अध्याय 6: मुख्य प्राण, पंचाग्नि और गृहस्थ के संस्कार
इति वाजसनेयके बृहदारण्यकोपनिषत्समाप्ता ॥
74 श्लोक · 6 में से 6
इस अध्याय में क्या होता है
मुख्य प्राण, पंचाग्नि और गृहस्थ के संस्कार
इन्द्रियाँ विवाद करती हैं कि श्रेष्ठ कौन है। हर एक एक वर्ष के लिए शरीर छोड़ती है और शरीर जीता रहता है; जब प्राण निकलने लगता है तब सब उससे रुकने की विनती करती हैं। श्वेतकेतु पांचालों की सभा में जाते हैं, पर राजा प्रवाहण जैवलि के पाँच प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाते; उनके पिता गौतम शिष्य बनकर राजा से पंचाग्नि विद्या सीखते हैं, द्युलोक, मेघ, पृथ्वी, पुरुष और स्त्री, और मृत्यु के बाद के दो मार्ग, अर्चि और धूम। फिर ओषधियों का मन्थ कर्म है। आगे दाम्पत्य जीवन और योग्य पुत्र की प्राप्ति के गृहस्थ संस्कार मन्त्रों सहित सीधे कहे गए हैं, और नवजात शिशु के स्वागत के कर्म। उपनिषद् ब्रह्म तक जाती पूरी गुरु-परम्परा से समाप्त होता है।
प्रथमोऽध्यायः द्वितीयोऽध्यायः तृतीयोऽध्यायः चतुर्थोऽध्यायः पञ्चमोऽध्यायः षष्ठोऽध्यायः अथ षष्ठोऽध्यायः । प्रथमं ब्राह्मणम् यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च स्वानां भवति । प्राणो वै ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च । ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च स्वानां भवति । अपि च येषां बुभूषति । य एवं वेद
prathamo'dhyāyaḥ dvitīyo'dhyāyaḥ tṛtīyo'dhyāyaḥ caturtho'dhyāyaḥ pañcamo'dhyāyaḥ ṣaṣṭho'dhyāyaḥ atha ṣaṣṭho'dhyāyaḥ | prathamaṃ brāhmaṇam yo ha vai jyeṣṭhaṃ ca śreṣṭhaṃ ca veda jyeṣṭhaśca śreṣṭhaśca svānāṃ bhavati | prāṇo vai jyeṣṭhaśca śreṣṭhaśca | jyeṣṭhaśca śreṣṭhaśca svānāṃ bhavati | api ca yeṣāṃ bubhūṣati | ya evaṃ veda
जो सबसे ज्येष्ठ और सबसे श्रेष्ठ को जानता है, वह अपने लोगों में ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हो जाता है। प्राण ही ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है। जो ऐसा जानता है, वह अपनों में और जिनके बीच वह बड़ा होना चाहता है उनमें भी ज्येष्ठ और श्रेष्ठ बनता है।
यो ह वै वसिष्ठां वेद वसिष्ठः स्वानां भवति । वाग्वै वसिष्ठा । वसिष्ठः स्वानां भवति । अपि च येषां बुभूषति । य एवं वेद
yo ha vai vasiṣṭhāṃ veda vasiṣṭhaḥ svānāṃ bhavati | vāgvai vasiṣṭhā | vasiṣṭhaḥ svānāṃ bhavati | api ca yeṣāṃ bubhūṣati | ya evaṃ veda
जो वसिष्ठा, अर्थात् सबसे उत्तम बसाने वाली को जानता है, वह अपनों में सबसे उत्तम हो जाता है। वाणी ही वसिष्ठा है। जो ऐसा जानता है, वह अपनों में और जिनके बीच वह बड़ा होना चाहता है उनमें भी श्रेष्ठ बनता है।
यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रतितिष्ठति समे । प्रतितिष्ठति दुर्गे । चक्षुर्वै प्रतिष्ठा । चक्षुषा हि समे च दुर्गे च प्रतितिष्ठति । प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे । य एवं वेद
yo ha vai pratiṣṭhāṃ veda pratitiṣṭhati same | pratitiṣṭhati durge | cakṣurvai pratiṣṭhā | cakṣuṣā hi same ca durge ca pratitiṣṭhati | pratitiṣṭhati same pratitiṣṭhati durge | ya evaṃ veda
जो प्रतिष्ठा, अर्थात् दृढ़ आधार को जानता है, वह समतल भूमि पर भी टिकता है और विषम भूमि पर भी। नेत्र ही प्रतिष्ठा है, क्योंकि आँख से ही मनुष्य सम और विषम दोनों स्थानों पर पैर जमाता है। जो ऐसा जानता है, वह सम और विषम में स्थिर रहता है।
yo ha vai saṃpadaṃ veda saṃ hāsmai padyate yaṃ kāmaṃ kāmayate | śrotraṃ vai saṃpat | śrotre hīme sarve vedā abhisaṃpannāḥ | saṃ hāsmai padyate yaṃ kāmaṃ kāmayate | ya evaṃ veda
जो सम्पत् को जानता है, उसे वह हर कामना प्राप्त हो जाती है जिसकी वह इच्छा करता है। श्रोत्र ही सम्पत् है, क्योंकि ये सारे वेद कान में ही आकर प्राप्त होते हैं। जो ऐसा जानता है, उसकी हर कामना पूरी होती है।
यो ह वा आयतनं वेदायतनं स्वानां भवत्यायतनं जनानाम् । मनो वा आयतनम् । आयतनं स्वानां भवत्यायतनं जनानाम् । य एवं वेद
yo ha vā āyatanaṃ vedāyatanaṃ svānāṃ bhavatyāyatanaṃ janānām | mano vā āyatanam | āyatanaṃ svānāṃ bhavatyāyatanaṃ janānām | ya evaṃ veda
जो आयतन, अर्थात् आश्रय को जानता है, वह अपनों का और सब लोगों का आश्रय बन जाता है। मन ही आयतन है। जो ऐसा जानता है, वह अपनों का और जन-जन का आश्रय बनता है।
yo ha vai prajātiṃ veda prajāyate ha prajayā paśubhiḥ | reto vai prajātiḥ | prajāyate ha prajayā paśubhiḥ | ya evaṃ veda
जो प्रजाति, अर्थात् सन्तति के मूल को जानता है, वह सन्तान और पशुधन से सम्पन्न होता है। वीर्य ही प्रजाति है। जो ऐसा जानता है, वह सन्तान और पशुओं से बढ़ता है।
ते हेमे प्राणा अहंश्रेयसे विवदमाना ब्रह्म जग्मुः । तद्धोचुः को नो वसिष्ठ इति । तद्धोवाच यस्मिन् व उत्क्रान्त इदं शरीरं पापियो मन्यते स वो वसिष्ठ इति
te heme prāṇā ahaṃśreyase vivadamānā brahma jagmuḥ | taddhocuḥ ko no vasiṣṭha iti | taddhovāca yasmin va utkrānta idaṃ śarīraṃ pāpiyo manyate sa vo vasiṣṭha iti
ये प्राण, अर्थात् इन्द्रियाँ, 'मैं श्रेष्ठ हूँ' कहकर आपस में विवाद करते हुए ब्रह्मा के पास गए और पूछा, 'हममें सबसे श्रेष्ठ कौन है?' उन्होंने कहा, 'जिसके निकल जाने पर यह शरीर सबसे अधिक हीन माना जाए, वही तुममें श्रेष्ठ है।'
वाणी शरीर से निकल गई। एक वर्ष बाहर रहकर लौटी और बोली, 'मेरे बिना तुम कैसे जी सके?' वे बोले, 'जैसे गूँगे जीते हैं, वाणी से न बोलते हुए, पर प्राण से साँस लेते, आँख से देखते, कान से सुनते, मन से जानते और वीर्य से सन्तान उत्पन्न करते हुए, वैसे ही हम जिए।' वाणी फिर भीतर आ गई।
नेत्र निकल गया। एक वर्ष बाहर रहकर लौटा और बोला, 'मेरे बिना तुम कैसे जी सके?' वे बोले, 'जैसे अन्धे जीते हैं, आँख से न देखते हुए, पर प्राण से साँस लेते, वाणी से बोलते, कान से सुनते, मन से जानते और वीर्य से सन्तान उत्पन्न करते हुए, वैसे ही हम जिए।' नेत्र फिर भीतर आ गया।
श्रोत्र निकल गया। एक वर्ष बाहर रहकर लौटा और बोला, 'मेरे बिना तुम कैसे जी सके?' वे बोले, 'जैसे बहरे जीते हैं, कान से न सुनते हुए, पर प्राण से साँस लेते, वाणी से बोलते, आँख से देखते, मन से जानते और वीर्य से सन्तान उत्पन्न करते हुए, वैसे ही हम जिए।' श्रोत्र फिर भीतर आ गया।
mano hoccakrāma | tatsaṃvatsaraṃ proṣyāgatyovāca kathamaśakata madṛte jīvitumiti | te hocuḥ yathā mugdhā avidvāṃso manasā prāṇantaḥ prāṇena vadanto vācā paśyantaścakṣuṣā śṛṇvantaḥ śrotreṇa prajāyamānā retasaivamajīviṣmeti | praviveśa ha manaḥ
मन निकल गया। एक वर्ष बाहर रहकर लौटा और बोला, 'मेरे बिना तुम कैसे जी सके?' वे बोले, 'जैसे मूढ़ लोग जीते हैं, मन से न जानते हुए, पर प्राण से साँस लेते, वाणी से बोलते, आँख से देखते, कान से सुनते और वीर्य से सन्तान उत्पन्न करते हुए, वैसे ही हम जिए।' मन फिर भीतर आ गया।
वीर्य निकल गया। एक वर्ष बाहर रहकर लौटा और बोला, 'मेरे बिना तुम कैसे जी सके?' वे बोले, 'जैसे सन्तान उत्पन्न करने में असमर्थ लोग जीते हैं, पर प्राण से साँस लेते, वाणी से बोलते, आँख से देखते, कान से सुनते और मन से जानते हुए, वैसे ही हम जिए।' वीर्य फिर भीतर आ गया।
अथ ह प्राण उत्क्रमिष्यन् यथा महासुहयः सैन्धवः पड्वीशशङ्खून्त्संवृहेदेवं हैवेमान् प्राणान्त्संववर्ह । ते होचुः मा भगव उत्क्रमीः । न वै शक्ष्यामस्त्वदृते जीवितुमिति । तस्यो मे बलिं कुरुतेति । तथेति
atha ha prāṇa utkramiṣyan yathā mahāsuhayaḥ saindhavaḥ paḍvīśaśaṅkhūntsaṃvṛhedevaṃ haivemān prāṇāntsaṃvavarha | te hocuḥ mā bhagava utkramīḥ | na vai śakṣyāmastvadṛte jīvitumiti | tasyo me baliṃ kuruteti | tatheti
फिर जब प्राण निकलने को हुआ, तो उसने इन सब इन्द्रियों को उनके स्थान से उखाड़ दिया, जैसे सिन्धु देश का बड़ा बलवान घोड़ा अपने पैर बाँधने वाले खूँटों को उखाड़ फेंकता है। वे बोले, 'भगवन्, मत निकलिए, आपके बिना हम जी नहीं सकते।' प्राण ने कहा, 'तो मुझे भेंट दो।' वे बोले, 'ऐसा ही हो।'
वाणी ने कहा, 'जो वसिष्ठता मेरी है, वह तुम्हारी ही है।' नेत्र बोला, 'जो प्रतिष्ठा मेरी है, वह तुम्हारी है।' श्रोत्र ने सम्पत्, मन ने आयतन और वीर्य ने प्रजाति प्राण को अर्पित की। प्राण ने पूछा, 'तो मेरा अन्न क्या है, मेरा वस्त्र क्या है?' उन्होंने कहा, 'कुत्तों, कृमियों और कीट-पतंगों तक जो कुछ है, वह तुम्हारा अन्न है; जल तुम्हारा वस्त्र है।' जो प्राण के इस अन्न को जानता है, उसके लिए कुछ भी अभक्ष्य नहीं रहता। इसीलिए विद्वान श्रोत्रिय भोजन से पहले और बाद आचमन करते हैं, मानो प्राण को वस्त्र पहना रहे हों।
आरुणि के पुत्र श्वेतकेतु पांचालों की सभा में आए। वे सेवकों से घिरे प्रवाहण जैवलि के पास पहुँचे। उन्हें देखकर राजा ने पुकारा, 'कुमार!' उन्होंने उत्तर दिया, 'जी!' राजा ने पूछा, 'क्या तुम्हारे पिता ने तुम्हें शिक्षा दी है?' उन्होंने कहा, 'हाँ।'
'क्या तुम जानते हो कि मरकर प्राणी किस प्रकार अलग-अलग मार्गों पर जाते हैं?' 'नहीं।' 'क्या जानते हो कि वे इस लोक में फिर कैसे लौटते हैं?' 'नहीं।' 'क्या जानते हो कि इतने लोग बार-बार जाते हैं, फिर भी वह लोक भरता क्यों नहीं?' 'नहीं।' 'क्या जानते हो कि किस आहुति के बाद जल पुरुष की वाणी पाकर उठता और बोलता है?' 'नहीं।' 'क्या देवयान और पितृयान मार्ग का आरम्भ जानते हो? ऋषि का वचन है, मैंने मनुष्यों के दो मार्ग सुने हैं, पितरों का और देवों का; पिता और माता के बीच जो कुछ चलता है, सब इन्हीं से जाता है।' उन्होंने कहा, 'मैं इनमें से एक भी नहीं जानता।'
athainaṃ vasatyopamantrayāṃ cakre | anādṛtya vasatiṃ kumāraḥ pradudrāva | sa ājagāma pitaram | taṃ hovāca iti vāva kila no bhavān purānuśiṣṭānavoca iti | kathaṃ sumedha iti | pañca mā praśnān rājanyabandhuraprākṣīt | tato naikaṃ cana vedeti | katame ta iti | ima iti ha pratīkānyudājahāra
तब राजा ने उन्हें ठहरने का निमन्त्रण दिया। पर उसे अनसुना कर कुमार दौड़कर पिता के पास आए और बोले, 'आपने तो कहा था कि मुझे पूरी शिक्षा मिल चुकी है!' पिता ने पूछा, 'कैसे, बुद्धिमान पुत्र?' 'एक क्षत्रिय बन्धु ने मुझसे पाँच प्रश्न पूछे, और मैं एक का भी उत्तर नहीं जानता था।' 'वे कौन से हैं?' तब उन्होंने प्रश्नों के आरम्भिक शब्द सुनाए।
sa hovāca tathā nastvaṃ tata jānīthā yathā yadahaṃ kiṃca veda sarvamahaṃ tattubhamavocam | prehi tu tatra | pratītya brahmacaryaṃ vatsyāva iti | bhavāneva gacchatviti | sa ājagāma gautamo yatra pravāhaṇasya jaivalerāsa | tasmā āsanamāhṛtyodakamāhārayāṃ cakāra | atha hāsmā arghyaṃ cakāra | taṃ hovāca varaṃ bhagavate gautamāya dadma iti
पिता ने कहा, 'वत्स, तुम मुझे जानते हो, जो कुछ मैं जानता था, वह सब मैंने तुम्हें बता दिया। चलो, वहाँ चलकर ब्रह्मचारी बनकर रहें।' पुत्र बोला, 'आप ही जाइए।' तब गौतम वहाँ आए जहाँ प्रवाहण जैवलि थे। राजा ने उन्हें आसन दिलवाया, जल मँगवाया और अर्घ्य दिया। फिर कहा, 'हम पूज्य गौतम को वर देते हैं।'
स होवाच विज्ञायते हास्तिहिरण्यस्यापात्तं गोअश्वानां दासीनां प्रवाराणां परिधानस्य । मा नो भवान् बहोरनन्तस्यापर्यन्तस्याभ्यवदान्यो भूदिति । स वै गौतम तीर्थेनेच्छसा इति । उपैम्यहं भवन्तमिति । वाचा ह स्मैव पूर्व उपयन्ति । स होपायनकीर्त्योवास
sa hovāca vijñāyate hāstihiraṇyasyāpāttaṃ goaśvānāṃ dāsīnāṃ pravārāṇāṃ paridhānasya | mā no bhavān bahoranantasyāparyantasyābhyavadānyo bhūditi | sa vai gautama tīrthenecchasā iti | upaimyahaṃ bhavantamiti | vācā ha smaiva pūrva upayanti | sa hopāyanakīrtyovāsa
गौतम बोले, 'सब जानते हैं कि मेरे पास सोना, गाएँ, घोड़े, दासियाँ, सेवक और वस्त्र प्रचुर हैं। जो महान, अनन्त और असीम है, उसमें आप मेरे प्रति कृपण न हों।' राजा ने कहा, 'गौतम, तो आप उसे विधिपूर्वक, शिष्य बनकर चाहिए।' गौतम बोले, 'मैं आपके पास शिष्य बनकर आता हूँ।' प्राचीन काल में लोग केवल वाणी से ही गुरु के समीप जाते थे। इस प्रकार शिष्यता की घोषणा करके वे वहाँ रहे।
स होवाच तथा नस्त्वं गौतम मापराधास्तव च पितामहाः । यथेयं विद्येतः पूर्वं न कस्मिंश्चन ब्राह्मन उवास । तां त्वहं तुभ्यं वक्ष्यामि । को हि त्वैवं ब्रुवन्तमर्हति प्रत्याख्यातुमिति
sa hovāca tathā nastvaṃ gautama māparādhāstava ca pitāmahāḥ | yatheyaṃ vidyetaḥ pūrvaṃ na kasmiṃścana brāhmana uvāsa | tāṃ tvahaṃ tubhyaṃ vakṣyāmi | ko hi tvaivaṃ bruvantamarhati pratyākhyātumiti
राजा ने कहा, 'गौतम, जैसे आपके पितामहों ने हमें दोष नहीं दिया, वैसे आप भी न दें। इससे पहले यह विद्या किसी ब्राह्मण के पास नहीं रही। पर मैं इसे आपको बताऊँगा, क्योंकि जो आप जैसा विनय से बोले, उसे कौन मना कर सकता है?'
'गौतम, वह द्युलोक अग्नि है। सूर्य उसकी समिधा है, किरणें धुआँ, दिन ज्वाला, दिशाएँ अंगारे और उपदिशाएँ चिनगारियाँ। इस अग्नि में देवता श्रद्धा की आहुति देते हैं। उस आहुति से राजा सोम, अर्थात् चन्द्रमा, उत्पन्न होता है।'
'गौतम, पर्जन्य, अर्थात् वर्षा का देवता, अग्नि है। संवत्सर उसकी समिधा है, बादल धुआँ, बिजली ज्वाला, वज्र अंगारे और गर्जनाएँ चिनगारियाँ। इस अग्नि में देवता राजा सोम की आहुति देते हैं। उस आहुति से वर्षा होती है।'
'गौतम, यह लोक अग्नि है। पृथ्वी उसकी समिधा है, अग्नि धुआँ, रात्रि ज्वाला, चन्द्रमा अंगारे और नक्षत्र चिनगारियाँ। इस अग्नि में देवता वर्षा की आहुति देते हैं। उस आहुति से अन्न उत्पन्न होता है।'
'गौतम, पुरुष अग्नि है। खुला मुख उसकी समिधा है, प्राण धुआँ, वाणी ज्वाला, नेत्र अंगारे और कान चिनगारियाँ। इस अग्नि में देवता अन्न की आहुति देते हैं। उस आहुति से वीर्य उत्पन्न होता है।'
'गौतम, स्त्री अग्नि है।' दाम्पत्य मिलन में उसके अंगों की तुलना क्रम से यज्ञाग्नि की समिधा, धुएँ, ज्वाला, अंगारों और चिनगारियों से की गई है। 'इस अग्नि में देवता वीर्य की आहुति देते हैं। उस आहुति से पुरुष, अर्थात् मनुष्य, जन्म लेता है। वह जितने दिन जीता है, जीता है, फिर उसकी मृत्यु होती है।'
'फिर उसे अग्नि के पास ले जाते हैं। यहाँ अग्नि ही उसकी अग्नि है, समिधा ही समिधा, धुआँ ही धुआँ, ज्वाला ही ज्वाला, अंगारे ही अंगारे और चिनगारियाँ ही चिनगारियाँ। इस अग्नि में देवता पुरुष की आहुति देते हैं। उस आहुति से पुरुष तेजस्वी वर्ण वाला होकर उत्पन्न होता है।'
te ya evametadvidurye cāmī araṇye śraddhāṃ satyamupāsate te'rcirabhisaṃbhavanti | arciṣo'haḥ | ahna āpūryamāṇapakṣam | āpūryamāṇapakṣādyān ṣaṇmāsānudaṅṅāditya eti | māsebhyo devalokam | devalokādādityam | ādityādvaidyutam | tān vaidyutān puruṣo mānasa etya brahmalokān gamayati | te teṣu brahmalokeṣu parāḥ parāvato vasanti | teṣāṃ na punarāvṛttiḥ
'जो यह जानते हैं, और जो वन में श्रद्धा को सत्य मानकर उपासना करते हैं, वे अर्चि, अर्थात् ज्योति को प्राप्त होते हैं; ज्योति से दिन को, दिन से शुक्ल पक्ष को, शुक्ल पक्ष से उन छह महीनों को जब सूर्य उत्तर की ओर चलता है, महीनों से देवलोक को, देवलोक से सूर्य को और सूर्य से विद्युत् लोक को। वहाँ एक मानस पुरुष आकर उन्हें ब्रह्मलोकों में ले जाता है। वे उन ब्रह्मलोकों में अनन्त काल तक रहते हैं। उनका पुनरागमन नहीं होता।'
atha ye yajñena dānena tapasā lokāñjayanti te dhūmamabhisaṃbhavanti | dhūmādrātrim | rātrerapakṣīyamāṇapakṣam | apakṣīyamāṇapakṣādyān ṣaṇmāsān dakṣiṇāditya eti | māsebhyaḥ pitṛlokam | pitṛlokāccandram | te candraṃ prāpyānnaṃ bhavanti | tāṃstatra devā yathā somaṃ rājānamāpyāyasvāpakṣīyasvetyevamenāṃstatra bhakṣayanti | teṣāṃ yadā tatparyavaityathemamevākāśamabhiniṣpadyante | ākāśādvāyum | vāyorvṛṣṭim | vṛṣṭeḥ pṛthivīm | te pṛthivīṃ prāpyānnaṃ bhavanti | te punaḥ puruṣāgnau hūyante tato yoṣāgnau jāyante | lokān pratyuthāyinasta evamevānuparivartante | atha ya etau panthānau na viduste kīṭāḥ pataṅgā yadidaṃ dandaśūkam
'पर जो यज्ञ, दान और तप से लोकों को जीतते हैं, वे धुएँ को प्राप्त होते हैं; धुएँ से रात्रि को, रात्रि से कृष्ण पक्ष को, उससे उन छह महीनों को जब सूर्य दक्षिण की ओर चलता है, महीनों से पितृलोक को और पितृलोक से चन्द्रमा को। चन्द्रमा पर पहुँचकर वे अन्न बनते हैं, और देवता वहाँ उनका भोग करते हैं जैसे राजा सोम का, कहते हुए, बढ़ो, घटो। जब वह पुण्य चुक जाता है, तब वे आकाश में, आकाश से वायु में, वायु से वर्षा में और वर्षा से पृथ्वी पर आते हैं। पृथ्वी पर वे अन्न बनते हैं, फिर पुरुष-अग्नि में हवन होकर स्त्री-अग्नि से जन्म लेते हैं। लोकों की ओर उठते हुए वे इसी प्रकार घूमते रहते हैं। जो इन दोनों मार्गों को नहीं जानते, वे कीड़े, पतंगे और डँसने वाले जीव बनते हैं।'
जो महानता पाना चाहे, वह उत्तरायण में, शुक्ल पक्ष के किसी पुण्य दिन, बारह दिन उपसद् व्रत रखे। फिर गूलर की लकड़ी के कटोरे या चमस में सब ओषधियाँ और फल इकट्ठे करे, भूमि बुहारकर लीपे, अग्नि स्थापित करे, उसके चारों ओर कुश बिछाए, विधि से घी संस्कारित करे और पुरुषवाची नक्षत्र में मन्थ तैयार करके आहुति दे: 'हे जातवेद, तुममें जो देवता टेढ़े होकर मनुष्य की कामनाओं को नष्ट करते हैं, उन्हें मैं उनका भाग अर्पित करता हूँ; वे तृप्त होकर मुझे सब कामनाओं से तृप्त करें, स्वाहा। जो तुम यह मानकर टेढ़ी पड़ी हो कि मैं ही सबको धारण करने वाली हूँ, उस तुम सिद्धि देने वाली को मैं घी की धारा से पूजता हूँ, स्वाहा।'
'ज्येष्ठाय स्वाहा, श्रेष्ठाय स्वाहा' कहकर अग्नि में आहुति देता है और बचा हुआ घी मन्थ में डालता है। इसी प्रकार 'प्राणाय स्वाहा, वसिष्ठायै स्वाहा', 'वाचे स्वाहा, प्रतिष्ठायै स्वाहा', 'चक्षुषे स्वाहा, सम्पदे स्वाहा', 'श्रोत्राय स्वाहा, आयतनाय स्वाहा', 'मनसे स्वाहा, प्रजात्यै स्वाहा' और 'रेतसे स्वाहा' कहकर आहुति देता है और हर बार शेष मन्थ में डालता है।
वह इन मन्त्रों से अग्नि में आहुति देता है और हर बार शेष मन्थ में डालता है: 'अग्नये स्वाहा', 'सोमाय स्वाहा', 'भूः स्वाहा', 'भुवः स्वाहा', 'स्वः स्वाहा', 'भूर्भुवः स्वः स्वाहा', 'ब्रह्मणे स्वाहा', अर्थात् ब्राह्मण-शक्ति को, 'क्षत्राय स्वाहा', अर्थात् क्षात्र-शक्ति को, 'भूताय स्वाहा', 'भविष्यते स्वाहा', 'विश्वाय स्वाहा', 'सर्वाय स्वाहा' और 'प्रजापतये स्वाहा'।
फिर वह मन्थ को छूकर कहता है: 'तुम गतिमान हो, तुम प्रज्वलित हो, तुम पूर्ण हो, तुम अचल हो, तुम सबके एक सभा-स्थान हो। तुम गाया गया और गाया जा रहा हिंकार हो, तुम गाया गया और गाया जा रहा उद्गीथ हो। तुम सुनाया गया और प्रत्युत्तर में सुनाया गया हो। तुम आर्द्र मेघ में चमकने वाले हो। तुम व्यापक हो, तुम समर्थ हो। तुम अन्न हो, तुम ज्योति हो। तुम निधन, अर्थात् अन्त हो, तुम संवर्ग, अर्थात् सबको अपने में समेटने वाले हो।'
फिर वह सावित्री मन्त्र को मधुमती ऋचाओं के साथ जोड़कर मन्थ का आचमन करता है: 'सविता के उस वरणीय तेज का; सत्यनिष्ठ के लिए वायु मधु बहाएँ, नदियाँ मधु बहाएँ, ओषधियाँ हमारे लिए मधुर हों, भूः स्वाहा। देव के भर्ग का हम ध्यान करते हैं; रात और उषाएँ मधुर हों, पृथ्वी की धूल मधुर हो, पिता द्युलोक मधुर हो, भुवः स्वाहा। जो हमारी बुद्धि को प्रेरित करे; वनस्पति मधुर हो, सूर्य मधुर हो, गौएँ मधुर हों, स्वः स्वाहा।' फिर पूरी सावित्री और सब मधुमती ऋचाएँ कहकर, 'मैं ही यह सब हो जाऊँ, भूर्भुवः स्वः स्वाहा' कहकर अन्तिम आचमन करता है, हाथ धोकर अग्नि के पीछे पूर्व की ओर सिर करके लेटता है। प्रातः सूर्य की उपासना करता है: 'तुम दिशाओं के एकमात्र कमल हो, मैं मनुष्यों में एकमात्र कमल बनूँ।' फिर लौटकर अग्नि के पीछे बैठकर गुरु-वंश का जप करता है।
taṃ haitamuddālaka āruṇirvājasaneyāya yājñavalkyāyāntevāsina uktvovāca api ya enaṃ śuṣke sthāṇau niṣiñcejjāyerañchākhāḥ praroheyuḥ palāśānīti
उद्दालक आरुणि ने यह विद्या अपने शिष्य वाजसनेय याज्ञवल्क्य को बताकर कहा: 'यदि कोई इसे सूखे ठूँठ पर भी छिड़क दे, तो उसमें शाखाएँ निकल आएँ और पत्ते फूट पड़ें।'
etamu haiva vājasaneyo yājnavalkyo madhukāya paiṅgyāyāntevāsina uktvovāca api ya enaṃ śuṣke sthāṇau niṣiñcejjāyerañchākhāḥ praroheyuḥ palāśānīti
वाजसनेय याज्ञवल्क्य ने यह विद्या अपने शिष्य मधुक पैंग्य को बताकर कहा: 'यदि कोई इसे सूखे ठूँठ पर भी छिड़क दे, तो उसमें शाखाएँ निकल आएँ और पत्ते फूट पड़ें।'
सत्यकाम जाबाल ने यह विद्या अपने शिष्यों को बताकर कहा: 'यदि कोई इसे सूखे ठूँठ पर भी छिड़क दे, तो उसमें शाखाएँ निकल आएँ और पत्ते फूट पड़ें।' इसे अपने पुत्र या शिष्य के अतिरिक्त किसी को नहीं बताना चाहिए।
चार वस्तुएँ गूलर की होती हैं: स्रुवा, चमस, समिधा और दो मन्थन-दण्ड। दस ग्राम्य धान्य होते हैं: धान और जौ, तिल और उड़द, अणु और प्रियंगु, गेहूँ, मसूर, खल्व और खलकुल। इन्हें पीसकर दही, मधु और घी में भिगोया जाता है, और घी की आहुति दी जाती है।
स ह प्रजापतिरीक्षां चक्रे हन्तास्मै प्रतिष्ठां कल्पयानीति स स्त्रियं ससृजे । तां सृष्ट्वाध उपास्त । तस्मात्स्त्रियमध उपासीत । स एतं प्राञ्चं ग्रावाणमात्मन एव समुदपारयत् । तेनैनामभ्यसृजत
sa ha prajāpatirīkṣāṃ cakre hantāsmai pratiṣṭhāṃ kalpayānīti sa striyaṃ sasṛje | tāṃ sṛṣṭvādha upāsta | tasmātstriyamadha upāsīta | sa etaṃ prāñcaṃ grāvāṇamātmana eva samudapārayat | tenaināmabhyasṛjata
प्रजापति ने विचार किया, 'इस वीर्य के लिए एक प्रतिष्ठा, अर्थात् आधार, रचूँ।' तब उन्होंने स्त्री की सृष्टि की। उसे रचकर उन्होंने उसका आदर किया; इसलिए पुरुष को अपनी पत्नी का आदर करना चाहिए। प्रजापति ने अपने ही भीतर से सृजन की शक्ति प्रकट की और उसके द्वारा उससे संयुक्त हुए।
tasyā vedirupasthaḥ | lomāni barhiś | carmādhiṣavaṇe | samiddho madhyatastau muṣkau | sa yāvān ha vai vājapeyena yajamanasya loko bhavati tāvānasya loko bhavati | ya evaṃ vidvānadhopahāsaṃ caratyāsāṃ strīṇāṃ sukṛtaṃ vṛṅkte | atha ya idamavidvānadhopahāsaṃ caratyāsya striyaḥ sukṛtaṃ vṛñjate
दाम्पत्य मिलन की तुलना अंग-अंग करके सोमयज्ञ की वेदी, कुश, अभिषवण-चर्म और प्रज्वलित अग्नि से की गई है। वाजपेय यज्ञ करने वाले को जो लोक मिलता है, वही लोक उसे मिलता है जो यह जानकर इसी भाव से पत्नी के समीप जाता है; उसका गृहस्थ जीवन पुण्य देने वाला होता है। पर जो यह ज्ञान न रखकर ऐसा करता है, उसका पुण्य नष्ट होता है।
etaddha sma vai tadvidvānuddālaka āruṇirāha | etaddha sma vai tadvidvānnāko maudgalya āha | etaddha sma vai tadvidvān kumārahārita āha bahavo maryā brāhmanāyanā nirindriyā visukṛto'smāllokātprayanti ya idamavidvāṃso'dhopahāsaṃ carantīti | bahu vā idaṃ suptasya vā jāgrato vā retaḥ skandati
यह जानकर उद्दालक आरुणि ने कहा, नाक मौद्गल्य ने कहा और कुमारहारित ने कहा: 'बहुत से मनुष्य, जो केवल नाम के ब्राह्मण हैं, इस ज्ञान के बिना दाम्पत्य जीवन बिताकर बलहीन और पुण्यहीन होकर इस लोक से जाते हैं।' यदि सोते या जागते वीर्य स्खलित हो जाए, तो आगे कहा उपाय करना चाहिए।
वह उसे छूए या इस मन्त्र से अभिमन्त्रित करे: 'आज मेरा जो वीर्य पृथ्वी पर, ओषधियों में या जल में गिरा, उसे मैं वापस लेता हूँ। मुझमें फिर से बल, तेज और सौभाग्य लौटे। अग्नियाँ अपने-अपने स्थान पर फिर स्थित हों।' फिर अनामिका और अंगूठे से लेकर उसे वक्ष के बीच या भौहों के बीच लगाए।
यदि वह जल में अपना प्रतिबिम्ब देखे, तो कहे: 'मुझमें तेज, बल, यश, धन और पुण्य रहें।' जो पत्नी ऋतुकाल पूरा करके मलिन वस्त्र त्याग चुकी हो, वह स्त्रियों में श्री, अर्थात् लक्ष्मी स्वरूप है। उन दिनों के बाद स्नान कर चुकी उस यशस्विनी पत्नी के पास जाकर उससे बात करे।
सा चेदस्मै न दद्यात्काममेनामवक्रिणीयात् । सा चेदस्मै नैव दद्यात्काममेनां यष्ट्या वा पाणिना वोपहत्यातिक्रामेत् । इन्द्रियेन ते यशसा यश आदद इति । अयशा एव भवति
sā cedasmai na dadyātkāmamenāmavakriṇīyāt | sā cedasmai naiva dadyātkāmamenāṃ yaṣṭyā vā pāṇinā vopahatyātikrāmet | indriyena te yaśasā yaśa ādada iti | ayaśā eva bhavati
यदि वह सहमत न हो, तो उपहार देकर उसे प्रसन्न करे। यदि फिर भी सहमत न हो, तो वह दण्ड या हाथ के प्रतीकात्मक स्पर्श के साथ यह कहकर उसे छोड़ दे, 'अपने बल और यश से मैं तुम्हारा यश लेता हूँ।' तब वह यशहीन हो जाती है।
स यामिच्छेत् कामयेत मेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं संधायोपस्थमस्या अभिमृश्य जपेत् अङ्गादङ्गात्संभवसि हृदयादधिजायसे । स त्वमङ्गकषायोऽसि दिग्धविद्धामिव मादयेमाममूं मयीति
sa yāmicchet kāmayeta meti tasyāmarthaṃ niṣṭhāya mukhena mukhaṃ saṃdhāyopasthamasyā abhimṛśya japet aṅgādaṅgātsaṃbhavasi hṛdayādadhijāyase | sa tvamaṅgakaṣāyo'si digdhaviddhāmiva mādayemāmamūṃ mayīti
यदि वह चाहे कि पत्नी उससे प्रेम करे, तो दाम्पत्य की निकटता में वह यह मन्त्र जपे: 'तुम अंग-अंग से उत्पन्न होते हो, हृदय से प्रकट होते हो। तुम अंगों के सार हो। इसे मुझमें वैसे ही अनुरक्त कर दो जैसे अभिमन्त्रित बाण से बिंधा हुआ।'
atha yāmicchenna garbhaṃ dadhīteti tasyāmarthaṃ niṣṭhāya mukhena mukhaṃ saṃdhāyābhiprāṇyāpānyāt | indriyeṇa te retasā reta ādada iti | aretā eva bhavati
यदि वह चाहे कि पत्नी गर्भ धारण न करे, तो मिलन में वह श्वास छोड़कर फिर खींचे और कहे: 'अपने बल और वीर्य से मैं तुमसे वीर्य वापस लेता हूँ।' तब वह गर्भवती नहीं होती।
यदि वह चाहे कि पत्नी गर्भ धारण करे, तो मिलन में वह श्वास खींचकर फिर छोड़े और कहे: 'अपने बल और वीर्य से मैं तुममें वीर्य स्थापित करता हूँ।' तब वह गर्भवती होती है।
atha yasya jāyāyai jāraḥ syāttaṃ ceddviṣyādāmapātre'gnimupasamādhāya pratilomaṃ śarabarhiḥ stīrtvā tasminnetāḥ śarabhṛṣṭīḥ pratilomāḥ sarpiṣāktā juhuyāt | mama samiddhe'hauṣīḥ | prāṇāpānau ta ādade'sāviti | mama samiddhe'hauṣīḥ | putrapaśūṃsta ādade'sāviti | mama samiddhe'hauṣīḥ | iṣṭāsukṛte ta ādade'sāviti | mama samiddhe'hauṣīḥ | aśāparākāśau ta ādade'sāviti | sa vā eṣa nirindriyo visukṛto'smāllokādpraiti yamevaṃvidbrāhmaṇaḥ śapati | tasmādevaṃvitśrotriyasya dāreṇa nopahāsamicchet | uta hyevaṃvitparo bhavati
यदि किसी की पत्नी का कोई जार हो और पति उसका अनिष्ट चाहे, तो कच्चे पात्र में अग्नि रखकर, सरकण्डे उलटे क्रम में बिछाकर, घी लगे सरकण्डे के बाण उलटे हवन करे और चार बार कहे, 'तुमने मेरी प्रज्वलित अग्नि में हवन किया', फिर उसका नाम लेकर, 'मैं तुम्हारे प्राण और अपान लेता हूँ', 'पुत्र और पशु', 'यज्ञ और पुण्य', 'आशा और प्रतीक्षा लेता हूँ'। ऐसा जानने वाला ब्राह्मण जिसे शाप देता है, वह बलहीन और पुण्यहीन होकर इस लोक से जाता है। इसलिए ऐसे ज्ञानी श्रोत्रिय की पत्नी का अपमान कभी न चाहे, क्योंकि वह भारी शत्रु बन जाता है।
अथ यस्य जायामार्तवं विन्देत्त्र्यहं कंसे न पिबेत् । अहतवासाः । नैनां वृषलो न वृषल्यपहन्यात् । त्रिरात्रान्त आप्लुत्य व्रीहीनवघातयेत्
atha yasya jāyāmārtavaṃ vindettryahaṃ kaṃse na pibet | ahatavāsāḥ | naināṃ vṛṣalo na vṛṣalyapahanyāt | trirātrānta āplutya vrīhīnavaghātayet
जब पत्नी रजस्वला हो, तो तीन दिन वह काँसे के पात्र में न पिए और नया वस्त्र पहने। कोई आचारहीन पुरुष या स्त्री उसे न छुए। तीन रातें बीतने पर वह स्नान करे और फिर उससे धान कुटवाया जाए।
स य इच्छेत् पुत्रो मे शुक्लो जायेत वेदमनुब्रुवीत सर्वमायुरियादिति क्षीरौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयाताम् । ईश्वरौ जनयितवै
sa ya icchet putro me śuklo jāyeta vedamanubruvīta sarvamāyuriyāditi kṣīraudanaṃ pācayitvā sarpiṣmantamaśnīyātām | īśvarau janayitavai
यदि कोई चाहे कि 'मेरा पुत्र गौर वर्ण का हो, एक वेद का अध्ययन करे और पूरी आयु जिए', तो पति-पत्नी दूध में भात पकवाकर, उसमें घी मिलाकर खाएँ। तब वे ऐसे पुत्र को जन्म देने में समर्थ होते हैं।
atha ya icchet putro me kapilaḥ piṅgalo jāyeta dvau vedāvanubruvīta sarvamāyuriyāditi dadhyodanaṃ pācayitvā sarpiṣmantamaśnīyātām | īśvarau janayitavai
यदि कोई चाहे कि 'मेरा पुत्र कपिल या पिंगल, अर्थात् भूरे वर्ण का हो, दो वेदों का अध्ययन करे और पूरी आयु जिए', तो पति-पत्नी दही में भात पकवाकर, घी मिलाकर खाएँ। तब वे ऐसे पुत्र को जन्म देने में समर्थ होते हैं।
atha ya icchet putro me śyāmo lohitākṣo jāyeta trīn vedānanubruvīta sarvamāyuriyāditi udaudanaṃ pācayitvā sarpiṣmantamaśnīyātām | īśvarau janayitavai
यदि कोई चाहे कि 'मेरा पुत्र श्याम वर्ण और लाल नेत्रों वाला हो, तीन वेदों का अध्ययन करे और पूरी आयु जिए', तो पति-पत्नी जल में भात पकवाकर, घी मिलाकर खाएँ। तब वे ऐसे पुत्र को जन्म देने में समर्थ होते हैं।
atha ya icched duhitā me paṇḍitā jāyeta sarvamāyuriyāditi tilaudanaṃ pācayitvā sarpiṣmantamaśnīyātām | īśvarau janayitavai
यदि कोई चाहे कि 'मेरी पुत्री पण्डिता, अर्थात् विदुषी हो और पूरी आयु जिए', तो पति-पत्नी तिल के साथ भात पकवाकर, घी मिलाकर खाएँ। तब वे ऐसी पुत्री को जन्म देने में समर्थ होते हैं।
यदि कोई चाहे कि 'मेरा पुत्र पण्डित, प्रसिद्ध, सभाओं में जाने वाला और ऐसी वाणी बोलने वाला हो जिसे लोग सुनना चाहें, सब वेदों का अध्ययन करे और पूरी आयु जिए', तो पति-पत्नी मांस के साथ भात पकवाकर, घी मिलाकर खाएँ। तब वे ऐसे पुत्र को जन्म देने में समर्थ होते हैं। पाठ में उक्ष या ऋषभ का नाम आता है, जिसका अर्थ टीकाकार अलग-अलग करते हैं।
फिर प्रातःकाल के समीप स्थालीपाक की विधि से घी तैयार करके, उसमें से थोड़ा-थोड़ा लेकर आहुति देता है: 'अग्नये स्वाहा, अनुमतये स्वाहा, सत्यप्रसव देव सविता को स्वाहा।' आहुति देकर शेष निकालकर स्वयं खाता है और बचा हुआ पत्नी को देता है। हाथ धोकर जल-पात्र भरता है और उससे उसे तीन बार छिड़ककर कहता है: 'हे विश्वावसु, यहाँ से उठो, किसी अन्य युवती को खोजो। यह पत्नी अपने पति के साथ है।'
फिर वह उसके पास जाकर कहता है: 'मैं अम हूँ, तुम सा हो; तुम सा हो, मैं अम हूँ। मैं साम हूँ, तुम ऋक् हो। मैं द्युलोक हूँ, तुम पृथ्वी हो। आओ, हम साथ मिलकर प्रयत्न करें और साथ वीर्य धारण करें, पुत्र के लिए, सम्पत्ति के लिए।'
'हे द्युलोक और पृथ्वी, अलग हो जाओ' कहकर वह पत्नी से संयुक्त होता है और तीन बार इन वैदिक मन्त्रों से उसे आशीर्वाद देता है: 'विष्णु गर्भाशय को तैयार करें, त्वष्टा रूपों को गढ़ें, प्रजापति सिंचन करें, धाता तुममें गर्भ स्थापित करें। हे सिनीवाली, गर्भ धारण कराओ; हे पृथुष्टुका, गर्भ धारण कराओ। कमल की माला पहने दोनों देव अश्विनीकुमार तुममें गर्भ स्थापित करें।'
'जिन सोने की अरणियों से अश्विनीकुमारों ने अग्नि का मन्थन किया, उसी गर्भ का हम तुम्हारे लिए आवाहन करते हैं, कि दसवें मास में उसका जन्म हो। जैसे पृथ्वी अग्नि को गर्भ में रखती है, जैसे द्युलोक इन्द्र से गर्भवती है, जैसे वायु दिशाओं का गर्भ है, वैसे ही मैं तुममें गर्भ स्थापित करता हूँ,' और वह पत्नी का नाम लेता है।
जब प्रसव का समय हो, तो वह उस पर जल छिड़ककर कहता है: 'जैसे वायु कमल-सरोवर को चारों ओर से हिलाती है, वैसे ही तुम्हारा गर्भ हिले और जरायु के साथ बाहर आए। यह इन्द्र का बनाया बाड़ा है, अर्गला और घेरे सहित; हे इन्द्र, गर्भ को जरायु सहित बाहर निकालो।'
बालक के जन्म होने पर वह अग्नि जलाकर, बालक को गोद में लेकर, काँसे के पात्र में दही और घी मिलाकर उसमें से आहुति देता है: 'अपने इस घर में बढ़ता हुआ मैं सहस्रों का पालन करूँ। इसके वंश में सन्तान और पशुओं सहित लक्ष्मी कभी न टूटे, स्वाहा। मुझमें जो प्राण हैं, उन्हें मैं मन से तुममें अर्पित करता हूँ, स्वाहा। इस कर्म में मुझसे जो अधिक या कम हुआ हो, उसे ज्ञानी स्विष्टकृत् अग्नि हमारे लिए भली प्रकार यजित और भली प्रकार हुत कर दें, स्वाहा।'
फिर बालक के दाहिने कान के पास मुख ले जाकर तीन बार कहता है, 'वाक्, वाक्।' फिर दही, मधु और घी मिलाकर, बिना किसी आवरण के सोने से उसे चटाता है और कहता है: 'मैं तुममें भूः रखता हूँ, भुवः रखता हूँ, स्वः रखता हूँ। भूर्भुवः स्वः, सब कुछ मैं तुममें रखता हूँ।'
फिर वह बालक को माता को सौंपकर उसे स्तनपान कराता है, कहता हुआ: 'हे सरस्वती, तुम्हारा जो स्तन सदा भरा, सुख देने वाला, रत्न धारण करने वाला, धन देने वाला और उदार है, जिससे तुम सब वरणीय वस्तुओं का पोषण करती हो, उसे यहाँ बालक के पीने के लिए दो।'
फिर वह माता को सम्बोधित करता है: 'तुम मित्र और वरुण की पुत्री इला हो। हे वीरा, तुमने वीर को जन्म दिया है। तुम वीरों की माता बनो, जिसने हमें वीर पुत्र वाला बनाया।' ऐसे पुत्र के विषय में कहते हैं: 'तुम पिता से आगे बढ़ गए, पितामह से भी आगे बढ़ गए।' ऐसा जानने वाले ब्राह्मण के घर जन्मा पुत्र श्री, यश और ब्रह्मतेज में परम सीमा तक पहुँचता है।
अब गुरु-वंश। पौतिमाषीपुत्र ने यह विद्या कात्यायनीपुत्र से पाई; कात्यायनीपुत्र ने गौतमीपुत्र से; गौतमीपुत्र ने भारद्वाजीपुत्र से; भारद्वाजीपुत्र ने पाराशरीपुत्र से; पाराशरीपुत्र ने औपस्वस्तीपुत्र से; औपस्वस्तीपुत्र ने पाराशरीपुत्र से; पाराशरीपुत्र ने कात्यायनीपुत्र से; कात्यायनीपुत्र ने कौशिकीपुत्र से; कौशिकीपुत्र ने आलम्बीपुत्र और वैयाघ्रपदीपुत्र से; वैयाघ्रपदीपुत्र ने काण्वीपुत्र और कापीपुत्र से; और कापीपुत्र ने
आत्रेयीपुत्र से पाई; आत्रेयीपुत्र ने गौतमीपुत्र से; फिर क्रम से भारद्वाजीपुत्र, पाराशरीपुत्र, वात्सीपुत्र, पाराशरीपुत्र, दो वार्कारुणीपुत्र, आर्तभागीपुत्र, शौंगीपुत्र, सांकृतीपुत्र, आलम्बायनीपुत्र, आलम्बीपुत्र, जायन्तीपुत्र, माण्डूकायनीपुत्र, माण्डूकीपुत्र, शाण्डिलीपुत्र, राथीतरीपुत्र, भालुकीपुत्र, दोनों क्रौंचिकीपुत्र, वैदभृतीपुत्र, कार्शकेयीपुत्र, प्राचीनयोगीपुत्र, सांजीवीपुत्र, आसुरिवासी प्राश्नीपुत्र, आसुरायण और आसुरि से होकर। आसुरि ने याज्ञवल्क्य से पाई; याज्ञवल्क्य ने उद्दालक से; उद्दालक ने अरुण से; अरुण ने उपवेशि से; फिर कुश्रि, वाजश्रवा, जिह्वावान् बाध्योग, असित वार्षगण, हरित कश्यप, शिल्प कश्यप, कश्यप नैध्रुवि, वाक् देवी, अम्भिणी और आदित्य तक। आदित्य से प्राप्त ये शुक्ल यजुष् वाजसनेय याज्ञवल्क्य द्वारा प्रकट किए गए हैं।
सांजीवीपुत्र तक वंश वही है। सांजीवीपुत्र ने माण्डूकायनि से पाई; माण्डूकायनि ने माण्डव्य से; माण्डव्य ने कौत्स से; कौत्स ने माहित्थि से; माहित्थि ने वामकक्षायण से; वामकक्षायण ने शाण्डिल्य से; शाण्डिल्य ने वात्स्य से; वात्स्य ने कुश्रि से; कुश्रि ने यज्ञवचा राजस्तम्बायन से; यज्ञवचा ने तुर कावषेय से; तुर कावषेय ने प्रजापति से; और प्रजापति ने ब्रह्म से। ब्रह्म स्वयम्भू है। ब्रह्म को नमस्कार।