गिरि सुमेल का युद्ध

पक्षमारवाड़ के राठौड़राव मालदेव के सेनापति जैता और कूँपा
1544 ई.बनाम
विजेतासूर साम्राज्यशेरशाह सूरी

शेरशाह मारवाड़ के राव मालदेव पर चढ़ा और इतिहासकारों के अनुसार जाली पत्रों से मालदेव के मन में अपने ही सामन्तों के प्रति सन्देह जगाया। मालदेव पीछे हटे; जैता और कूँपा डटे रहे और आक्रमण किया।

तिथि: जनवरी 1544 ई.स्थान: गिरि और सुमेल, जैतारण के पास, पाली ज़िला, राजस्थानप्रकार: युद्ध
चित्र: Unknown authorUnknown author · Public domain
परिणाम

बहुत कड़े संघर्ष के बाद शेरशाह जीता; जैता और कूँपा अपने योद्धाओं सहित वीरगति को प्राप्त हुए।

01जाली पत्र

सुमेल के पास दोनों सेनाएँ लगभग एक महीने आमने-सामने रहीं। शेरशाह के इतिहासकार अब्बास ख़ाँ सरवानी लिखते हैं कि मालदेव के शिविर के पास ऐसे पत्र गिराए गए मानो उसके सरदारों ने उसे पकड़वाने का वचन दिया हो। मालदेव ने विश्वास कर लिया और जोधपुर की ओर लौट गए। सन्देह से आहत उनके सेनापति जैता और कूँपा कुछ हज़ार राठौड़ लेकर भोर में अफ़ग़ान सेना पर टूट पड़े।

02‘मुट्ठी भर बाजरे’ की बात

यह धावा अफ़ग़ान पंक्तियों में घुस गया और लगभग जीत ही गया था, तभी जलाल ख़ाँ के अधीन आई कुमक ने पासा पलटा। रणभूमि पर उपस्थित हर राठौड़ सेनानायक मारा गया। फ़ारसी लेखक बताते हैं कि शेरशाह ने बाद में कहा कि मुट्ठी भर बाजरे के लिए वह हिन्दुस्तान का साम्राज्य लगभग खो बैठा था; बाजरा मारवाड़ की सूखी धरती का अन्न है। फिर उसने जोधपुर पर अधिकार किया, जिसे मालदेव ने शेरशाह की मृत्यु के बाद वापस ले लिया।

मारवाड़ के राठौड़
राजवंश · तेरहवीं शताब्दी–1949 ई.मारवाड़ के राठौड़राव सीहा का कुल तेरहवीं शताब्दी में मरुस्थल में आया; राव जोधा ने 1459 में मेहरानगढ़ बनवाया। 1679 के बाद के युद्ध में दुर्गादास के नेतृत्व में राठौड़ों ने अपने शिशु राजा को औरंगजेब से बचाया और लगभग तीस वर्ष उसके लिए लड़े।पढ़ें →
महत्त्व

मारवाड़ गिरि सुमेल को जैता और कूँपा के बलिदान के रूप में याद करता है; उनके वंशज जैतावत और कूँपावत राठौड़ आज भी उनका नाम धारण करते हैं।