निज़ाम की सेना घिर गई और उसने संधि माँगी, लगभग साठ लाख रुपये वार्षिक आय का प्रदेश सौंपा, जिसमें दौलताबाद और बीजापुर जैसे किले भी थे।
01गार्दी की तोपें
1759 के अंत में मराठों ने किलेदार को अपनी ओर मिलाकर अहमदनगर का किला लिया, और निज़ाम के भाई सलाबत जंग और निज़ाम अली उसे वापस लेने चले। पेशवा नानासाहेब के चचेरे भाई सदाशिवराव भाऊ ने उदगीर के आसपास उनका सामना किया। उन्होंने इब्राहीम ख़ान गार्दी को सेवा में लिया था, जो फ़्रांसीसी ढंग से प्रशिक्षित बंदूकचियों और मैदानी तोपों का सेनानायक था। मराठा घुड़सवारों ने निज़ाम की रसद काटी और तोपों ने उसकी छावनी पर गोले बरसाए, और हफ़्तों के संघर्ष के बाद निज़ाम की सेना उदगीर के पास घिर गई और संधि माँगी।
02संधि और उत्तर की राह
संधि ने मराठों को लगभग साठ लाख रुपये वार्षिक आय वाली भूमि और दक्कन के कई बड़े किले दिए, जिनमें दौलताबाद और बीजापुर भी थे, और अहमदनगर पर उनका अधिकार माना गया। भाऊ पुणे के नायक बनकर लौटे। कुछ ही हफ़्तों में अहमदशाह अब्दाली की सेना के हाथों दत्ताजी शिंदे की मृत्यु का समाचार आया, और पेशवा ने इब्राहीम ख़ान की तोपों के साथ भाऊ को उत्तर भेजा। वह यात्रा जनवरी 1761 में पानीपत पर समाप्त हुई।

उदगीर दक्कन में मराठा शक्ति का शिखर था, और तोपख़ाने की इसी सफलता ने तय किया कि एक वर्ष बाद पानीपत में भाऊ कैसे लड़ेंगे।
