जयसिंह सिद्धराज की मालवा विजय

विजेतागुजरात के चौलुक्यजयसिंह सिद्धराज
1136 ई.बनाम
पक्षमालवा के परमारयशोवर्मन

लम्बे युद्ध के बाद गुजरात के चौलुक्य राजा ने भोज की नगरी धारा ले ली, और एक पीढ़ी तक मालवा पर अणहिलपाटक से शासन हुआ।

तिथि: लगभग 1135–1137 ई.स्थान: धारा और उज्जयिनी, मालवाप्रकार: अभियान
चित्र: Bourne & Shepherd · Public domain
परिणाम

जयसिंह ने धारा ले ली, परमार राजा को बन्दी बनाया और मालवा को अपने राज्य में मिलाकर ‘अवन्तिनाथ’ उपाधि ली।

01पुरानी शत्रुता का निपटारा

गुजरात और मालवा एक शताब्दी से एक-दूसरे पर धावे मारते आए थे। चौलुक्य राजाओं में सबसे शक्तिशाली जयसिंह सिद्धराज के समय यह वैर विजय-युद्ध बन गया। कुछ ही बाद लिखने वाले जैन इतिहासकार कहते हैं कि धारा के गिरने से पहले यह वर्षों चला। परमार राजा यशोवर्मन बन्दी बना। उज्जैन में मिला जयसिंह का विक्रम संवत 1195 (1138 ई.) का एक अभिलेख मालवा को उसके अधिकारियों द्वारा शासित दिखाता है, और अब वह स्वयं को अवन्तिनाथ कहता था। उसके दरबार के महान जैन विद्वान हेमचन्द्र अपने द्व्याश्रय काव्य में इस युद्ध का वर्णन करते हैं।

02भोज का ग्रन्थागार

प्रबन्ध परम्परा कहती है कि धारा की लूट में भोज के ग्रन्थागार की पुस्तकें भी थीं, और जयसिंह ने परमार राजा का लिखा व्याकरण देखकर पूछा कि गुजरात का अपना व्याकरण क्यों नहीं है। हेमचन्द्र ने उत्तर में ‘सिद्धहेमचन्द्र’ रचा, राजा और लेखक दोनों के नाम वाला संस्कृत और प्राकृत व्याकरण, जिसे हाथी पर रखकर अणहिलपाटक की गलियों में घुमाया गया। इसी शासनकाल में पाटण का सहस्रलिंग सरोवर और सिद्धपुर का रुद्र महालय बने। दो पीढ़ी बाद परमारों ने मालवा वापस ले लिया, पर दिल्ली सल्तनत तक चौलुक्य पश्चिम भारत की प्रमुख शक्ति रहे।

महत्त्व

इस विजय ने गुजरात को पश्चिम भारत का प्रमुख राज्य बनाया और संस्कृत विद्या को अणहिलपाटक में दूसरा घर दिया।