राजाधिराज वीरगति को प्राप्त हुए, पर राजेन्द्र द्वितीय ने सेना को फिर संगठित किया, सोमेश्वर को खदेड़ा और रणभूमि पर ही राज्याभिषेक कराया।
01एक दिन में दो राजा
राजेन्द्र चोल के पुत्र राजाधिराज प्रथम ने अपना शासन तुंगभद्रा और कृष्णा के पार कल्याणी के चालुक्यों से लड़ते बिताया था। महानदी के तट पर कोप्पम में वे अपने युद्ध-हाथी पर रण में उतरे और चालुक्य बाणों से गिर पड़े। चोल पंक्तियाँ पीछे हटने लगीं। आरक्षित सेना के नायक उनके भाई राजेन्द्र ने कमान सँभाली, पंक्ति को थामा और युद्ध पलट दिया, और सोमेश्वर प्रथम रणभूमि छोड़ गया। राजेन्द्र द्वितीय के चोल अभिलेख कहते हैं कि उन्होंने वहीं अपना अभिषेक कराया, और लूट में हाथी, घोड़े, कोष और सोमेश्वर की रानियाँ तक गिनाते हैं।
02कोप्पम कहाँ था?
अभिलेख कोप्पम को किसी बड़ी नदी के तट पर बताते हैं। जे. एफ. फ़्लीट ने इसे कृष्णा तट पर कोल्हापुर से लगभग तीस मील दक्षिण-पूर्व में खिद्रापुर माना, जहाँ कोपेश्वर मंदिर आज भी खड़ा है; दूसरे विद्वान इसे रायचूर ज़िले में मस्की के पास खोजते हैं। चालुक्य पक्ष ने उस दिन का कोई विवरण नहीं छोड़ा, इसलिए यह कथा केवल चोल अभिलेखों से कही जाती है। कहा जाता है कि बाद में राजेन्द्र द्वितीय ने कोल्हापुर में विजय-स्तम्भ खड़ा किया।

कोप्पम ने दिखाया कि चोल–चालुक्य युद्ध दोनों राजवंशों को विनाश के कितने निकट ले जाते थे; इसने चोल सीमा को एक और पीढ़ी तक तुंगभद्रा पर टिकाए रखा।
