माणिक्कवाचकर

माणिक्कवाचकर

अनेक इतिहासकारों के अनुसार लगभग 9वीं शताब्दी ई.; शैव परंपरा इससे पहले मानती है · तिरुवादवूर, मदुरै, तिरुप्पेरुन्तुऱै और चिदम्बरम् · तमिल

माणिक्कवाचकर

मदुरै के निकट तिरुवादवूर के वादवूरर पाण्ड्य राजा के प्रधान मन्त्री थे। राजा ने उन्हें अश्वसेना के लिए घोड़े खरीदने को बहुत-सा सोना देकर समुद्र तट की ओर भेजा। मार्ग में तिरुप्पेरुन्तुऱै में उन्होंने शिव के नामों का जप सुना, और एक कुरुन्द वृक्ष के नीचे शिष्यों के बीच बैठे एक गुरु को पाया। गुरु की एक दृष्टि से वादवूरर का जीवन पलट गया। उन्होंने राजा का सोना वहाँ के मन्दिर पर लगा दिया, जो आज आवुडैयार्कोयिल कहलाता है, और वहीं रह गए।

राजा ने उन्हें पकड़वाया और धूप में यातनाएँ दीं। तब शिव की वे लीलाएँ आरम्भ हुईं जिन्हें तिरुविळैयाडल् पुराणम् सुनाता है। शिव ने वन के सियारों को घोड़े बना दिया और स्वयं घोड़ों के व्यापारी बनकर आए; उसी रात घोड़े फिर सियार बन गए और राजा की घुड़साल में हुआँ-हुआँ करने लगे। वैगै में बाढ़ आई और हर घर को बाँध पर एक आदमी भेजना था। वन्दि नाम की एक बूढ़ी माँ के कोई नहीं था, और शिव मज़दूर बनकर उसकी जगह काम करने आए, उसका पिट्टु खाया और काम करने के बजाय सो गए। राजा ने उन पर बेंत मारी, और वह चोट संसार के हर प्राणी पर पड़ी, राजा पर भी।

राजा ने अपने मन्त्री को मुक्त किया। वादवूरर मन्दिर-मन्दिर गाते हुए अन्त में चिदम्बरम् पहुँचे। उनके पद, तिरुवाचकम्, आठवें तिरुमुऱै में गिने जाते हैं। परंपरा कहती है कि स्वयं नटराज ने उनके गाते-गाते उन्हें लिखा और ताड़पत्रों पर तिरुच्चिऱ्ऱम्बलम् लिखकर हस्ताक्षर किए। तमिल में कहावत है: जिसका हृदय तिरुवाचकम् से नहीं पिघलता, वह किसी वचन से नहीं पिघलेगा।

रचनाएँ

  • तिरुवाचकम् (51 पद), तिरुमुऱै 8
  • तिरुक्कोवैयार्