कृष्णं कलय सखि सुन्दरं बालं
कृष्णं गतविषयतृष्णं जगत्प्रभविष्णुं
सुरारिगणजिष्णुं सदा बालं
नृत्यन्तमिह मुहुरत्यन्तमपरिमित
भृत्यानुकूलमखिलसत्यं सदा बालं
धीरं भवजलधिपारं सकलवेदसारं
समस्तयोगितारं सदा बालं
शृङ्गाररसभरसङ्गीतसाहित्य
गङ्गालहरीखेलसङ्गं सदा बालं
रामेण जगदभिरामेण बलभद्र
रामेण समवाप्तकामेन सह बालं
दामोदरमखिलकामाकरं घन
श्यामाकृतिमसुरभीमं सदा बालं
राधारुणाधरसुधापं सच्चिदानन्द
रूपं जगत्त्रयभूपं सदा बालं
अर्थं शिथिलीकृतानर्थं श्रीनारायण
तीर्थपरमपुरुषार्थं सदा बालं
kṛṣṇaṁ kalaya sakhi sundaraṁ bālaṁ
kṛṣṇaṁ gataviṣayatṛṣṇaṁ jagatprabhaviṣṇuṁ
surārigaṇajiṣṇuṁ sadā bālaṁ
nṛtyantamiha muhuratyantamaparimita
bhṛtyānukūlamakhilasatyaṁ sadā bālaṁ
dhīraṁ bhavajaladhipāraṁ sakalavedasāraṁ
samastayogitāraṁ sadā bālaṁ
śṛṅgārarasabharasaṅgītasāhitya
gaṅgālaharīkhelasaṅgaṁ sadā bālaṁ
rāmeṇa jagadabhirāmeṇa balabhadra
rāmeṇa samavāptakāmena saha bālaṁ
dāmodaramakhilakāmākaraṁ ghana
śyāmākṛtimasurabhīmaṁ sadā bālaṁ
rādhāruṇādharasudhāpaṁ saccidānanda
rūpaṁ jagattrayabhūpaṁ sadā bālaṁ
arthaṁ śithilīkṛtānarthaṁ śrīnārāyaṇa
tīrthaparamapuruṣārthaṁ sadā bālaṁ
अर्थ
पल्लवी: सखी, सुन्दर बालक कृष्ण का ध्यान करो।
1. कृष्ण, जिनकी विषयों की तृष्णा मिट चुकी है, जगत के समर्थ स्वामी, असुर-समूहों के विजेता, सदा बालक।
2. जो यहाँ बार-बार, अनन्त नृत्य करते हैं; सेवकों पर असीम अनुकूल; सम्पूर्ण सत्य; सदा बालक।
3. धीर; भवसागर का पार; सब वेदों का सार; सब योगियों के तारक; सदा बालक।
4. शृंगार-रस से भरे संगीत और साहित्य की गंगा की लहरों में क्रीड़ा करने वाले; सदा बालक।
5. जगत को आनन्द देने वाले, पूर्णकाम बलराम के साथ खेलता बालक।
6. दामोदर, सब कामनाओं की खान, घने मेघ-से श्याम, असुरों के लिए भयंकर, सदा बालक।
7. राधा के अरुण अधरों का अमृत पीने वाले; सच्चिदानन्द-स्वरूप; तीनों लोकों के राजा; सदा बालक।
8. सच्चा धन, सब अनर्थों को शिथिल करने वाले; श्री नारायण तीर्थ के परम पुरुषार्थ; सदा बालक।
इस भजन के बारे में
नारायण तीर्थ सत्रहवीं सदी के उत्तरार्ध और अठारहवीं के आरम्भ के आन्ध्र के संन्यासी थे, जो तञ्जावूर के पास कावेरी तट पर वराहूर और तिरुपूंतुरुत्ति में बस गए, जहाँ उनकी समाधि है। उनकी कृष्णलीलातरङ्गिणी भागवत के दशम स्कन्ध को संस्कृत गीतों में कहती है, जिन्हें तरंगम्, यानी लहरें, कहा जाता है, और रुक्मिणी-विवाह पर समाप्त होती है। ये तरंगम् दक्षिण भारत के भजन सम्प्रदाय में गाए जाते हैं और भागवत मेला तथा कुचिपुडि में नृत्य के साथ प्रस्तुत होते हैं। इसमें एक गोपी अपनी सखी से बस उस बालक का ध्यान करने को कहती है, और विशेषण कितने भी बड़े हों, हर पद ‘सदा बालं’, सदा बालक, पर लौट आता है।
karnatik.com c1332 (Mukhari, Adi; lyrics by Lakshman Ragde, corrections and word meanings by Rajani Arjun Shankar); Devanagari by the editor; tarangam number not verified