ഗുരുനാഥൻ തുണചെയ്ക സന്തതം
തിരുനാമങ്ങൾ നാവിന്മേലെപ്പോഴും
പിരിയാതെയിരിക്കണം നമ്മുടെ
നരജന്മം സഫലമാക്കീടുവാൻ!
കൃഷ്ണ! കൃഷ്ണ! മുകുന്ദ! ജനാർദ്ദന!
കൃഷ്ണ! ഗോവിന്ദ! നാരായണാ! ഹരേ!
അച്യുതാനന്ദ! ഗോവിന്ദ! മാധവാ!
സച്ചിദാനന്ദ! നാരായണാ! ഹരേ!
ഇന്നലെയോളമെന്തെന്നറിഞ്ഞീലാ
ഇന്നി നാളെയുമെന്തെന്നറിഞ്ഞീലാ
ഇന്നിക്കണ്ട തടിക്കു വിനാശവു-
മിന്ന നേരമെന്നേതുമറിഞ്ഞീലാ.
കണ്ടുകണ്ടങ്ങിരിക്കും ജനങ്ങളെ-
ക്കണ്ടില്ലെന്നു വരുത്തുന്നതും ഭവാൻ.
രണ്ടു നാലു ദിനംകൊണ്ടൊരുത്തനെ
തണ്ടിലേറ്റി നടത്തുന്നതും ഭവാൻ,
മാളികമുകളേറിയ മന്നന്റെ
തോളിൽ മാറാപ്പു കേറ്റുന്നതും ഭവാൻ.
കാലമിന്നു കലിയുഗമല്ലയോ?
ഭാരതമിപ്രദേശവുമല്ലയോ?
നമ്മളെല്ലാം നരന്മാരുമല്ലയോ?
ചെമ്മെ നന്നായ് നിരൂപിപ്പിനെല്ലാരും.
ഹരിനാമങ്ങളില്ലാതെ പോകയോ?
നരകങ്ങളിൽ പേടി കുറകയോ?
നാവുകൂടാതെ ജന്മമതാകയോ?
നമുക്കിന്നി വിനാശമില്ലായ്കയോ?
കഷ്ടം! കഷ്ടം! നിരൂപണം കൂടാതെ
ചുട്ടു തിന്നുന്നു ജന്മം പഴുതെ നാം!
കൂടിയല്ല പിറക്കുന്ന നേരത്തും
കൂടിയല്ല മരിക്കുന്ന നേരത്തും
മദ്ധ്യേയിങ്ങനെ കാണുന്നനേരത്തു
മത്സരിക്കുന്നതെന്തിനു നാം വൃഥാ?
गुरुनाथन् तुणचॆय्क सन्ततं
तिरुनामङ्ङळ् नाविन्मेलॆप्पोऴुं
पिरियातॆयिरिक्कणं नम्मुटॆ
नरजन्मं सफलमाक्कीटुवान्!
कृष्ण! कृष्ण! मुकुन्द! जनार्द्दन!
कृष्ण! गोविन्द! नारायणा! हरे!
अच्युतानन्द! गोविन्द! माधवा!
सच्चिदानन्द! नारायणा! हरे!
इन्नलॆयोळमॆन्तॆन्नऱिञ्ञीला
इन्नि नाळॆयुमॆन्तॆन्नऱिञ्ञीला
इन्निक्कण्ट तटिक्कु विनाशवु-
मिन्न नेरमॆन्नेतुमऱिञ्ञीला.
कण्टुकण्टङ्ङिरिक्कुं जनङ्ङळॆ-
क्कण्टिल्लॆन्नु वरुत्तुन्नतुं भवान्.
रण्टु नालु दिनंकॊण्टॊरुत्तनॆ
तण्टिलेऱ्ऱि नटत्तुन्नतुं भवान्,
माळिकमुकळेऱिय मन्नन्ऱॆ
तोळिल् माऱाप्पु केऱ्ऱुन्नतुं भवान्.
कालमिन्नु कलियुगमल्लयो?
भारतमिप्रदेशवुमल्लयो?
नम्मळॆल्लां नरन्मारुमल्लयो?
चॆम्मॆ नन्नाय् निरूपिप्पिनॆल्लारुं.
हरिनामङ्ङळिल्लातॆ पोकयो?
नरकङ्ङळिल् पेटि कुऱकयो?
नावुकूटातॆ जन्ममताकयो?
नमुक्किन्नि विनाशमिल्लाय्कयो?
कष्टं! कष्टं! निरूपणं कूटातॆ
चुट्टु तिन्नुन्नु जन्मं पऴुतॆ नां!
कूटियल्ल पिऱक्कुन्न नेरत्तुं
कूटियल्ल मरिक्कुन्न नेरत्तुं
मद्ध्येयिङ्ङनॆ काणुन्ननेरत्तु
मत्सरिक्कुन्नतॆन्तिनु नां वृथा?
gurunāthan tuṇaceyka santataṁ
tirunāmaṅṅaḷ nāvinmēleppōḻuṁ
piriyāteyirikkaṇaṁ nammuṭe
narajanmaṁ saphalamākkīṭuvān!
kṛṣṇa! kṛṣṇa! mukunda! janārddana!
kṛṣṇa! gōvinda! nārāyaṇā! harē!
acyutānanda! gōvinda! mādhavā!
saccidānanda! nārāyaṇā! harē!
innaleyōḷamentennaṟiññīlā
inni nāḷeyumentennaṟiññīlā
innikkaṇṭa taṭikku vināśavu-
minna nēramennētumaṟiññīlā.
kaṇṭukaṇṭaṅṅirikkuṁ janaṅṅaḷe-
kkaṇṭillennu varuttunnatuṁ bhavān.
raṇṭu nālu dinaṅkoṇṭoruttane
taṇṭilēṟṟi naṭattunnatuṁ bhavān,
māḷikamukaḷēṟiya mannanṟe
tōḷil māṟāppu kēṟṟunnatuṁ bhavān.
kālaminnu kaliyugamallayō?
bhāratamipradēśavumallayō?
nammaḷellāṁ naranmārumallayō?
cemme nannāy nirūpippinellāruṁ.
harināmaṅṅaḷillāte pōkayō?
narakaṅṅaḷil pēṭi kuṟakayō?
nāvukūṭāte janmamatākayō?
namukkinni vināśamillāykayō?
kaṣṭaṁ! kaṣṭaṁ! nirūpaṇaṁ kūṭāte
cuṭṭu tinnunnu janmaṁ paḻute nāṁ!
kūṭiyalla piṟakkunna nērattuṁ
kūṭiyalla marikkunna nērattuṁ
maddhyēyiṅṅane kāṇunnanērattu
matsarikkunnatentinu nāṁ vṛthā?
अर्थ
आरंभ: गुरुनाथ सदा सहायता करें। पवित्र नाम हर पल जीभ पर रहें, कभी न छूटें, ताकि यह मनुष्य जन्म सफल हो।
मंगलाचरण: कृष्ण! कृष्ण! मुकुंद! जनार्दन! कृष्ण! गोविंद! नारायण! हरि! अच्युत! आनंद! गोविंद! माधव! सच्चिदानंद! नारायण! हरि!
काललीला (काल का खेल): कल तक हम नहीं जानते थे कि क्या होगा; कल क्या होगा, यह भी नहीं जानते; और आज दिखती यह देह किस घड़ी नष्ट होगी, यह भी नहीं जानते। जिन लोगों को हम रोज़ देखते हैं, उन्हें अचानक दिखना बंद करा देने वाले तुम ही हो। दो-चार दिन में किसी को पालकी पर चढ़ा देने वाले तुम ही हो; महल पर चढ़े राजा के कंधे पर भिखारी की गठरी लाद देने वाले भी तुम ही हो।
कमी किस बात की? क्या यह कलियुग नहीं है? क्या यह भूमि भारत नहीं है? क्या हम सब मनुष्य नहीं हैं? सब लोग भली-भाँति विचार करो। क्या हरि के नाम खो गए हैं? क्या नरक का भय कम हो गया है? क्या हम बिना जीभ के जन्मे हैं? क्या हमारे लिए मृत्यु नहीं है? हाय, हाय! बिना विचार किए हम यह जन्म व्यर्थ भूनकर खा रहे हैं।
जन्म के समय हम साथ नहीं आते; मृत्यु के समय साथ नहीं जाते; बीच में, जब यहाँ एक-दूसरे को देखते हैं, तब व्यर्थ ही क्यों झगड़ते हैं?
इस भजन के बारे में
पेरिंतलमण्णा के पास कीऴाट्टूर के पूंतानम नंबूदिरी ने ज्ञानप्पाना, ‘ज्ञान का गीत’, सरल मलयालम में लिखा ताकि हर कोई समझ सके। केरल की परंपरा कहती है कि यह शोक के बाद आया: उनका इकलौता पुत्र शैशव में ही चल बसा, और उन्होंने गुरुवायूरप्पन, उण्णिकृष्णन, को अपने हृदय की संतान मान लिया। यह काव्य सहज पान छंद में है। ये पाँच अंश इसके सबसे अधिक उद्धृत अंश हैं: वंदना, नामों का जप, ‘काल का खेल’ जो राजा को भिखारी बना देता है, यह स्मरण कि हम कलियुग में भारत में जीभ लेकर जन्मे हैं ताकि हरि का नाम ले सकें, और यह सीधा प्रश्न कि जो अकेले आते-जाते हैं, वे झगड़ते क्यों हैं।
Malayalam Wikisource, ‘ജ്ഞാനപ്പാന’ (Poonthanam Namboodiri): opening lines, Mangalacharanam, Kalaleela, from ‘Enthinte kuravu’ (lines 1–10) and the passage after Manushyajanmam durlabham beginning ‘koodiyalla pirakkunna nerathum’ (4 lines); footnote markers removed