लगभग तीस वर्ष के संघर्ष के बाद 1707 में अजीत सिंह शासक के रूप में जोधपुर में प्रवेश कर सके।
01दिल्ली से निकलना
दिसंबर 1678 में ख़ैबर के जमरूद में जसवंत सिंह का देहांत हुआ। उनके मरणोपरांत जन्मे पुत्र अजीत सिंह दिल्ली में रखे गए, और बादशाह उन्हें दरबार में पालना चाहता था। जुलाई 1679 में दुर्गादास और राठौड़ रक्षक लड़ते हुए नगर से निकले और बालक को मारवाड़ पहुँचा दिया। उसी वर्ष औरंगज़ेब ने जज़िया फिर लगाया। मेवाड़ के महाराणा राजसिंह राठौड़ों के साथ आ मिले, और युद्ध पूरे राजपूताने में फैल गया।
02शहज़ादा अकबर और लंबा संघर्ष
1681 में औरंगज़ेब के बेटे शहज़ादा अकबर ने राजपूतों के सहारे विद्रोह किया। विद्रोह विफल होने पर दुर्गादास शहज़ादे को दक्कन में संभाजी महाराज तक पहुँचा आए, और राजपूत तथा मराठा संघर्ष जुड़ गए। दो दशक तक राठौड़ थार और अरावली से लड़ते रहे, कभी देर तक दबे नहीं। मार्च 1707 में औरंगज़ेब मरा, और उसी वर्ष अजीत सिंह ने जोधपुर ले लिया।

मारवाड़ को अपना शासक वापस मिला, और दुर्गादास राजस्थान में निःस्वार्थ स्वामिभक्ति का दूसरा नाम बन गए।
