चौकी रात भर डटी रही, और पौ फटते ही जैसलमेर से उड़े वायुसेना के हंटर विमानों ने पाकिस्तानी टैंक दस्ते को तोड़ दिया।
014 दिसंबर की रात
3 दिसंबर 1971 को युद्ध छिड़ा। उसी रात पाकिस्तान ने थार में टैंकों की एक रेजिमेंट के साथ एक ब्रिगेड सीमा पार भेजी, जिसका लक्ष्य लोंगेवाला, रामगढ़ और फिर जैसलमेर था। मेजर कुलदीप सिंह चाँदपुरी की कंपनी ने, जिसके पास जीप पर लगी एक रिकॉयललेस तोप और मोर्टार थे, आधी रात के आसपास दस्ते को आते देखा। उन्होंने डटे रहने का निर्णय लिया। रेत में धीमे पड़े और काँटेदार तार की बाड़ को बारूदी सुरंग समझ बैठे टैंक चौकी की मार में आए; कई नष्ट हुए। आक्रमणकारी दिन निकलने की प्रतीक्षा करते रहे।
02पौ फटते हंटर
5 दिसंबर की पहली रोशनी में जैसलमेर से भारतीय वायुसेना के हॉकर हंटर खुले मरुस्थल के ऊपर आ पहुँचे, जहाँ टैंकों के पास न आड़ थी, न हवाई सुरक्षा। दिन भर उन्होंने बार-बार प्रहार किए, और पाकिस्तानी ब्रिगेड दर्जनों जले हुए टैंक और वाहन रेत पर छोड़कर पीछे हट गई। मेजर चाँदपुरी को महावीर चक्र मिला। ग्यारह दिन बाद, 16 दिसंबर 1971 को, पूर्व में पाकिस्तानी सेना ने ढाका में समर्पण किया, और बांग्लादेश का जन्म हुआ।
लोंगेवाला ने 1971 में पश्चिमी मरुस्थल में पाकिस्तान के एकमात्र गंभीर आक्रमण को रोका और उस युद्ध में भारतीय सेना का सबसे प्रसिद्ध मोर्चा बन गया।
