01पहाड़ी पर तारागढ़
हाड़ा चौहानों की एक शाखा थे जो चम्बल के किनारे की पहाड़ियों में बसे। 1342 में राव देवा ने मीणा सरदारों से बूँदी ली। आगे के वर्षों में ऊपर की पहाड़ी पर "तारों का दुर्ग" तारागढ़ बना, और नीचे का महल तीन सौ वर्षों में चरणों में बना। अठारहवीं शताब्दी में राव उम्मेदसिंह द्वारा जोड़ी गई इसकी चित्रशाला फर्श से छत तक बूँदी शैली में कृष्ण-लीला, रागमाला और दरबार के दृश्यों से चित्रित है।
02सुरजन और रणथम्भौर
1569 में जब अकबर ने रणथम्भौर घेरा, तब राव सुरजन हाड़ा मेवाड़ की ओर से उसे थामे थे। उन्होंने शर्तों पर दुर्ग सौंपा: हाड़ा अपनी पुत्रियाँ मुगल हरम में नहीं भेजेंगे, सिन्धु पार नहीं जाएँगे, और उनके मन्दिर अछूते रहेंगे। इसके बाद हाड़ाओं ने मुगलों की सेवा में बड़ा नाम कमाया। 1631 में राव रतनसिंह के पुत्र माधोसिंह को कोटा अलग राज्य के रूप में मिला। 1658 में बूँदी के राव छत्रसाल औरंगजेब के विरुद्ध दारा शिकोह की ओर से लड़ते हुए सामूगढ़ में मारे गए।

03बावड़ियाँ और कोटा शैली
बूँदी बावड़ियों का नगर है; रानी नाथावती द्वारा 1699 में बनवाई गई रानीजी की बावड़ी तराशे तोरणों से होकर लगभग छियालीस मीटर नीचे जाती है। अठारहवीं शताब्दी के अन्त में संरक्षक जालिमसिंह के समय कोटा चम्बल पर एक मजबूत राज्य बना, और उसके चित्रकार जंगल के शिकार-दृश्यों के लिए प्रसिद्ध हुए। दोनों राज्य 1818 में अंग्रेजी सन्धियों में बँधे और 1948–49 में राजस्थान संघ में मिले।
शासक
- 1राव देवाबूँदी लीc. 1342–1343
- 2राव बरसिंहतारागढ़ दुर्ग बनाc. 1354–1413
- 3राव सुरजन1569 में शर्तों पर रणथम्भौर सौंपा1554–1585
- 4राव भोज1585–1607
- 5राव रतनसिंह1607–1631
- 6राव छत्रसालसामूगढ़ में मारे गए1631–1658
- 7राव भावसिंह1658–1682
- 8राव बुधसिंह1695–1739
- 9राव उम्मेदसिंहचित्रशाला के भित्तिचित्रc. 1748–1770
- 10बहादुरसिंहबूँदी के अन्तिम शासक1945–1949
उनकी विरासत
- तारागढ़ दुर्ग और चित्रशाला सहित बूँदी महल
- बूँदी की रानीजी की बावड़ी (1699)
- बूँदी और कोटा चित्र-शैलियाँ
- चम्बल किनारे कोटा का गढ़ महल


