
महर्षि वाल्मीकि
त्रेता युग, श्रीराम के समकालीन (परंपरागत) · गंगा के निकट तमसा तट पर आश्रम · संस्कृत
महर्षि वाल्मीकिवाल्मीकि आदिकवि हैं, पहले कवि। रामायण इस प्रश्न से आरम्भ होती है जो वे देवर्षि नारद से पूछते हैं: क्या संसार में ऐसा कोई पुरुष है जो सत्यवादी, धर्म में दृढ़, कृतज्ञ और क्रोध को जीतने वाला हो? नारद उत्तर में श्रीराम का चरित सुनाते हैं। कुछ समय बाद तमसा में स्नान करते हुए वाल्मीकि ने एक व्याध को क्रौंच पक्षियों के जोड़े में से एक को मारते देखा। शोक शाप बनकर फूटा, और शाप छन्द में निकला: मा निषाद प्रतिष्ठां त्वम्। ब्रह्मा जी आश्रम में आए और बोले कि शोक से जन्मा यह श्लोक ही राम की पूरी कथा का वाहन बनेगा।
उनकी रची रामायण में सात काण्डों में लगभग चौबीस हज़ार श्लोक हैं। अध्यात्म रामायण और स्कन्द पुराण की एक कथा कहती है कि ऋषि बनने से पहले वे रत्नाकर नाम के वनवासी लुटेरे थे, जिन्हें सप्तर्षियों ने राम-नाम जपने को कहा; वे इतने समय ध्यान में बैठे रहे कि उन पर दीमकों की बाँबी (वल्मीक) बन गई, और उसी से उनका नाम पड़ा।
वनवास के वर्षों में सीता जी उन्हीं के आश्रम में रहीं, और वहीं लव-कुश का जन्म हुआ। वाल्मीकि ने दोनों बालकों को रामायण सिखाई और उन्होंने राम के अश्वमेध में उसे गाया। युद्धकाण्ड में वाल्मीकि बताते हैं कि जब राम थके और चिन्तित होकर रावण के सामने खड़े थे, तब महर्षि अगस्त्य रणभूमि में आए और उन्हें आदित्यहृदय का उपदेश दिया, सूर्य की वह स्तुति जो तब से प्रभात में पढ़ी जाती है।
रचनाएँ
- श्रीमद्वाल्मीकि रामायण (सात काण्ड)
- आदित्यहृदयम्, युद्धकाण्ड के अन्तर्गत