அமரர் இடர்தீர அமரம் புரிந்த
குமரன் அடி நெஞ்சே குறி
துதிப்போர்க்கு வல்வினைபோம் துன்பம் போம் நெஞ்சிற்
பதிப்போர்க்குச் செல்வம் பலித்துக் கதித்தோங்கும்
நிஷ்டையுங் கைகூடும் நிமலர் அருள் கந்தர்
சஷ்டி கவசந் தனை
சஷ்டியை நோக்கச் சரஹணபவனார்
சிஷ்டருக்குதவும் செங்கதிர் வேலோன்
பாதம் இரண்டில் பன்மணிச் சதங்கை
கீதம் பாட கிண்கிணி யாட
மைய நடஞ்செயும் மயில்வாகனனார்
கையில் வேலால் எனைக்காக்கவென்று வந்து
வரவர வேலாயுதனார் வருக
வருக வருக மயிலோன் வருக
இந்திரன் முதலா எண்டிசை போற்ற
மந்திரவடிவேல் வருக வருக
வாசவன் மருகா வருக வருக
நேசக் குறமகள் நினைவோன் வருக
ஆறுமுகம் படைத்த ஐயா வருக
நீறிடும் வேலவன் நித்தம் வருக
சிரகிரி வேலவன் சீக்கிரம் வருக
சரஹணபவனார் சடுதியில் வருக
अमरर् इडर्दीर अमरम् पुरिन्द
कुमरऩ् अडि नॆञ्जे कुऱि
तुदिप्पोर्क्कु वल्विऩैबोम् तुऩ्बम् पोम् नॆञ्जिऱ्
पदिप्पोर्क्कुच् चॆल्वम् पलित्तुक् कदित्तोङ्गुम्
निष्टैयुङ् गैगूडुम् निमलर् अरुळ् कन्दर्
सष्टि कवसन् दऩै
सष्टियै नोक्कच् चरहणबवऩार्
सिष्टरुक्कुदवुम् सॆङ्गदिर् वेलोऩ्
पादम् इरण्डिल् पऩ्मणिच् चदङ्गै
कीदम् पाड किण्गिणि याड
मैय नडञ्जॆयुम् मयिल्वाहऩऩार्
कैयिल् वेलाल् ऎऩैक्काक्कवॆऩ्ऱु वन्दु
वरवर वेलायुदऩार् वरुग
वरुग वरुग मयिलोऩ् वरुग
इन्दिरऩ् मुदला ऎण्डिसै पोऱ्ऱ
मन्दिरवडिवेल् वरुग वरुग
वासवऩ् मरुगा वरुग वरुग
नेसक् कुऱमगळ् निऩैवोऩ् वरुग
आऱुमुगम् पडैत्त ऐया वरुग
नीऱिडुम् वेलवऩ् नित्तम् वरुग
सिरगिरि वेलवऩ् सीक्किरम् वरुग
सरहणबवऩार् सडुदियिल् वरुग
amarar iḍardīra amaram purinda
kumaraṉ aḍi neñjē kuṟi
tudippōrkku valviṉaibōm tuṉbam pōm neñjiṟ
padippōrkkuc celvam palittuk kadittōṅgum
niṣṭaiyuṅ gaigūḍum nimalar aruḷ kandar
saṣṭi kavasan daṉai
saṣṭiyai nōkkac carahaṇabavaṉār
siṣṭarukkudavum seṅgadir vēlōṉ
pādam iraṇḍil paṉmaṇic cadaṅgai
kīdam pāḍa kiṇgiṇi yāḍa
maiya naḍañjeyum mayilvāhaṉaṉār
kaiyil vēlāl eṉaikkākkaveṉṟu vandu
varavara vēlāyudaṉār varuga
varuga varuga mayilōṉ varuga
indiraṉ mudalā eṇḍisai pōṟṟa
mandiravaḍivēl varuga varuga
vāsavaṉ marugā varuga varuga
nēsak kuṟamagaḷ niṉaivōṉ varuga
āṟumugam paḍaitta aiyā varuga
nīṟiḍum vēlavaṉ nittam varuga
siragiri vēlavaṉ sīkkiram varuga
sarahaṇabavaṉār saḍudiyil varuga
अर्थ
काप्पु (रक्षा-पद): हे हृदय, देवताओं का कष्ट मिटाने के लिए युद्ध करने वाले कुमरन के चरणों में स्थिर हो जा। जो इसकी स्तुति करते हैं, उनके कठिन कर्म और दुःख मिट जाते हैं; जो इसे हृदय में बसाते हैं, उनकी सम्पदा फलती और बढ़ती है, और ध्यान में स्थिरता मिलती है: निर्मल प्रभु की कृपा से यह कन्द षष्टि कवचम्।
1–8. षष्ठी की ओर देखते हुए, सज्जनों की सहायता करने वाले, दमकते लाल वेल के स्वामी सरवणभव आते हैं। उनके दोनों चरणों में अनेक रत्नों के नूपुर गाते हैं, घुँघरू नाचते हैं; मोर पर सवार, बीच में नृत्य करने वाले वे हाथ में वेल लेकर मेरी रक्षा करने आते हैं। आओ, आओ, वेलायुध! आओ, आओ, आओ, मयूर-वाहन!
9–16. इन्द्र और आठों दिशाओं के रक्षक तुम्हारी स्तुति करें, आओ, आओ, मन्त्रमय सुंदर वेल! आओ, आओ, इन्द्र के जामाता! आओ, प्रिय वनकन्या वल्ली को सदा स्मरण करने वाले! आओ, छह मुखों वाले प्रभु! भस्म धारण करने वाले वेलधारी, नित्य आओ! सिरगिरि के वेलधारी, शीघ्र आओ! सरवणभव, तुरन्त आओ!
इस भजन के बारे में
देवराय स्वामिगळ ने छह कवच रचे, मुरुगन के छह पडै-वीडु (धाम) में से हर एक के लिए; तिरुच्चॆन्दूर का यह कवच लगभग हर तमिऴ घर में गाया जाता है। परम्परा इसका पहला पाठ ईरोड के पास चॆन्निमलै के पहाड़ी मन्दिर में मानती है, और ‘सिरगिरि वेलवऩ्’ पंक्ति उसी पहाड़ी का नाम लेती है। यह रक्षा की प्रार्थना है: आरम्भ के बाद कवच वेल से शरीर के हर अंग की, फिर हर संकट का नाम लेकर, रक्षा माँगता है। ऐप्पसि मास में स्कन्द षष्ठी के छह दिन भक्त उपवास रखकर पूरा कवच पढ़ते हैं, बहुत से दिन में कई बार। ये रक्षा-पद और पहली सोलह पंक्तियाँ हैं।
Devaraya Swamigal, Kandar Kavacham 2 (Tiruchendur), kappu and lines 1–16, Project Madurai e-text pm0034_02 (spelling ‘சரஹணபவனார்’ as in that edition)