श्री वल्लभाचार्य

श्री वल्लभाचार्य

1479–1531 ई. · चम्पारण्य (छत्तीसगढ़) में तेलुगु परिवार में जन्म; गोकुल, गोवर्धन, काशी · संस्कृत, ब्रज

वल्लभाचार्य

वल्लभ का जन्म 1479 में रायपुर के निकट चम्पारण्य में हुआ, जब उनके माता-पिता, लक्ष्मण भट्ट और इल्लम्मा, काशी से लौटते हुए मार्ग में थे। यह गोदावरी अंचल का वैदिक विद्वानों का तेलुगु परिवार था। बचपन में ही उन्होंने काशी में अध्ययन किया और कम आयु में शास्त्रों पर उनके अधिकार की चर्चा होने लगी। सम्प्रदाय बताता है कि विजयनगर के राजदरबार में उन्होंने एक बड़ा शास्त्रार्थ जीता और वहाँ आचार्य के रूप में सम्मानित हुए।

उनका सिद्धान्त शुद्धाद्वैत है: जगत स्वयं ब्रह्म है और सत्य है, ब्रह्म पर आरोपित भ्रम नहीं, और श्रीकृष्ण ही परब्रह्म हैं। उन तक पहुँचने का मार्ग पुष्टि है, उनकी कृपा, जो प्रयास से कमाई नहीं जाती, प्रेमपूर्ण सेवा में मिलती है। इसीलिए यह पुष्टिमार्ग कहलाता है।

परंपरा कहती है कि 1494 में श्रावण शुक्ल एकादशी की रात गोकुल में श्रीकृष्ण ने वल्लभ को दर्शन दिए और ब्रह्मसम्बन्ध मन्त्र दिया, जिससे भक्त अपना सब कुछ प्रभु को समर्पित करता है। गोवर्धन पर उन्होंने श्रीनाथजी का स्वरूप प्रकट किया और उनकी सेवा आरम्भ की, जो आज नाथद्वारा में होती है। उन्होंने तीन बार भारत की परिक्रमा की, और जिन स्थानों पर उन्होंने भागवत की कथा कही, वे उनकी चौरासी बैठकें कहलाती हैं।

उन्होंने ब्रह्मसूत्र पर अणुभाष्य, भागवत पर सुबोधिनी और सोलह छोटे ग्रन्थ, षोडश ग्रन्थ, लिखे। मधुराष्टकम्, जिसमें मथुरापति का सब कुछ मधुर है, उन्हीं के नाम से गाया जाता है। 1531 में उन्होंने काशी में गंगा में जल-समाधि ली। उनके पुत्र विट्ठलनाथ ने अष्टछाप के कवियों को एकत्र किया, जिनमें सूरदास थे।

रचनाएँ

  • ब्रह्मसूत्र पर अणुभाष्य
  • श्रीमद्भागवत पर सुबोधिनी
  • षोडश ग्रन्थ
  • मधुराष्टकम्