पानीपत का दूसरा युद्ध

पक्षहेमू की सेना (सूर सेनाएँ)हेमू (हेमचन्द्र विक्रमादित्य)
1556 ई.बनाम
विजेतामुग़ल सेनाबालक अकबर की ओर से बैरम ख़ाँ

दिल्ली जीतकर विक्रमादित्य के रूप में राज्याभिषेक के एक महीने बाद हेमू ने पानीपत में मुग़ल सेना का सामना किया। वे जीत रहे थे, तभी एक तीर ने दिन बदल दिया।

तिथि: 5 नवम्बर 1556 ई.स्थान: पानीपत, हरियाणाप्रकार: युद्ध
चित्र: 1602-03 artist · Public domain
परिणाम

युद्ध के चरम पर हेमू की आँख में तीर लगा; उनकी सेना बिखर गई, वे पकड़े गए और उनका सिर काट दिया गया।

01रेवाड़ी से सिंहासन तक

हेमू रेवाड़ी के एक व्यापारी थे और आदिलशाह सूर के प्रधान मन्त्री और सेनापति के पद तक पहुँचे। मुग़ल इतिहासकार स्वयं मानते हैं कि उन्होंने अफ़ग़ानों के लिए लगभग बीस युद्ध जीते। हुमायूँ की मृत्यु के बाद वे बंगाल से आँधी की तरह बढ़े, 7 अक्टूबर 1556 को तुग़लक़ाबाद में मुग़ल सूबेदार तरदी बेग को हराया और दिल्ली में प्रवेश किया। वहाँ उन्होंने विक्रमादित्य की पुरानी उपाधि धारण की।

02वह तीर

पानीपत में हेमू के हाथियों ने मुग़लों के दोनों पार्श्वों को पीछे धकेल दिया। केन्द्र में अपने हाथी ‘हवाई’ पर सवार हेमू की आँख में तीर लगा और वे हौदे में गिर पड़े। नायक को गिरता देख सेना का साहस टूटा और वह बिखर गई। हाथी को मुग़ल पंक्तियों में ले जाया गया। अबुल फ़ज़ल और बदायूँनी दोनों लिखते हैं कि हेमू का सिर शिविर में काटा गया; बालक अकबर ने प्रहार किया या नहीं, इस पर वे अलग-अलग कहते हैं। उनका सिर काबुल भेजा गया और धड़ दिल्ली के एक द्वार पर लटकाया गया।

हेमू विक्रमादित्य
व्यक्तित्व · 1501–1556 ई.हेमू विक्रमादित्यरेवाड़ी के बाज़ारों से उठकर हेमू आदिल शाह सूर की सेनाओं के सेनापति बने, 1556 में मुग़लों से आगरा और दिल्ली छीनकर ‘विक्रमादित्य’ के रूप में अभिषिक्त हुए, और एक महीने बाद पानीपत के दूसरे युद्ध में गिरे।पढ़ें →
महत्त्व

1556 के पानीपत ने मुग़लों को फिर स्थापित किया और उस सदी में दिल्ली में हिन्दू नेतृत्व वाली सत्ता की अन्तिम सम्भावना समाप्त कर दी।