सारंगपुर का युद्ध

विजेतामेवाड़राणा कुम्भा
1437 ई.बनाम
पक्षमालवा सल्तनतमहमूद खिलजी प्रथम

महमूद खिलजी ने राणा कुम्भा के शत्रुओं को शरण दी थी। कुम्भा मालवा में घुसे और सारंगपुर में उसका सामना किया।

तिथि: 1437 ई.स्थान: सारंगपुर, मालवा, मध्य प्रदेशप्रकार: युद्ध
चित्र: Ratnesh1948 · CC BY-SA 4.0
परिणाम

मेवाड़ के वृत्तांत के अनुसार कुम्भा ने मालवा की सेना को खदेड़ा और महमूद खिलजी को बन्दी बनाकर चित्तौड़ ले गए; मालवा के इतिहास इसे दूसरी तरह बताते हैं।

01मेवाड़ का वृत्तांत

1460 की कुम्भलगढ़ प्रशस्ति और कुम्भा के समय के अभिलेख सारंगपुर में बड़ी विजय का दावा करते हैं। मेवाड़ की परम्परा जोड़ती है कि सुल्तान को बन्दी बनाकर चित्तौड़ लाया गया और कुछ महीनों बाद बिना फिरौती छोड़ दिया गया। इस विजय की स्मृति में कुम्भा ने चित्तौड़ दुर्ग पर नौ मंज़िला विजय स्तम्भ खड़ा किया, जिसकी दीवारों पर पुराणों के देवता उकेरे गए हैं।

02दो पक्ष, दो कथाएँ

मालवा के फ़ारसी इतिहास और फ़रिश्ता बन्दी बनाए जाने की बात नहीं मानते और कुम्भा तथा महमूद के लम्बे संघर्ष को आक्रमण-प्रत्याक्रमण की शृंखला बताते हैं, जिसमें दोनों पक्ष विजय का दावा करते हैं। इतना निश्चित है कि महमूद खिलजी कभी चित्तौड़ नहीं ले सका और कुम्भा ने मालवा और गुजरात से लगभग तीस वर्ष के युद्ध में मेवाड़ को अखण्ड रखा। सारंगपुर का ठीक-ठीक क्रम दोनों वृत्तांतों को साथ रखकर पढ़ना चाहिए।

राणा कुंभा
व्यक्तित्व · शासन 1433–1468 ई.राणा कुंभामहाराणा कुंभकर्ण ने 1437 में सारंगपुर में मालवा के सुल्तान को हराया, कुंभलगढ़ और चित्तौड़ का विजय स्तंभ बनवाया और संस्कृत में संगीत पर ग्रंथ लिखे; 1468 में उनके अपने पुत्र ने उनकी हत्या की।पढ़ें →
महत्त्व

यह विजय विजय स्तम्भ में अंकित है, जो आज भी चित्तौड़ की पहचान है।