बहुत कड़े संघर्ष के बाद शेरशाह जीता; जैता और कूँपा अपने योद्धाओं सहित वीरगति को प्राप्त हुए।
01जाली पत्र
सुमेल के पास दोनों सेनाएँ लगभग एक महीने आमने-सामने रहीं। शेरशाह के इतिहासकार अब्बास ख़ाँ सरवानी लिखते हैं कि मालदेव के शिविर के पास ऐसे पत्र गिराए गए मानो उसके सरदारों ने उसे पकड़वाने का वचन दिया हो। मालदेव ने विश्वास कर लिया और जोधपुर की ओर लौट गए। सन्देह से आहत उनके सेनापति जैता और कूँपा कुछ हज़ार राठौड़ लेकर भोर में अफ़ग़ान सेना पर टूट पड़े।
02‘मुट्ठी भर बाजरे’ की बात
यह धावा अफ़ग़ान पंक्तियों में घुस गया और लगभग जीत ही गया था, तभी जलाल ख़ाँ के अधीन आई कुमक ने पासा पलटा। रणभूमि पर उपस्थित हर राठौड़ सेनानायक मारा गया। फ़ारसी लेखक बताते हैं कि शेरशाह ने बाद में कहा कि मुट्ठी भर बाजरे के लिए वह हिन्दुस्तान का साम्राज्य लगभग खो बैठा था; बाजरा मारवाड़ की सूखी धरती का अन्न है। फिर उसने जोधपुर पर अधिकार किया, जिसे मालदेव ने शेरशाह की मृत्यु के बाद वापस ले लिया।

मारवाड़ गिरि सुमेल को जैता और कूँपा के बलिदान के रूप में याद करता है; उनके वंशज जैतावत और कूँपावत राठौड़ आज भी उनका नाम धारण करते हैं।
