6.4.22

हिरण्मयी अरणी याभ्यां निर्मन्थतामश्विनौ ।
तं ते गर्भं हवामहे दशमे मासि सूतये ।
यथाग्निगर्भा पृथिवी यथा द्यौरैन्द्रेण गर्भिणी ।
वायुर्दिशां यथा गर्भ एवं गर्भं दधामि तेऽसाविति

hiraṇmayī araṇī yābhyāṃ nirmanthatāmaśvinau |
taṃ te garbhaṃ havāmahe daśame māsi sūtaye |
yathāgnigarbhā pṛthivī yathā dyauraindreṇa garbhiṇī |
vāyurdiśāṃ yathā garbha evaṃ garbhaṃ dadhāmi te'sāviti

'जिन सोने की अरणियों से अश्विनीकुमारों ने अग्नि का मन्थन किया, उसी गर्भ का हम तुम्हारे लिए आवाहन करते हैं, कि दसवें मास में उसका जन्म हो। जैसे पृथ्वी अग्नि को गर्भ में रखती है, जैसे द्युलोक इन्द्र से गर्भवती है, जैसे वायु दिशाओं का गर्भ है, वैसे ही मैं तुममें गर्भ स्थापित करता हूँ,' और वह पत्नी का नाम लेता है।

6.4.23

सोष्यन्तीमद्भिरभ्युक्षति
यथा वायुः पुष्करिणीं समिङ्गयति सर्वतः ।
एवा ते गर्भ एजतु सहावैतु जरायुणा ।
इन्द्रस्यायं व्रजः कृतः सार्गलः सपरिश्रयः ।
तमिन्द्र निर्जहि गर्भेण सावरां सहेति

soṣyantīmadbhirabhyukṣati
yathā vāyuḥ puṣkariṇīṃ samiṅgayati sarvataḥ |
evā te garbha ejatu sahāvaitu jarāyuṇā |
indrasyāyaṃ vrajaḥ kṛtaḥ sārgalaḥ sapariśrayaḥ |
tamindra nirjahi garbheṇa sāvarāṃ saheti

जब प्रसव का समय हो, तो वह उस पर जल छिड़ककर कहता है: 'जैसे वायु कमल-सरोवर को चारों ओर से हिलाती है, वैसे ही तुम्हारा गर्भ हिले और जरायु के साथ बाहर आए। यह इन्द्र का बनाया बाड़ा है, अर्गला और घेरे सहित; हे इन्द्र, गर्भ को जरायु सहित बाहर निकालो।'

6.4.24

जातेऽग्निमुपसमाधायाङ्क आधाय कंसे पृषदाज्यं संनीय पृषदाज्यस्योपघातं जुहोति
अस्मिन्सहस्रं पुष्यासमेधमानः स्वे गृहे ।
अस्योपसन्द्यां मा छैत्सीत्प्रजया च पशुभिश्च स्वाहा ।
मयि प्राणांस्त्वयि मनसा जुहोमि स्वाहा ।
यत्कर्मणात्यरीरिचं यद्वा न्यूनमिहाकरम् ।
अग्निष्टत्स्विष्टकृद्विद्वान् स्विष्टं सुहुतं करोतु नः स्वाहेति

jāte'gnimupasamādhāyāṅka ādhāya kaṃse pṛṣadājyaṃ saṃnīya pṛṣadājyasyopaghātaṃ juhoti
asminsahasraṃ puṣyāsamedhamānaḥ sve gṛhe |
asyopasandyāṃ mā chaitsītprajayā ca paśubhiśca svāhā |
mayi prāṇāṃstvayi manasā juhomi svāhā |
yatkarmaṇātyarīricaṃ yadvā nyūnamihākaram |
agniṣṭatsviṣṭakṛdvidvān sviṣṭaṃ suhutaṃ karotu naḥ svāheti

बालक के जन्म होने पर वह अग्नि जलाकर, बालक को गोद में लेकर, काँसे के पात्र में दही और घी मिलाकर उसमें से आहुति देता है: 'अपने इस घर में बढ़ता हुआ मैं सहस्रों का पालन करूँ। इसके वंश में सन्तान और पशुओं सहित लक्ष्मी कभी न टूटे, स्वाहा। मुझमें जो प्राण हैं, उन्हें मैं मन से तुममें अर्पित करता हूँ, स्वाहा। इस कर्म में मुझसे जो अधिक या कम हुआ हो, उसे ज्ञानी स्विष्टकृत् अग्नि हमारे लिए भली प्रकार यजित और भली प्रकार हुत कर दें, स्वाहा।'

6.4.25

अथास्य दक्षिणं कर्णमभिनिधाय वाग्वागिति त्रिः ।
अथ दधि मधु घृतं संनीयानन्तर्हितेन जातरूपेण प्राशयति ।
भूस्ते दधामि भुवस्ते दधामि स्वस्ते दधामि भूर्भुवः स्वः सर्वं त्वयि दधामीति

athāsya dakṣiṇaṃ karṇamabhinidhāya vāgvāgiti triḥ |
atha dadhi madhu ghṛtaṃ saṃnīyānantarhitena jātarūpeṇa prāśayati |
bhūste dadhāmi bhuvaste dadhāmi svaste dadhāmi bhūrbhuvaḥ svaḥ sarvaṃ tvayi dadhāmīti

फिर बालक के दाहिने कान के पास मुख ले जाकर तीन बार कहता है, 'वाक्, वाक्।' फिर दही, मधु और घी मिलाकर, बिना किसी आवरण के सोने से उसे चटाता है और कहता है: 'मैं तुममें भूः रखता हूँ, भुवः रखता हूँ, स्वः रखता हूँ। भूर्भुवः स्वः, सब कुछ मैं तुममें रखता हूँ।'

6.4.26

अथास्य नाम करोति वेदोऽसीति ।
तदस्यैतद्गुह्यमेव नाम भवति

athāsya nāma karoti vedo'sīti |
tadasyaitadguhyameva nāma bhavati

फिर वह बालक का नामकरण करता है, कहता है, 'तुम वेद हो।' यही उसका गुप्त नाम होता है।

6.4.27

अथैनं मात्रे प्रदाय स्तनं प्रयच्छति यस्ते स्तनः शशयो यो मयोभूर्यो रत्नधा वसुविद्यः सुदत्रः ।
येन विश्वा पुष्यसि वार्याणि सरस्वति तमिह धातवे करिति

athainaṃ mātre pradāya stanaṃ prayacchati yaste stanaḥ śaśayo yo mayobhūryo ratnadhā vasuvidyaḥ sudatraḥ |
yena viśvā puṣyasi vāryāṇi sarasvati tamiha dhātave kariti

फिर वह बालक को माता को सौंपकर उसे स्तनपान कराता है, कहता हुआ: 'हे सरस्वती, तुम्हारा जो स्तन सदा भरा, सुख देने वाला, रत्न धारण करने वाला, धन देने वाला और उदार है, जिससे तुम सब वरणीय वस्तुओं का पोषण करती हो, उसे यहाँ बालक के पीने के लिए दो।'

6.4.28

अथास्य मातरमभिमन्त्रयते इलासि मैत्रावरुणी वीरे वीरमजीजनत् ।
सा त्वं वीरवती भव यास्मान् वीरवतोऽकरदिति ।
तं वा एतमाहुः अतिपिता बताभूः ।
अतिपितामहो बताभूः ।
परमां बत काष्ठां प्राप श्रिया यशसा ब्रह्मवर्चसेन ।
य एवंविदो ब्राह्मणस्य पुत्रो जायत इति

athāsya mātaramabhimantrayate ilāsi maitrāvaruṇī vīre vīramajījanat |
sā tvaṃ vīravatī bhava yāsmān vīravato'karaditi |
taṃ vā etamāhuḥ atipitā batābhūḥ |
atipitāmaho batābhūḥ |
paramāṃ bata kāṣṭhāṃ prāpa śriyā yaśasā brahmavarcasena |
ya evaṃvido brāhmaṇasya putro jāyata iti

फिर वह माता को सम्बोधित करता है: 'तुम मित्र और वरुण की पुत्री इला हो। हे वीरा, तुमने वीर को जन्म दिया है। तुम वीरों की माता बनो, जिसने हमें वीर पुत्र वाला बनाया।' ऐसे पुत्र के विषय में कहते हैं: 'तुम पिता से आगे बढ़ गए, पितामह से भी आगे बढ़ गए।' ऐसा जानने वाले ब्राह्मण के घर जन्मा पुत्र श्री, यश और ब्रह्मतेज में परम सीमा तक पहुँचता है।

6.5.1

पञ्चमं ब्राह्मणम्
अथ वंशः ।
पौतिमाषीपुत्रः कात्यायनीपुत्रात् ।
कात्यायनीपुत्रो गौतमीपुत्रात् ।
गौतमीपुत्रो भारद्वाजीपुत्रात् ।
भारद्वाजीपुत्रः पाराशरीपुत्रात् ।
पाराशरीपुत्र औपस्वस्तीपुत्रात् ।
औपस्वस्तीपुत्रः पाराशरीपुत्रात् ।
पाराशरीपुत्रः कात्यायनीपुत्रात् ।
कात्यायनीपुत्रः कौशिकीपुत्रात् ।
कौशिकीपुत्र आलम्बीपुत्राच्च वैयाघ्रपदीपुत्राच्च ।
वैयाघ्रपदीपुत्रह्काण्वीपुत्राच्च कापीपुत्राच्च ।
कापीपुत्रः

pañcamaṃ brāhmaṇam
atha vaṃśaḥ |
pautimāṣīputraḥ kātyāyanīputrāt |
kātyāyanīputro gautamīputrāt |
gautamīputro bhāradvājīputrāt |
bhāradvājīputraḥ pārāśarīputrāt |
pārāśarīputra aupasvastīputrāt |
aupasvastīputraḥ pārāśarīputrāt |
pārāśarīputraḥ kātyāyanīputrāt |
kātyāyanīputraḥ kauśikīputrāt |
kauśikīputra ālambīputrācca vaiyāghrapadīputrācca |
vaiyāghrapadīputrahkāṇvīputrācca kāpīputrācca |
kāpīputraḥ

अब गुरु-वंश। पौतिमाषीपुत्र ने यह विद्या कात्यायनीपुत्र से पाई; कात्यायनीपुत्र ने गौतमीपुत्र से; गौतमीपुत्र ने भारद्वाजीपुत्र से; भारद्वाजीपुत्र ने पाराशरीपुत्र से; पाराशरीपुत्र ने औपस्वस्तीपुत्र से; औपस्वस्तीपुत्र ने पाराशरीपुत्र से; पाराशरीपुत्र ने कात्यायनीपुत्र से; कात्यायनीपुत्र ने कौशिकीपुत्र से; कौशिकीपुत्र ने आलम्बीपुत्र और वैयाघ्रपदीपुत्र से; वैयाघ्रपदीपुत्र ने काण्वीपुत्र और कापीपुत्र से; और कापीपुत्र ने

6.5.3

आत्रेयीपुत्रात् ।
आत्रेयीपुत्रो गौतमीपुत्रात् ।
गौतमीपुत्रो भारद्वाजीपुत्रात् ।
भारद्वाजीपुत्रः पाराशरीपुत्रात् ।
पाराशरीपुत्रो वात्सीपुत्रात् ।
वात्सीपुत्रः पाराशरीपुत्रात् ।
पाराशरीपुत्रो वार्कारुनीपुत्रात् ।
वार्कारुणीपुत्रो वार्कारुणीपुत्रात् ।
वार्कारुणीपुत्र आर्तभागीपुत्रात् ।
आर्तभागीपुत्रः शौङ्गीपुत्रात् ।
शौङ्गीपुत्रः सान्कृतीपुत्रात् ।
साङृतीपुत्र आलम्बायनीपुत्रात् ।
आलम्बायनीपुत्र आलम्बीपुत्रात् ।
आलम्बीपुत्रो जायन्तीपुत्रात् ।
जायन्तीपुत्रो माण्डूकायनीपुत्रात् ।
माण्डूकायनीपुत्रो माण्डूकीपुत्रात् ।
माण्डूकीपुत्रः शाण्डिलीपुत्रात् ।
शाण्डिलीपुत्रो राथीतरीपुत्रात् ।
राथीतरीपुत्रो भालुकीपुत्रात् ।
भालुकीपुत्रः क्रौञ्चिकीपुत्राभ्याम् ।
क्रौञ्चिकीपुत्रौ वैदभृतीपुत्रात् ।
वैदभृतीपुत्रः कार्शकेयीपुत्रात् ।
कार्शकेयीपुत्रः प्राचीनयोगीपुत्रात् ।
प्राचीनयोगीपुत्रः साञ्जीवीपुत्रात् ।
साञ्जीवीपुत्रः प्राश्नीपुत्रादासुरिवासिनः ।
प्राश्नीपुत्र आसुरायणात् ।
आसुरायण आसुरेः ।
आसुरिः । बृह. ६,५.२ ॥
याज्ञवल्क्यात् ।
याज्ञवल्क्य उद्दालकात् ।
उद्दालकोऽरुणात् ।
अरुण उपवेशेः ।
उपवेशिः कुश्रेः ।
कुश्रिर्वाजश्रवसः ।
वाजश्रवा जीह्वावतो बाध्योगात् ।
जीह्वावान् बाध्योगोऽसिताद्वार्षगणात् ।
असितो वार्षगणो हरितात्कश्यपात् ।
हरितः कश्यपः शिल्पात्कश्यपात् ।
शिल्पः कश्यपः कश्यपान्नैध्रुवेः ।
कश्यपो नैध्रुविर्वाचः ।
वागम्भिण्याः ।
अम्भिण्यादित्यात् ।
आदित्यानीमानि शुक्लानि यजूंषि वाजसनेयेन याज्ञवल्क्येनाख्ययन्ते

ātreyīputrāt |
ātreyīputro gautamīputrāt |
gautamīputro bhāradvājīputrāt |
bhāradvājīputraḥ pārāśarīputrāt |
pārāśarīputro vātsīputrāt |
vātsīputraḥ pārāśarīputrāt |
pārāśarīputro vārkārunīputrāt |
vārkāruṇīputro vārkāruṇīputrāt |
vārkāruṇīputra ārtabhāgīputrāt |
ārtabhāgīputraḥ śauṅgīputrāt |
śauṅgīputraḥ sānkṛtīputrāt |
sāṅṛtīputra ālambāyanīputrāt |
ālambāyanīputra ālambīputrāt |
ālambīputro jāyantīputrāt |
jāyantīputro māṇḍūkāyanīputrāt |
māṇḍūkāyanīputro māṇḍūkīputrāt |
māṇḍūkīputraḥ śāṇḍilīputrāt |
śāṇḍilīputro rāthītarīputrāt |
rāthītarīputro bhālukīputrāt |
bhālukīputraḥ krauñcikīputrābhyām |
krauñcikīputrau vaidabhṛtīputrāt |
vaidabhṛtīputraḥ kārśakeyīputrāt |
kārśakeyīputraḥ prācīnayogīputrāt |
prācīnayogīputraḥ sāñjīvīputrāt |
sāñjīvīputraḥ prāśnīputrādāsurivāsinaḥ |
prāśnīputra āsurāyaṇāt |
āsurāyaṇa āsureḥ |
āsuriḥ | bṛha. 6,5.2 ||
yājñavalkyāt |
yājñavalkya uddālakāt |
uddālako'ruṇāt |
aruṇa upaveśeḥ |
upaveśiḥ kuśreḥ |
kuśrirvājaśravasaḥ |
vājaśravā jīhvāvato bādhyogāt |
jīhvāvān bādhyogo'sitādvārṣagaṇāt |
asito vārṣagaṇo haritātkaśyapāt |
haritaḥ kaśyapaḥ śilpātkaśyapāt |
śilpaḥ kaśyapaḥ kaśyapānnaidhruveḥ |
kaśyapo naidhruvirvācaḥ |
vāgambhiṇyāḥ |
ambhiṇyādityāt |
ādityānīmāni śuklāni yajūṃṣi vājasaneyena yājñavalkyenākhyayante

आत्रेयीपुत्र से पाई; आत्रेयीपुत्र ने गौतमीपुत्र से; फिर क्रम से भारद्वाजीपुत्र, पाराशरीपुत्र, वात्सीपुत्र, पाराशरीपुत्र, दो वार्कारुणीपुत्र, आर्तभागीपुत्र, शौंगीपुत्र, सांकृतीपुत्र, आलम्बायनीपुत्र, आलम्बीपुत्र, जायन्तीपुत्र, माण्डूकायनीपुत्र, माण्डूकीपुत्र, शाण्डिलीपुत्र, राथीतरीपुत्र, भालुकीपुत्र, दोनों क्रौंचिकीपुत्र, वैदभृतीपुत्र, कार्शकेयीपुत्र, प्राचीनयोगीपुत्र, सांजीवीपुत्र, आसुरिवासी प्राश्नीपुत्र, आसुरायण और आसुरि से होकर। आसुरि ने याज्ञवल्क्य से पाई; याज्ञवल्क्य ने उद्दालक से; उद्दालक ने अरुण से; अरुण ने उपवेशि से; फिर कुश्रि, वाजश्रवा, जिह्वावान् बाध्योग, असित वार्षगण, हरित कश्यप, शिल्प कश्यप, कश्यप नैध्रुवि, वाक् देवी, अम्भिणी और आदित्य तक। आदित्य से प्राप्त ये शुक्ल यजुष् वाजसनेय याज्ञवल्क्य द्वारा प्रकट किए गए हैं।

6.5.4

समानमा साञ्जीवीपुत्रात् ।
सञ्जिवीपुत्रो माण्डूकायनेः ।
माण्डूकायनिर्माण्डव्यात् ।
माण्डव्यः कौत्सात् ।
कौत्सो माहित्थेः ।
माहित्थिर्वामकक्षायणात् ।
वामकक्षायणः शाण्डिल्यात् ।
शाण्डिल्यो वात्स्यात् ।
वात्स्यः कुश्रेः ।
कुश्रिर्यज्ञवचसः राजस्तम्बायनात् ।
यज्ञवचा राजस्तम्बायनः तुरात्कावषेयात् ।
तुरः कावषेयः प्रजापतेः ।
प्रजापतिर्ब्रह्मणः ।
ब्रह्म स्वयंभु ।
ब्रह्मणे नमः
इति बृहदारण्यकोपनिषदि षष्ठोऽध्यायः ॥

samānamā sāñjīvīputrāt |
sañjivīputro māṇḍūkāyaneḥ |
māṇḍūkāyanirmāṇḍavyāt |
māṇḍavyaḥ kautsāt |
kautso māhittheḥ |
māhitthirvāmakakṣāyaṇāt |
vāmakakṣāyaṇaḥ śāṇḍilyāt |
śāṇḍilyo vātsyāt |
vātsyaḥ kuśreḥ |
kuśriryajñavacasaḥ rājastambāyanāt |
yajñavacā rājastambāyanaḥ turātkāvaṣeyāt |
turaḥ kāvaṣeyaḥ prajāpateḥ |
prajāpatirbrahmaṇaḥ |
brahma svayaṃbhu |
brahmaṇe namaḥ
iti bṛhadāraṇyakopaniṣadi ṣaṣṭho'dhyāyaḥ ||

सांजीवीपुत्र तक वंश वही है। सांजीवीपुत्र ने माण्डूकायनि से पाई; माण्डूकायनि ने माण्डव्य से; माण्डव्य ने कौत्स से; कौत्स ने माहित्थि से; माहित्थि ने वामकक्षायण से; वामकक्षायण ने शाण्डिल्य से; शाण्डिल्य ने वात्स्य से; वात्स्य ने कुश्रि से; कुश्रि ने यज्ञवचा राजस्तम्बायन से; यज्ञवचा ने तुर कावषेय से; तुर कावषेय ने प्रजापति से; और प्रजापति ने ब्रह्म से। ब्रह्म स्वयम्भू है। ब्रह्म को नमस्कार।

प्रथमोऽध्यायः
द्वितीयोऽध्यायः
तृतीयोऽध्यायः
चतुर्थोऽध्यायः
पञ्चमोऽध्यायः
षष्ठोऽध्यायः

prathamo'dhyāyaḥ
dvitīyo'dhyāyaḥ
tṛtīyo'dhyāyaḥ
caturtho'dhyāyaḥ
pañcamo'dhyāyaḥ
ṣaṣṭho'dhyāyaḥ

पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)