वसई की घेराबंदी

विजेतामराठेचिमाजी अप्पा
1739 ई.बनाम
पक्षपुर्तगाली एस्तादो दा इंडियाबसीन की पुर्तगाली दुर्गरक्षक सेना

बाजीराव के भाई चिमाजी अप्पा ने उत्तर कोंकण तट का प्रमुख पुर्तगाली गढ़ जीत लिया, और वहाँ दो सौ वर्ष के पुर्तगाली शासन का अंत किया।

तिथि: फ़रवरी–मई 1739 ई.स्थान: वसई दुर्ग, पालघर ज़िला, मुंबई के उत्तरप्रकार: घेराबंदी
चित्र: Himanshu Sarpotdar · CC BY 2.0
परिणाम

तीन महीने की सुरंगों और धावों के बाद पुर्तगालियों ने दुर्ग सौंप दिया।

01पुर्तगाली बसीन

1534 से बसीन पुर्तगालियों के पास था। उसकी दीवारों के भीतर चर्च, मठ और फ़िदाल्गो सरदारों के घर थे, और आसपास का क्षेत्र इंक्विज़िशन की छाया में चलता था; पुर्तगाली इलाक़ों में मंदिर गिराए गए थे और धर्मांतरण पर ज़ोर था। 1737 में मराठों ने ठाणे और साष्टी ले ली, और 1739 के आरंभ में चिमाजी अप्पा ने स्वयं बसीन को घेरा।

02दीवारों के नीचे सुरंगें

दुर्ग की पत्थर की दीवारें थीं और एक ओर समुद्र, और पहले धावे भारी हानि के साथ विफल हुए। मराठों ने बुर्जों के नीचे सुरंगें खोदकर दरारें उड़ाईं, फिर अप्रैल से मई तक बार-बार धावे किए। मई 1739 में रक्षक सेना ने आत्मसमर्पण किया और उसे शस्त्रों के साथ जाने दिया गया। चिमाजी अप्पा ने दुर्ग में मंदिर बनवाया, और क्षेत्र के नागेश्वर समेत अन्य मंदिरों का जीर्णोद्धार हुआ।

मल्हारराव होलकर
व्यक्तित्व · 16 मार्च 1693 – 20 मई 1766मल्हारराव होलकरजेजुरी के पास होळ गाँव के धनगर चरवाहे बालक मल्हारराव पेशवा बाजीराव प्रथम के अधीन मालवा के बड़े मराठा सेनापति बने और इंदौर के होलकर राज्य की नींव रखी। पालखेड से अटक और पानीपत तक, चालीस वर्ष तक हर बड़े मराठा अभियान में वे साथ रहे।पढ़ें →
महत्त्व

वसई ने गोवा के उत्तर के तट पर पुर्तगाली सत्ता का अंत किया, और यह मराठों की सबसे कठिन विजयी घेराबंदियों में एक थी।