कम्पिली का पतन

पक्षकम्पिली राज्यकम्पिलदेव
1327 ई.बनाम
विजेतादिल्ली सल्तनतमुहम्मद बिन तुग़लक़ के सेनापति

कम्पिलदेव ने मुहम्मद बिन तुग़लक़ के विद्रोही चचेरे भाई बहाउद्दीन गुरशास्प को शरण दी। सुल्तान की सेना उसे लेने आई और तुंगभद्रा का यह छोटा राज्य लड़ते-लड़ते मिट गया।

तिथि: लगभग 1327 ई.स्थान: तुंगभद्रा तट पर कम्पिली और उसका पहाड़ी दुर्ग, कर्नाटकप्रकार: घेराबंदी
चित्र: Dineshkannambadi · CC BY-SA 3.0
परिणाम

कम्पिली गिर गया; कम्पिलदेव लड़ते हुए मारे गए और दुर्ग की स्त्रियों ने जौहर किया।

01शरणागत की रक्षा

कुछ वर्ष बाद दिल्ली पहुँचे इब्न बतूता ने यह वृत्तांत वहीं सुना। जब सुल्तान की सेना पास आई, कम्पिलदेव ने विद्रोही शहज़ादे को सुरक्षा के लिए होयसल राजा बल्लाल तृतीय के पास भेज दिया। फिर उन्होंने बड़ी अग्नि जलवाई, और उनके परिवार तथा सामन्तों की स्त्रियों ने उसमें प्रवेश किया। राजा अपने योद्धाओं के साथ बाहर निकले और मारे गए। कन्नड़ और तेलुगु लोकगीत उनके पुत्र कुमार राम को इस युद्ध का नायक मानकर गाते हैं।

02कम्पिली से विजयनगर तक

परम्परा कहती है कि हरिहर और बुक्क दोनों भाई कम्पिली की सेवा में थे और उसके पतन के बाद दिल्ली ले जाए गए। दस वर्ष से भी कम समय में उन्होंने उसी नदी पर कुछ ही किलोमीटर दूर हम्पी में नया राज्य स्थापित किया। विजयनगर ठीक उसी धरती पर बढ़ा जहाँ कभी कम्पिली था। इब्न बतूता यह भी लिखता है कि जले हुए दुर्ग में घुसे सुल्तान के सैनिकों को केवल शव मिले; रक्षकों ने उनके लेने को कुछ नहीं छोड़ा था।

महत्त्व

कम्पिली का संघर्ष और पतन विजयनगर की भूमिका है, जिसकी स्थापना 1336 में तुंगभद्रा के इसी क्षेत्र में हुई।