विष्णु

प्रलयपयोधिजले (दशावतार स्तोत्र, गीतगोविन्द अष्टपदी 1)

जयदेव गोस्वामीजयदेव गोस्वामी12वीं शताब्दी ई.

प्रलयपयोधिजले धृतवानसि वेदम् ।
विहितवहित्रचरित्रमखेदम् ॥
केशव धृतमीनशरीर जय जगदीश हरे ॥१॥

क्षितिरतिविपुलतरे तव तिष्ठति पृष्ठे ।
धरणिधरणकिणचक्रगरिष्ठे ॥
केशव धृतकच्छपरूप जय जगदीश हरे ॥२॥

वसति दशनशिखरे धरणी तव लग्ना ।
शशिनि कलङ्ककलेव निमग्ना ॥
केशव धृतसूकररूप जय जगदीश हरे ॥३॥

तव करकमलवरे नखमद्भुतशृङ्गम् ।
दलितहिरण्यकशिपुतनुभृङ्गम् ॥
केशव धृतनरहरिरूप जय जगदीश हरे ॥४॥

छलयसि विक्रमणे बलिमद्भुतवामन ।
पदनखनीरजनितजनपावन ॥
केशव धृतवामनरूप जय जगदीश हरे ॥५॥

क्षत्रियरुधिरमये जगदपगतपापम् ।
स्नपयसि पयसि शमितभवतापम् ॥
केशव धृतभृगुपतिरूप जय जगदीश हरे ॥६॥

वितरसि दिक्षु रणे दिक्पतिकमनीयम् ।
दशमुखमौलिबलिं रमणीयम् ॥
केशव धृतरामशरीर जय जगदीश हरे ॥७॥

वहसि वपुषि विशदे वसनं जलदाभम् ।
हलहतिभीतिमिलितयमुनाभम् ॥
केशव धृतहलधररूप जय जगदीश हरे ॥८॥

निन्दसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातम् ।
सदयहृदयदर्शितपशुघातम् ॥
केशव धृतबुद्धशरीर जय जगदीश हरे ॥९॥

म्लेच्छनिवहनिधने कलयसि करवालम् ।
धूमकेतुमिव किमपि करालम् ॥
केशव धृतकल्किशरीर जय जगदीश हरे ॥१०॥

श्रीजयदेवकवेरिदमुदितमुदारम् ।
शृणु सुखदं शुभदं भवसारम् ॥
केशव धृतदशविधरूप जय जगदीश हरे ॥११॥

वेदानुद्धरते जगन्निवहते भूगोलमुद्बिभ्रते
दैत्यं दारयते बलिं छलयते क्षत्रक्षयं कुर्वते ।
पौलस्त्यं जयते हलं कलयते कारुण्यमातन्वते
म्लेच्छान्मूर्च्छयते दशाकृतिकृते कृष्णाय तुभ्यं नमः ॥

अर्थ

1. प्रलय के समुद्र-जल में आपने वेद को धारण किया और बिना थके नाव का काम किया। हे मत्स्य रूप धारण करने वाले केशव, जगदीश हरि, आपकी जय हो।

2. अत्यन्त विशाल पृथ्वी आपकी पीठ पर टिकी है, जो उसे धारण करने से बने गोल चिह्न से भारी है। हे कच्छप रूप धारी केशव, जगदीश हरि, आपकी जय हो।

3. आपके दाँत की नोक पर पृथ्वी ऐसे टिकी है जैसे चन्द्रमा में डूबी कलंक की रेखा। हे वराह रूप धारी केशव, जगदीश हरि, आपकी जय हो।

4. आपके श्रेष्ठ करकमल में नख अद्भुत नुकीले शृंग हैं, जिन्होंने हिरण्यकशिपु के शरीर को भौंरे की तरह चीर डाला। हे नरसिंह रूप धारी केशव, जगदीश हरि, आपकी जय हो।

5. हे अद्भुत वामन, आपने अपने पग से बलि को छला, और आपके पदनख से निकला जल (गंगा) लोगों को पवित्र करता है। हे वामन रूप धारी केशव, जगदीश हरि, आपकी जय हो।

6. आप (दुष्ट) क्षत्रियों के रक्त रूपी जल से जगत को स्नान कराते हैं, उसका पाप धोते हैं और संसार का ताप शान्त करते हैं। हे भृगुपति परशुराम रूप धारी केशव, जगदीश हरि, आपकी जय हो।

7. युद्ध में आप दसमुख रावण के सिरों की सुन्दर बलि दिशाओं में बाँटते हैं, जिसकी दिक्पाल कामना करते थे। हे राम रूप धारी केशव, जगदीश हरि, आपकी जय हो।

8. आप अपने उजले शरीर पर मेघ के रंग का वस्त्र धारण करते हैं, उस यमुना के रंग का जो हल के प्रहार के भय से आपके पास आ मिली। हे हलधर बलराम रूप धारी केशव, जगदीश हरि, आपकी जय हो।

9. अहो, दया से भरे हृदय से आप उन यज्ञ-विधियों की निन्दा करते हैं जिनमें पशुओं का वध दिखता है। हे बुद्ध रूप धारी केशव, जगदीश हरि, आपकी जय हो।

10. म्लेच्छों के समूह का नाश करने के लिए आप धूमकेतु जैसी भयंकर तलवार उठाते हैं। हे कल्कि रूप धारी केशव, जगदीश हरि, आपकी जय हो।

11. कवि जयदेव का यह उदार गीत सुनो, जो सुख और मंगल देने वाला, संसार का सार है। हे दस रूप धारण करने वाले केशव, जगदीश हरि, आपकी जय हो।

श्लोक: वेदों का उद्धार करने वाले, जगत को धारण करने वाले, भूमण्डल को उठाने वाले, दैत्य को चीरने वाले, बलि को छलने वाले, क्षत्रियों का क्षय करने वाले, पौलस्त्य रावण को जीतने वाले, हल धारण करने वाले, करुणा फैलाने वाले, म्लेच्छों को मूर्च्छित करने वाले, दस रूप धारण करने वाले आप श्रीकृष्ण को नमस्कार है।

इस भजन के बारे में

जयदेव ने बारहवीं शताब्दी में गीतगोविन्द गाया, और उसका पहला गीत हर वैष्णव जानता है: दस अवतार, हर पद "केशव धृत... जय जगदीश हरे" पर पूरा होता है। पुरी में भगवान जगन्नाथ के सामने यह गाया जाता है; केरल में यह सोपानम् की अष्टपदी है; तमिलनाडु और कर्नाटक में भजन मण्डलियाँ इसी से आरम्भ करती हैं। जयदेव बलराम को आठवाँ और बुद्ध को नौवाँ अवतार कहते हैं, और अन्त का श्लोक दसों को स्वयं श्रीकृष्ण के रूप मानता है। कुछ सूचियाँ बलराम के स्थान पर श्रीकृष्ण को गिनती हैं; दोनों परम्पराएँ आदरणीय हैं।

Jayadeva, Gītagovinda, sarga 1 (Sāmodadāmodara), gīta 1 + closing śloka 5, Sanskrit Wikisource गीतगोविन्दम्/सामोददामोदरः