छछ (वैहिन्द) का युद्ध

पक्षहिन्दू शाही और सहयोगी राजाआनन्दपाल, पुत्र त्रिलोचनपाल के साथ
1008 ई.बनाम
विजेताग़ज़नवीग़ज़नी का महमूद

आनन्दपाल ने उत्तर के दूसरे राजाओं की सहायता से ग़ज़नी के विरुद्ध अब तक की सबसे बड़ी हिन्दू सेना जुटाई। छछ के मैदान में वह जीत के निकट पहुँचकर टूटी।

तिथि: शीत ऋतु 1008–1009 ई.स्थान: वैहिन्द (हुण्ड) के पास छछ का मैदान, अटक के पास सिन्धु तट परप्रकार: युद्ध
चित्र: sailko · CC BY-SA 3.0
परिणाम

आनन्दपाल का हाथी मुड़ा तो शाही सेना टूट गई, और महमूद ने आगे नगरकोट लूटा।

01जीत के निकट

1008 के अन्त में महमूद ने सिन्धु पार की और छछ के मैदान में आनन्दपाल को सहयोगियों और खोखर दलों के साथ प्रतीक्षा करते पाया। फ़िरिश्ता के अनुसार चालीस दिन तक सेनाएँ आमने-सामने रहीं और महमूद खाइयाँ खुदवाता रहा। युद्ध छिड़ा तो हज़ारों खोखर ग़ज़नवी शिविर में घुस गए और कई हज़ार सैनिकों को काट डाला, और महमूद पीछे हटने को था। तभी नफ़्त और तीरों से डरकर आनन्दपाल का हाथी मुड़कर भागा, और सेना ने इसे राजा का भागना समझ लिया।

02छछ के बाद

महमूद ने पीछा किया, फिर कांगड़ा में नगरकोट के किले भीमनगर की ओर मुड़ा, जिसके मन्दिर-कोष का अल-उत्बी विस्तार से वर्णन करता है। शाहियों के हाथ से सिन्धु की रेखा निकल गई। आनन्दपाल के पुत्र त्रिलोचनपाल नमक पर्वत में नन्दना और तवी नदी पर लड़ते रहे; 1021 में वे मारे गए, और उनके पुत्र भीमपाल की 1026 में मृत्यु हुई। लगभग दो सदियों तक उत्तर-पश्चिम का द्वार सँभालने वाला हिन्दू शाही वंश उनके साथ समाप्त हुआ।

आनन्दपाल
व्यक्तित्व · शासन लगभग 1002–1010 ई.आनन्दपालपिता जयपाल की मृत्यु के बाद आनन्दपाल शाही सिंहासन पर बैठे और दो बार ग़ज़नी के महमूद के सामने खड़े हुए। 1008 में उन्होंने सिन्धु पर तब तक की सबसे बड़ी हिन्दू सेना जुटाई, जो छछ के मैदान में विजय के निकट पहुँचकर टूटी।पढ़ें →
महत्त्व

यह हिन्दू शाहियों का अन्तिम बड़ा मोर्चा था; इसके बाद पंजाब खुला पड़ा था।