मुक्तसर (खिदराणा) का युद्ध

विजेताखालसागुरु गोबिंद सिंह जी; चालीस सिंहों के साथ माई भागो और महां सिंह
1705 ई.बनाम
पक्षसरहिंद की मुग़ल सेनावज़ीर ख़ान

आनंदपुर में गुरु जी का साथ छोड़ गए चालीस सिंह माई भागो के नेतृत्व में लौटे और खिदराणा में प्राण दिए। गुरु जी ने वह पत्र फाड़ दिया जिस पर उन्होंने उनसे नाता तोड़ा था।

तिथि: 1705 ई.स्थान: खिदराणे की ढाब, अब श्री मुक्तसर साहिब, पंजाबप्रकार: युद्ध
चित्र: Unknown authorUnknown author · Public domain
परिणाम

पीछा करती मुग़ल सेना सूखी ढाब पर रोक दी गई और लौट गई; चालीसों सिंह वीरगति को प्राप्त हुए।

01बेदावा

आनंदपुर की लंबी घेराबंदी के समय माझा के चालीस सिंह बेदावा, यानी यह लिखकर कि अब वे गुरु के सिख नहीं, घर लौट गए थे। घर पर परिवारों ने उन्हें धिक्कारा। झबाल की माई भागो उन्हें लेकर गुरु जी को खोजने निकलीं, जो तब मुग़ल सेना के पीछा करते हुए मालवा क्षेत्र में थे। वे पीछा करने वालों से पहले खिदराणा की ढाब पर पहुँचे और वहीं डट गए।

02चालीस मुक्ते

वे तब तक लड़े जब तक सब मारे नहीं गए या मरणासन्न नहीं हो गए। गुरु जी गिरे हुओं के बीच गए। अंतिम जीवित महां सिंह ने बेदावा फाड़ने की विनती की, और गुरु जी ने उसे फाड़ दिया। सिख अरदास आज भी चाली मुक्तों को याद करती है, और तभी से यह स्थान मुक्तसर, मुक्ति का सरोवर, कहलाता है। हर जनवरी वहाँ लगने वाला माघी मेला उनका दिन मनाता है।

गुरु गोबिंद सिंह
व्यक्तित्व · 1666–1708 ई.गुरु गोबिंद सिंहपिता की शहादत के बाद गुरु गोबिंद सिंह नौ वर्ष की आयु में गुरु बने, 1699 की वैसाखी पर आनंदपुर में खालसा की सृजना की, और मुग़लों से युद्ध में अपने चारों पुत्र खो दिए। 1708 में नांदेड़ में ज्योति जोत समाने से पहले उन्होंने ग्रंथ को शाश्वत गुरु घोषित किया।पढ़ें →
महत्त्व

मुग़लों के विरुद्ध गुरु गोबिंद सिंह जी का अंतिम युद्ध, जिसे हर अरदास में स्मरण किया जाता है।