रामशेज का घेरा

विजेतारामशेज की मराठा दुर्ग-सेनादुर्ग के क़िलेदार (नाम अनिश्चित); छत्रपति संभाजी द्वारा भेजी सहायता
1682 ई.बनाम
पक्षमुग़ल सेनाशहाबुद्दीन ख़ाँ, बाद में ख़ान जहाँ बहादुर

मराठों को समाप्त करने दक्कन आए औरंगज़ेब ने सबसे पहले रामशेज पर आक्रमण किया। कुछ सौ सैनिकों वाली एक छोटी पहाड़ी ने वर्षों तक उसके सेनापतियों को चुनौती दी।

तिथि: अप्रैल 1682 ई. सेस्थान: रामशेज पहाड़ी दुर्ग, नासिक के पास, महाराष्ट्रप्रकार: घेराबंदी
चित्र: Prashant sonwane · CC BY-SA 3.0
परिणाम

पहला मुग़ल घेरा पूरी तरह विफल हुआ और सेनापति वापस बुलाया गया; छोटा दुर्ग वर्षों तक डटा रहा, तब जाकर मुग़लों के हाथ गया।

01औरंगज़ेब का पहला लक्ष्य

औरंगज़ेब 1681 में दक्कन पहुँचा, और अप्रैल 1682 में उसने शहाबुद्दीन ख़ाँ को बड़ी सेना और घेराबंदी की तोपों के साथ रामशेज पर भेजा, जो नासिक से कुछ कोस उत्तर एक अकेली पहाड़ी पर बना छोटा दुर्ग था। इसका नाम श्रीराम से जुड़ा है, जिन्होंने परंपरा के अनुसार वनवास में यहाँ विश्राम किया था। मुग़ल इसे कुछ ही दिनों में लेने की आशा में थे। उन्होंने धावे, सुरंगें और कड़ी नाकेबंदी आज़माई, और दुर्ग के भीतर नीचे की ओर गोले दागने के लिए लकड़ी का ऊँचा बुर्ज बनाया। दुर्ग-सेना ने तोपों, पत्थरों और आग से उत्तर दिया, और रात में मुग़ल पंक्तियों के बीच से रसद भीतर लाई।

02सहायता और वापसी

छत्रपति संभाजी ने रूपाजी भोसले और मानाजी मोरे के अधीन घुड़सवार भेजे जो घेरने वालों को सताते रहे, और मराठा छापों ने नासिक के आसपास मुग़ल रसद-मार्ग काट दिए। लकड़ी का बुर्ज जला दिया गया। मुग़ल दरबारी अभिलेखों के आधार पर जदुनाथ सरकार बताते हैं कि घेरा पूरे वर्ष खिंचता रहा, अंत में औरंगज़ेब ने शहाबुद्दीन ख़ाँ को वापस बुलाया और ख़ान जहाँ बहादुर को भेजा, जो उससे अधिक कुछ न कर सका। रामशेज युद्ध में बहुत बाद में मुग़लों के हाथ गया; वर्ष के बारे में स्रोत भिन्न हैं, पर सब मानते हैं कि यह दिनों नहीं, वर्षों तक डटा रहा।

छत्रपति संभाजी महाराज
व्यक्तित्व · 1657–1689 ई.; शासन 1681–1689छत्रपति संभाजी महाराजशिवाजी के ज्येष्ठ पुत्र ने नौ वर्ष तक एक साथ औरंगज़ेब की पूरी शाही सेना, सिद्दियों, पुर्तगालियों और मैसूर के विरुद्ध मराठा राज्य थामे रखा; 1689 में संगमेश्वर में पकड़े जाकर यातनाएँ सहते हुए 11 मार्च 1689 को तुलापुर में उनका वध किया गया।पढ़ें →
महत्त्व

रामशेज ने सत्ताईस वर्ष के युद्ध का ढर्रा तय किया: हर मराठा दुर्ग एक-एक कर जीतना पड़ता था, और उसमें लगने वाला समय और सैनिक साम्राज्य सह न सका।